पांव छुवाई पर एक आईपीएस का कुबूलनामा

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अमिताभ ठाकुरभड़ास पर अधिकारियों द्वारा पांव छूने की घटना से सम्बंधित वीडियो और खबरें देखा-पढ़ा. इसके बाद मैंने सबसे पहले अपनी किस्मत को धन्यवाद दिया कि उस समय इतने उन्नत टेक्नोलोजी नहीं थे जब मैं भी इस रोग से ग्रसित था. आज के समय तो भयानक रूप से टीवी और कैमरा और दुनिया भर के यंत्र-तंत्र हर तरफ लगे रहते हैं. देवरिया, बस्ती, बलिया, महाराजगंज, गोंडा, संत कबीर नगर, फिरोजाबाद, ललितपुर और पिथोरागढ़ जैसे छोटे जिलों में भी थोक के भाव लोकल टीवी बिखरे रहते हैं.

जब भी एसपी प्रेस कांफ्रेंस करता है तो इतने सारे छोटे-बड़े टीवी के बम्बे उसके मुंह में ठूंस दिए जाते हैं कि उसका मन खुद-ब-खुद प्रसन्न हो जाता है और उसके वीआईपी बनने की इच्छा पूर्ण जो जाया करती है. पर जब मैं 1999-2000 में देवरिया में एसपी था तो ये सब चैनल नहीं हुआ करते थे, कम से कम छोटे शहरों में तो कदापि नहीं. बड़े जगहों के बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों को टीवी पर ज्ञान बघारते या अपने किसी छोटे-बड़े कार्य की सराहना करते देखता तो मन थोडा सा मायूस हो जाया करता कि मैं भी कभी-कभार अच्छे काम कर दिया करता हूँ, मेरे सामने तो ये टीवी वाले नहीं आते. अगर कोई मिलता भी है तो मात्र अखबार वाले जो आज लिखते हैं तो कल जा कर छपता है. साथ में उस लिखे में थोबडा तो नज़र भी नहीं आता, जबकि इस बड़े शहरों के अधिकारियों की सारी बातें तत्काल ही हर जगह प्रदर्शित हो जाया करती हैं.

वैसे तो यह अंतर आज भी है छोटे और बड़े शहरों के बीच पर मेरे मामले में तो बहुत अच्छा हुआ कि उस समय ये चौबीस घंटे वाले कैमरे नहीं थे जो भूत की तरह हर जगह मौजूद रहते हैं. उससे भी अच्छी बात यह है कि यशवंत भाई का यह दैत्य, भड़ास भी नहीं था और ना ही इस तरह के अन्य सभी वेब-पोर्टल. नहीं तो समझिए मुझे कैसा लगता कि इधर तो उस नेता के पाँव छुए और उधर इनमे से किसी ने कैमरे में कैद कर के चारों तरफ प्रसारित कर दिया. अब यह बीमारी मुझे कैसे लग गयी इसका भी एक इतिहास है. दरअसल नौकरी में आने के पहले कोई मेरे पाँव छूता तो था नहीं. मैं भी उन्ही के पाँव छूता था जो घर-परिवार या नाते-रिश्तेदारियो में बड़े हुआ करते थे और संस्कारों के मुताबिक़ उनके पाँव छूने होते थे. पर जब नौकरी में आया और खास कर गोरखपुर में पहली स्वतंत्र पोस्टिंग हुई तो वहाँ कई सारे लोग मेरे पाँव छूने लगे- कुछ पुलिसवाले, कुछ पब्लिक वाले. नयी-नयी नौकरी थी, कम उम्र थी, लगने लगा कि मेरी “महानता” के अभिभूत हो कर ये लोग मेरे पांव छू रहे हैं. नहीं जानता था कि ये लोग मात्र अपने मतलब के लिए या मेरी ये कमजोरी जान कर ही ये लोग ऐसा करते हैं.

धीरे-धीरे यह समझ में आने लगा कि सभी “बड़े” (यानि किसी भी तरह ताकतवर) आदमी के पांव छुए जाते हैं. गोरखपुर और मुरादाबाद में तो इस रोग से बचा रहा और ललितपुर, पिथोरागढ़ में भी. वैसे भी शायद पांव छूने की प्रथा पूरब में ज्यादा है पश्चिम की जगह. पर जब घूम-फिर कर देवरिया आ गया तो वहां मेरे पांव छूने वालों की भी बाढ़ आ गयी और लगे हाथ एक-आध लोगों के पांव मैंने भी छूने शुरू कर दिए. उसके पीछे कहीं ना कहीं अपना मतलब तो अवश्य ही रहता होगा. उस समय कुछ लोगों ने इस पर कड़ी टिप्पणी की थी जो मुझे नागवार लगी थी पर मुझे यह लगता कि मैं कुछ गलत काम तो करता नहीं हूँ, काम वही करता हूँ जो सही होता है वही करता हूँ फिर यदि किसी की धीरे से चरण वन्दना कर ही लेता हूँ तो इन लोगों की जेब से क्या जाता है. साथ ही इस बात का भी पूरा ख़याल रखता हूँ कि वर्दी में यह कृत्य नहीं करूं ताकि वर्दी की प्रतिष्ठा को कोई आंच नहीं पहुंचे. इन तर्कों के साथ मैं ऐसे निंदकों को एक तरह से अपना शत्रु मानता या जलनशील. पर आज जब यह सोचता हूँ तो लगता है कि वे लोग कितने सही थे.

अब मैं उस मानसिक स्थिति से बहुत आगे निकल गया हूँ. अब जब पूजा नहीं करता, भगवान के पीछे अपने लिए नहीं पड़ता तो किसी इंसान के पाँव मात्र इसीलिए कि वह थोड़ी बेहतर अवस्था में है, अब तो किसी कीमत में नहीं छूने वाला. साथ ही यह भी समझ गया हूँ कि पांव छूने से और कोई अंतर नहीं पड़ता, एक विचित्र किस्म का सन्देश जरूर जाता है. प्रशासन शायद नब्बे फिसदी मानसिक प्रभाव है और इसमें इससे जुड़े सारे लोगों की भाव-भंगिमाओं और बाह्य कृत्यों का बहुत महत्व होता है. मेरे जैसा आदमी समझ नहीं रहा होता है और किसी के पाँव बेवकूफी या छोटे से लालच में छू रहा होता है पर वह व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह उस समय एक आदमी मात्र नहीं है, वह एक संस्था है, एक शक्ति है और एक ऐसा स्तंभ है जिस पर हज़ारों-लाखों लोगों की आस्थाएं निहित हैं. जैसा कि क़ानून का एक चर्चित सिद्धांत है, न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए.

मैं इनमे से किसी भी व्यक्ति के प्रति नाराजगी के भाव इसीलिए भी नहीं ला पाता क्योंकि स्वयं ऐसी गलती कर चुके होने के कारण मुझे लगता है कि कई बार ऐसा करने वाला व्यक्ति पूरी बात को समझे बिना अभी तत्काल के छोटे से फायदे या सुरक्षा के लिए अपने सम्मान और अपने पद की महान जिम्मेदारी को तिलांजलि देने से नहीं हिचकता. वैसे भी इंसान बहुत कमजोर प्राणी है. पर जैसे अमिताभ बच्चन ने चोट लगने वाली फिल्म “मर्द” में जोरदार ढंग से कहा तरह- “मर्द को दर्द नहीं होता”, उसी प्रकार प्रशासन के हर आदमी को यह स्मरण रखना ही होगा कि “प्रशासन किसी के भी आगे नहीं झुकता.”

शुक्र है कि देर से ही सही, मुझे यह बात पूरी तरह समझ में आ चुकी है.

अमिताभ ठाकुर

आईपीएस

लखनऊ


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