महिला आईएएस अफसर की शौर्यगाथा

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सुजाता दास पंजाब कैडर की एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं. इन्टरनेट पर दी जानकारी के अनुसार वे प्रदेश की जनता को कम दामों में सुविधाजनक तरीके से चिकित्सकीय सुविधा प्रदान करने के काम में लगी हुई हैं, जिससे ख़ास कर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को लाभ पहुंचे. वे आयुर्वेदिक अक्यूपंक्चर और अन्येतर चिकित्सकीय प्रणाली पर भी काम करती हुई बतायी जाती हैं. शीतल दास चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से वे ये सारे काम करती बतायी गयी हैं. पर मैंने जिस काम के चलते उनका नाम सुना वह है एक तीन साल की लड़की की निर्मम पिटाई.

अखबारों की सूचनाओं के अनुसार सुजाता दास गुरूवार की शाम को सेक्टर 38 के मार्केट में कुछ खरीदारी करने गयी थीं तो वहाँ एक तीन-वर्षीय लड़की गरिमा, जो नर्सरी में पढ़ती है, का ऑटोरिक्शा भी वहीं खड़ा हो गया जहां सुजाता दास जी का एक महंगा वाहन खड़ा था. गरिमा के ऑटोरिक्शा चालक ने एक बच्चे को उतारने के लिए अपना वाहन रोका और उस बच्चे को छोड़ने पास ही में कहीं गए. इसी बीच गरिमा नामक यह अबोध बच्ची उस ऑटोरिक्शा से खिलवाड़ करने लगी और इस खेल-खेल में ऑटोरिक्शा अचानक से आगे चल पडा और जा कर सुजाता जी के महंगे होंडा सिटी गाडी को हल्का सा धक्का मार दिया. इससे होंडा सिटी गाड़ी को कुछ खरोंच भी लग गयी.

अखबारों के अनुसार इतना बहुत था इस समाजसेवी महिल आईएएस अफसर को नाराज करने के लिए. उन्होंने तुरंत वहीँ सार्वजनिक रूप से उस नादान और मासूम लड़की की पिटाई करनी शुरू कर दी. खबरों के अनुसार यह पिटाई निर्मम किस्म की थी और किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं कही जा सकती है. यह भी लिखा गया है कि संभवतः उस समय सुजाता दास जी किसी नशे में भी थीं जिससे उनका क्रोध और भी तेज तथा उद्दीप्त हो गया था. जब लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो वे चिल्लाने लगीं कि वे आईएएस अफसर हैं और सबों को ठीक कर देंगी. वे निर्मम ढंग से उस बच्ची को मारती रहीं और बड़ी मुश्किल से लोग बीच-बचाव कर उस बच्ची को बचा सके.

खबरों के अनुसार जब पुलिस वहाँ पहुंची तो सुजाता जी ने उलटे तुरंत मेरी तरह के ही किसी वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी को फोन मिलाया और सभी लोग सेक्टर 39 थाने पर लाये गए जहां गरिमा के पिता, प्रदीप कुमार, जो एक कनिष्ठ अधिकारी हैं, भी आये. दो घंटे बाद सुजाता दास जी थाने से चली गयीं और थाने के इंचार्ज के अनुसार दोनों पार्टियों में समझौता हो गया जिसके कारण अब इस मामले में किसी अग्रिम कार्यवाही की जरूरत नहीं है. मैंने स्वयं भी सेक्टर 39 थाने पर इस बारे में बात की तो मालूम हुआ कि इस बारे में किसी प्रार्थनापत्र नहीं देने के कारण कोई केस नहीं दर्ज हुआ है यद्यपि इस बारे में दोनों पक्षों में हुए समझौते के बारे में थाने की जीडी (दैनिकी) में घटनाक्रम अंकित किया गया  हैं.

संभवतः इस मामले में कानूनी पहलू तो समाप्त हो गया हो पर यह प्रकरण स्वाभाविक रूप से कई सारे प्रश्न सामने रख देता है. एक तो आईएएस और आइपीएस अधिकारी के रूप में हम लोग कई कारणों से जनता की निगाहों में अपनी पूर्ववर्ती प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए वैसे ही संघर्षरत हैं जिसमे कई सारी घटनाओं ने आम आदमी को यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि इन अधिकारियों को किस हद तक सम्मान दिया जाए. ऐसे में यह विशेष रूप से जरूरी हो गया है कि हममे से हर व्यक्ति इस बात का ख़ास ख़याल रखे कि इस तरह की घटनाओं से यथासंभव दूर रह सके जिसमे शायद ही कोई आदमी आपकी तरफ से बोल सके.

क्या आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि एक छोटी सी बच्ची को मामूली सी बात के लिए निर्मम रूप से मारना-पीटना एक बहुत ही निंदनीय और घृणित कर्म है ? आप सार्वजनिक रूप से किसी की चापलूसी करें तो आदमी एक बार सोचता है कि चलो इसका तो भला है, यह अपने फायदे के लिए ऐसा कर रहा है. पर एक निर्दोष और अबोध बच्ची को इस तरह से पीटने के कृत्य की कोई भी सराहना नहीं कर सकता. यह मामला और भी गंभीर तथा घृणित तब हो जाता है जब ऐसा करने वाला व्यक्ति एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी है, एक महिला है, अपने आप को सामजिक रूप से प्रतिबद्ध बताती है लेकिन जब अपने हीरो होंडा कार पर मामूली से खरोंच की बात आती है तो यह सब चोला हटा कर एक विद्रूप और घृणित रूप के सामने आ जाती  है और तीन साल की बच्ची की पिटाई करने लगती है.

मैं तो बस यही मनाता हूँ कि कितने भी खराब दिन देखने को मिलें, कैसा भी गलत-सही करना पड़े पर ऐसा मेरे साथ नहीं हो कि अपनी किसी ताकत के वशीभूत हो कर मैं इस तरह अपने होशो-हवास खो बैठूं और मदांध तथा ओछी हरकत करने लगूं.

अमिताभ ठाकुर

आईपीएस

लखनऊ


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