सस्पेंड होकर सत्ता के सच को समझ पाया

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अमिताभ: सता का दिवास्वप्न : अनामी शरण बबल का लेख पढ़ा जो पत्रकार से मंत्री बने एक सज्जन के विषय में था. लेख पढ़ कर मन के कई तरह के विचार आये. जब लेख पढ़ना शुरू किया था तो एक तरफ यह बात मन में आई कि उस व्यक्ति का मन से बचाव करूँ जिसने अपने पेशे से आगे बढ़ कर अपनी मेहनत के बल पर समाज में कुछ विशेष स्थान बनाया और आज एक संवैधानिक पद पर विराजमान हैं. ऐसा भी लगा कि शायद अनामी शरण जी कई दूसरे पत्रकार साथियों की तरह अपने आस-पास के सफल लोगों में किसी प्रकार का खोट निकाल कर अपने कलेजे में ठंडक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं.

पर जब लेख को पढ़ते हुए आगे बढ़ा तो लगा कि जिस तरह से तथ्य प्रस्तुत किये गए हैं, वे अगर सत्य हैं तो पता नहीं क्या बात है कि सत्ता का रास्ता कई-एक मामलों में टेढ़ा-मेढा सा ही जान पड़ता है. यही वह बिंदु है जिस पर मैं सोचने को विवश हो जाता हूँ. मैं एक ऐसे महकमे में हूँ, जहां यदा-कदा मैंने भी सत्ता को नजदीक से देखा है. यह भी सही है कि एक समय ऐसा भी था जब कई बार मैं भी इसका अंग बनने और दूर-पास से इसका रसास्वादन करने को अति उत्सुक रहता था. यह कहना भी गलत होगा कि सता का कोई नशा नहीं या सत्ता महत्वहीन है. बल्कि ऐसा कह देना सीधे-सीधे झूठ बोलना होगा और वह भी परले दर्जे का. ठीक है, मैं उसका अंग नहीं, ठीक है आपकी उसमें हिस्सेदारी नहीं, पर सत्ता रुपी यह आकर्षक और मोहिनी मूरत तो अपनी जगह विद्यमान रहती ही है, हर समय हर पल. ठीक है कि लोग बदल जाते हैं, चेहरे दूसरे आ जाते हैं और मुखौटे दूसरे हो जाते हैं पर वह लपलपाने वाले, रिझाने वाली, पास बुलाने वाली, भरमाने वाली और गप्प से अपने चंगुल में दबोचने वाली सत्ता-रुपी महारानी भला कभी अपना रूप, यौवन और आकर्षण कम करने वाली थोड़े ही हैं.

मैं एक बार अपनी नौकरी में निलंबित हो गया था. सही हुआ या गलत, इस पर चर्चा नहीं करूँगा क्योंकि यह इस लेख का विषय वस्तु नहीं है पर उस दौरान सत्ता के रंग-ढंग देखने का बहुत सारा अवसर मिला, जिसका मैंने भी काफी आनंद लिया. निलंबन के बाद शुरू में तो काफी बुरा लगता था कि लोग क्या कहेंगे, कैसा मानेंगे आदि-आदि. पर उसके बाद सोचा कि जब हो गया तो हो ही गया, अब तो आगे की देखनी होगी. लिहाजा मैंने यही उचित समझा कि प्रदेश के सर्वोच्च कार्यपालक के यहाँ ही अपनी बात रखी जाए. निलंबित था ही, सो वर्दी पहनने की जरूरत नहीं होती थी. सुबह नाश्ता करके उत्तर प्रदेश सचिवालय के पंचम तल की ओर चल देता और वहां बैठा रहता. इसी दौरान वहां मैंने कई सारे तमाशे देखे, सता का रूप देखा, सत्ता की चाल देखी, सता का उन्माद देखा और सत्ता के बहुरूपिये देखे. एक पर एक कलाकार. एक पर एक कलाकारियाँ. अपनी नौकरीपेशा बिरादरी देखी, पत्रकार साथी देखे और नेता-अभिनेता देखे.

कई बार ऐसा होता कि मैं भी बैठा हूँ, कोई मंत्री जी और बड़े पत्रकार महोदय भी बैठे हैं और हम लोग इंतज़ार कर रहे हैं. आपस में देश-दुनिया की बातें चल रही हैं और राजनीति पर चर्चा-परिचर्चा जारी है. इतने में पत्रकार महोदय को किसी का फोन आता है तो बहुत धीमी आवाज़ में गंभीर मुंह बना कर कहते हैं- "मुख्यमंत्री जी के सामने बैठा हूँ, बाद में बात होगी." यही बात कई बार मंत्रीजी से भी सुन लेता हूँ. खुद ज्यादा झूठ बोल नहीं पाता और वैसे भी उन दिनों बेकार था, सस्पेंड अफसर की कितनी पूछ रहती है भला, इसीलिए सच ही बोल देता कि इंतज़ार कर रहा हूँ.

पर उसी दौरान देखता कि जब मुख्यमंत्री आते तो लोग ऐसे पागलों की तरह भागते जैसे कोई लू लग गयी हो या अचानक से कोई बिलबिलाहट सी हो गयी हो. किसी भी तरह से उनसे मिलने को बेताब, एकदम से बावरे. सता ही चमक, सत्ता की हनक, सता का जलवा और सता की शान देखने को एकदम से मिल जाती. यह भी कभी-कभी सोचता कि सता तो वही रहेगी पर सतानशीं बदल जाएगा, तब यही दरवाजे और खिडकियाँ, यही पावदान और यही एयरकंडिशनर उन्हें पहचानने से इनकार कर देगा. एक नए शख्स की उतनी ही तत्परता से गुलामी करेगा जितनी भक्ति से आज किसी की कर रहा है.

कई जगहों पर एसपी रहा हूँ. जानता हूँ कि आज जो लोग सर झुकाए खड़े हैं, कल उनका सर कहीं और झुका होगा, पर दोनों में एक साम्य होगा- दोनों सर सत्ता के अधीन झुके होंगे. इस नियम से कोई अलग नहीं होता- नेता, अभिनेता, नौकरशाह, पत्रकार और न जाने कौन-कौन. शायद यही कारण है कि गोस्वामी जी और हम सभी लोग किसी भी कीमत पर सत्ता चाहते हैं. अगर वास्तव में कुछ हो पाता तो इतना भर ही कि सत्ता की गड़बड़ियां कुछ दूर हो पातीं और ऐसी स्थितियां बन पातीं कि सता की चाहत में कमी आ पाए. साथ ही ऐसे ही लोगों को सता मिल सके जो दूसरों से ज्यादा उसके हकदार हों. ऐसा सोचना दिवास्वप्न जैसा है पर सोचने में क्या हर्ज है.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.


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