निशंक सरकार का महाघोटाला

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: इस भाजपाई मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए :  अपने एक प्रिय की कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए निशंक ने उत्तराखंड की जनता और उत्तराखंड के सौंदर्य का सौदा कर डाला : नियमों को ताक पर रखकर उत्तराखंड को न्यूनतम 2500 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया :  निशंक के कोप के शिकार पत्रकार उमेश कुमार और उनकी न्यूज एजेंसी एनएनआई ने किया महाघोटाले का सनसनीखेज खुलासा : इस महाघोटाले पर उत्तराखंड की मीडिया मौन, लेकिन नेताओं ने मुंह खोलना शुरू कर दिया :

उत्तराखंड राज्य में भाजपा की सरकार है और यहां के मुख्यमंत्री भाजपा नेता रमेश पोखरियाल निशंक हैं. निशंक नेतागिरी में आने से पहले पत्रकार रहे हैं, शायद अब भी पत्रकार हैं क्योंकि ये जो अखबार निकालते हैं, वो अब भी निकल रहा है, और, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाली ''खंडूरी-कोश्यारी आपसी खींचातानी परिघटना'' के चलते ये महोदय राज्य के मुख्यमंत्री बन गए और अभी तक इस कुर्सी पर जमे हुए हैं. राजनीति और पत्रकारिता में सक्सेस होने के सारे गुर जानते हैं निशंक. सो, सत्ता मिलते ही सबसे पहला काम शुरू किया खुद की तिजोरी भरने का. इस परिघटना में घोटाले पर घोटाले किए जा रहे हैं. उनके लिए गए जिन निर्णयों से फलीभूत होने वाले घोटाले को पकड़ लिया जाता है, कोर्ट या मीडिया द्वारा, उस निर्णय को निशंक खुद रद कर देते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि कोई घोटाला इतना तूल पकड़े की उनकी कुर्सी ही चली जाए.

लेकिन वे एक कदम पीछे हटाकर चुप नहीं बैठते. फिर दो कदम आगे छलांग लगा देते हैं. देश में चल रहे घोटाले के अखिल भारतीय मैराथन में भाजपाई निशंक कांग्रेसी नेताओं को भरपूर चुनौती दे रहे हैं. छोटे और प्यारे प्रदेश उत्तराखंड की जनता से पूछिए, वो निशंक को गरियाती मिलेगी, लेकिन निशंक को इससे फरक नहीं पड़ता. वे तो सिर्फ एक चीज चाहते हैं कि उनकी पार्टी के बड़े नेता और बड़े अखबार और बड़े चैनल न गरियाएं और न उंगली उठाएं, बस. सो, इन सबों को साधते रहते हैं निशंक. लेकिन घोटाले छुपते नहीं. निशंक सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने की मुहिम चला रहे देहरादून के पत्रकार और उद्यमी उमेश कुमार ने अपनी न्यूज एजेंसी एनएनआई द्वारा निशंक के एक नए और बड़े घोटाले का खुलासा किया है. उमेश कुमार के पोलखोल अभियान से भन्नाए निशंक ने सारा जोर उमेश कुमार को बर्बाद करने में लगा दिया है. इसी कारण उमेश के रीयल इस्टेट के कारोबार को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है.

पिछले दिनों अचानक दो घंटे की नोटिस पर उमेश की कंपनी के बनाए कई मकानों को तोड़ दिया गया. उमेश और उनके परिजनों के खिलाफ कई तरह की फर्जी रिपोर्ट मुकदमें आदि लिखाए जा चुके हैं और लिखाए जा रहे हैं. इस सबसे जूझते हुए भी उमेश कुमार लगातार निशंक के महाघोटालों का पर्दाफाश कर रहे हैं. जिस ताजे मामले का खुलासा उमेश कुमार ने एनएनआई के जरिए किया है, वो न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर निशंक सरकार की हो रही किरकिरी को और ज्यादा बढ़ाने भी वाला है. इस महाघोटाले पर उत्तराखंड की मीडिया ने चुप्पी साध रखी है. लेकिन नेताओं ने इस महाघोटाले के बारे में जनता के बीच चर्चा करना शुरू कर दिया है. उत्तराखंड की मीडिया भले मैनेज्ड हो, पर न्यू मीडिया के लोगों ने इस महाघोटाले की प्रत्येक परत का खुलासा करने का काम शुरू कर दिया है. हाइड्रो प्रोजेक्ट फिर स्टर्डिया घोटाले के बाद निशंक ने ये कौन सा नया महाघोटाला कर दिया है, आइए इसके बारे में संक्षेप और सरल तरीके से एक-एक पेंच को जानें.

एक हैं डीवी राव. निशंक के बेहद करीबी हैं और निशंक नामधारी कई घपले-घोटालों के साथी हैं. इस नए महाघोटाले में भी इसी व्यक्ति का हाथ है. कुछ समय पहले हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के अरबों रूपए के घोटालों में भी यही शामिल रहा है. डीवी राव और डाडामुंडी शांति किरण क्रमशः डाडामुंडी अन्नाई प्रावइवेट लिमिटेड और देव भूमि एनर्जी के भी मालिक रहे हैं जो अरबों रुपये के हाइड्रो घोटाले में शामिल कंपनियां थीं. यह इस बात के लिए भी चर्चित रहा था कि एक ही रात में इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के नाम पर देहरादून में एक कंपनी खरीदकर तीन प्रोजेक्ट हासिल कर लिए थे. एक प्रसिद्ध चैनल ने जब इस कंपनी का मूल पता तलाशने की कोशिश की तो उस कंपनी के दिए गए पते पर कोई नहीं मिला. उस वक्त की पावर पॉलिसी से खिलवाड़ करते हुए उक्त व्यक्ति ने चार प्रोजेक्ट नियम विरूद्ध हासिल कर लिए थे. चूंकि घोटाला खुल गया था तो इसलिए इसे रद्द करना पड़ गया था.  इस डीवी राव की निशंक सरकार से गहरी सांठगांठ है क्योंकि इन घोटालों को राज्य सरकार की मिलीभगत से अंजाम दिया गया है. प्रदेश में लघुजल विद्युत परियोजना के आवंटन और उसे रद्द करने के खेल में भी एक प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर इसने अपनी भूमिका निभाई थी.

इसी डीवी राव के स्वामित्व वाली गुड़गांव स्थित कंपनी श्रावंथी एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को गैस आधारित ऊर्जा उत्पादन के लिए निशंक सरकार ने सारे नियमों-कानूनों-सलाहों-सिद्धांतों को ताक पर नेशनल मीडिया में भी निशंक के कारनामों को लेकर अक्सर खबरें छपती रहती हैं, लेकिन निशंक की सेटिंग इतनी तगड़ी है कि भाजपा के बड़े नेता सब देख-जान कर भी चुप्पी साधे रहते हैं.रखकर अनुमति दे दी है. इसके कारण उत्तराखंड को हल साल न्यूनतम 82.5 करोड़ रुपये का नुकसान 30 साल तक उठाना पड़ेगा. यह नुकसान सिर्फ राजस्व का है, जिसे न्यूनतम आंका गया है. पर्यावरण से लेकर अन्य तरीकों के नुकसान को पैसे के रूप में यहां नहीं जोड़ा गया है. डीवी राव के श्रीवंथी एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को अनुमति उत्तराखंड सरकार के औद्योगिक विकास विभाग द्वारा प्रदान की गई. सबसे पहला घपला यहीं कर दिया गया. नियमतः इसे अनुमति उर्जा विभाग द्वारा प्रदान की जानी चाहिए थी. अगर इसे उर्जा विभाग द्वारा अनुमति दी जाती तो उत्तराखंड की उर्जा नीति के अनुसार श्रावंथी एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को उत्तराखंड सरकार को 12 प्रतिशत फ्री पावर तीस साल तक देना पड़ता.

12 प्रतिशत फ्री ऊर्जा को भी कंपनी अपने पास रखकर उसे बेच सके, ऐसा आपराधिक फायदा कंपनी को पहुंचाने के लिए इस परियोजना को औद्योगिक विकास विभाग के सामने पेश और इसी विभाग के जरिए पास कराया गया. इस कंपनी के साथ राज्य सरकार ने उर्जा क्रय करने का पहला अधिकार राज्य सरकार को मिलने संबंधी कोई अनुबंध नहीं किया.  ऐसा अनुबंध प्रत्येक राज्य सरकारें ऐसी कंपनियों के साथ करती हैं ताकि राज्य की जनता का भला हो सके लेकिन निशंक सरकार को यह अनुबंध करना याद नहीं रहा, और यह अनुबंध न करके निशंक सरकार ने उत्तराखंड के साथ धोखा किया. केंद्र सरकार प्रत्येक राज्य को उर्जा नीति के तहत कुछ प्रतिशत उर्जा राज्य की जनता की भलाई के लिए प्रदेश सरकार को देती है. इसका प्रयोग जनता की भलाई के लिए शुरू की गई परियोजनाओं में किया जाता है लेकिन निशंक सरकार ने इस उर्जा को भी श्रावंथी कंपनी को समर्पित कर दिया. ज़ाहिर है इसका इस्तेमाल कंपनी अपने फायदे के लिए करेगी और इससे जनता को कोई भी लाभ नहीं होने वाला.

श्रीवंथी एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड का गठन 6 अप्रैल 2009 को हुआ था. इसे ऊर्जा उत्पादन की अनुमति औद्योगिक विभाग के नोटिफिकेशन सं. 2039 द्वारा दिनांक 4.11.2009 को प्रदान की गयी. कंपनी ने जो आवेदन औद्योगिक विकास विभाग, उत्तराखंड को प्रेषित किया उसमें न तो गैस अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) से गैस आपूर्ति की अनुमति मिलने का कोई प्रमाणपत्र है, न ही कंपनी ने अपना कोई टेक्निकल व फाइनेंसियल स्टेटस पेश किया है. इस कंपनी का शेयर कैपिटल मात्र एक लाख है, फिर भी इसे अनुमति प्रदान कर दिया गया. इस कंपनी ने अपनी कोई बैलेंस शीट आवेदन पत्र के साथ संलग्न नहीं की. कंपनी द्वारा महज सौ रुपए के स्टांप पेपर पर तहसील काशीपुर के किसानों के साथ किए गए अनुबंध की छाया प्रतिलिपि आवेदन पत्र के साथ संलग्न कर दिया गया. इसके अनुसार कंपनी का केवल 21 एकड़ (8 हेक्टेयर) ज़मीन के अनुबंध थे जबकि कंपनी द्वारा 18.92 हेक्टेयर (46.75 एकड़) भूमि की सूची संलग्न की गई एवं 18.92 हेक्टेयर खरीद करने की अनुमति मांगी. कंपनी द्वारा किसानों से ली गई भूमि का सौ रुपए के स्टांप पर अनुबंध किया गया. इससे राजस्व की अत्यधिक हानि हुई है. कंपनी द्वारा जो अनुबंध प्रस्तुत किया गया, उनका मूल्यांकन 4 करोड़ 9 लाख बनता है, जिस पर 32 लाख रूपए स्टांप देयता बनती है और कंपनी द्वारा मात्र 1200 रुपए स्टांप शुल्क दिया गया.

कंपनी को जब इस प्रोजेक्ट के लिए 2009 में मंजूरी दी गई उस वक्त राज्य में गैस अधारित प्रोजेक्ट्स के लिए कोई नीति नहीं थी. लेकिन दिसंबर 2010 में आनन-फानन में यह पॉलिसी बना दी गई. इसके पीछे वजह है कस्टम विभाग द्वारा चेन्नई में इस कंपनी के मशीनों को क्लीयरेंस देने से मना कर देना. वे मशीनें उर्जा उत्पादन के लिए लाई गई थीं जबकि कंपनी के पास उद्योग आधारित सर्टिफिकेट था. जाहिर है इससे कंपनी को काम में बाधा पहुंचने वाली थी और उनका भारी नुकसान होने वाला था. यहीं पर घोटालेबाज निशंक की सरकार ने सारे नियम कानून को ताक पर रखते हुए उस कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए रातों रात यह नीति बनाई. कंपनी द्वारा जो तथ्य दिए गए उनका पूर्ण रूप से सत्यापन भी नहीं किया गया. भारत सरकार द्वारा परियोजना को केवल 12 हेक्टेयर भूमि क्षेत्रफल पर लगाने की अनुमति प्रदान की गई, जबकि उत्तराखंड सरकार द्वारा 18.2 हेक्टेयर भूमि क्रय करने की अनुमति प्रदान की गई जो कि पूर्णतयः नियमों के विरूद्ध है. कंपनी को 6 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि क्रय करने की अनुमति दी गई एवं उसका भू-उपयोग भी औद्योगिक दिखाया गया. इस कंपनी के लिए कृषि भूमि को औद्योगिक भूमि में बिना कोई शुल्क लिए परिवर्तित कर दिया गया.

निशंक के कार्यकाल में पुराने घोटाले पर चर्चा तभी बंद होती है जब कोई नया घोटाला सामने आ जाता है

इस कंपनी के मामले में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का घोर अराजक उल्लंघन उत्तराखंड सरकार ने किया है. पर्यावरण मंत्रालय ने यह कहा था कि यह भूमि बेहद उपजाऊ है इसलिए परियोजना के लिए किसी और जगह का चुनाव कर लिया जाए पर राज्य सरकार ने इसको कोई भाव न देते हुए प्रमुख कृषि भूमि को औद्योगिक क्षेत्र में बदल दिया. किसी क्षेत्र में उद्योग वहां की भौगोलिक स्थिति के अनुसार लगाने की गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया. पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जो टर्म ऑफ रिफरेंस दिए गए, उसमें जमीन की सीमा 30 एकड़ थी. फिर 46 एकड़ की परमीशन राज्य सरकार द्वारा कैसे प्रदान कर दी गई? जबकि नियम मुताबिक इसके लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है. उत्तराखंड सरकार द्वारा 4 नवंबर 2009 को विशेष औद्योगिक क्षेत्र की घोषणा की गई लेकिन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इसकी मंजूरी 5 नवंबर को दी गई थी.

निशंक सरकार के कारनामों का पर्दाफाश करने के कारण परेशान किए जा रहे उमेश कुमार को लेकर एक स्टोरी ब्यूरोक्रेसी टुडे पत्रिका व पोर्टल पर प्रकाशित हो चुकी है. पत्रकार रह चुके मुख्यमंत्री की एक पत्रकार के साथ किए जा रहे ऐसे सुलूक को कोई शोभनीय आचरण नहीं कह सकता.

फिर यहां सवाल यह उठता है कि कैसे उत्तराखंड की महाभ्रष्ट सरकार ने पहले ही इसे औद्योगिक क्षेत्र घोषित कर दिया. इस क्षेत्र में प्रोजेक्ट लगाने पर क्षेत्र में पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव के विषय में पर्यावरण नीति का इस प्रकरण में अनुसरण नहीं किया गया और न ही कोई पब्लिक हियरिंग कराई गई है, जैसा कि नीति में प्रावधान था. राज्य सरकार ने गैस बेस्ड थर्मल पावर प्लांट की अनुमति इस संदर्भ में बिना नीति बनाए दे दी. राज्य की बिजली खरीदने पर पहला अधिकार का प्रयोग भी नहीं किया गया जबकि राज्य सरकार वर्तमान में राज्य बिजली जरूरत को पूरा करने के लिए महंगी दरों पर बाहर से बिजली खरीद रही है. बिना नीति के राज्य को रायल्टी संबंधी नुकसान तो हुआ ही साथ ही फ्री बिजली मिलने के विकल्प की भी ऐसी की तैसी हो गई. जबकि इस प्रोजेक्ट में राज्य की जमीन के उपयोग के साथ-साथ जल संसाधन का भी लगातार दोहन होगा जिसके एवज में राज्य को इस प्रोजेक्ट से कुछ भी हासिल होने नहीं जा रहा है.

निशंक के कार्यकाल में पहले भी हुए हैं कई गड़बड़ घोटाले

वर्तमान में राज्य में सौ मेगावाट से ज्यादा की जल विद्युत उत्पादन की नीति है जिसके मुताबिक 12 प्रतिशत के हिसाब से राज्य को फ्री बिजली तीस साल तक मिलनी थी. यह वर्तमान प्रोजेक्ट पर अगर लागू होती तो इसका मूल्यांकन करीब करीब 4 हजार करोड़ रूपए बैठता है. क्या यह प्रदेश की हानि नहीं है. क्या इसमें कंपनी को सीधे-सीधे फायदा नहीं पहुंचाया गया? उत्तराखंड की वर्तमान सरकार द्वारा इस प्रकरण में निभाई गई भूमिका के कारण राज्य को हुई राजस्व हानि पर एक नजर डालते हैं... कुल उत्पादन 225 मेगावॉट का 12 प्रतिशत फ्री यानि 27 मेगावॉट फ्री. एक मेगावाट पर डे का मतलब 24000 यूनिट पर डे. फ्री मिलने वाले रोजाना के 27 मेगावाट को साल के 365 दिन के लिए यूनिट में कनवर्ट करें तो कुल 236520000 यूनिट होता है और अगर Rate per unit = साढ़े पांच से लेकर साढ़े सात पर यूनिट हो तो तकरीबन औसतन 82.5 करोड़ रुपये प्रति साल के हिसाब से हर साल उत्तराखंड प्रदेश को नुकसान होगा. सोचिए, तीस साल तक 12 प्रतिशत फ्री बिजली कंपनी द्वारा दिए जाने के अधिकार का राज्य सरकार द्वारा उपयोग न किए जाने से कितना बड़ा नुकसान राज्य को होगा.  82.5 करोड़ रुपये में 30 का गुणा कर लीजिए, पता चल जाएगा कि निशंक सरकार ने कितना बड़ा (तकरीबन 2500 करोड़ रुपये का) घपला प्रदेश की जनता के साथ किया है. मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स से प्राप्त कागजात की कुछ प्रति यहां संलग्न है. इसमें कंपनी का नाम, मालिक और उनके आवासीय पते के जरिए मामले को आसानी से समझा जा सकता है.


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