पब्लिक को नौकर मानने का पुलिसिया माइंडसेट : डॉ. मंजूर अहमद

E-mail Print PDF

: इंटरव्यू : डॉ मंज़ूर अहमद (पुलिस अधिकारी, शिक्षाविद और राजनेता) : वर्ष 73 में जो पुलिस रिवोल्ट हुआ उसमे गलतियां अफसरों की थी : जब मांग नहीं सुनी जाती है तो पुलिस एसोशिएशन के लिए आवाज़ उठती है, जो जायज है : हमारे एक डीजी थे, बहुत ईमानदार, वो रिटायर होने के बाद वो थाने जाने से बहुत डरते थे :

डा. मंजूर अहमद एक नायब किस्म के आईपीएस अधिकारी रहे हैं. मूलतः बिहार के रहने वाले डॉ अहमद लेक्चरर के पेशे से पुलिस में आये. भारत सरकार के कई सारे दायित्वों को निभाते हुए आगरा यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर बन गए. रिटायरमेंट के बाद वे विधान सभा और लखनऊ के मेयर का चुनाव भी लड़ चुके हैं. इन चुनावों में वे बहुत कम वोटों से हारे थे. इस तरह डॉ अहमद शिक्षाविद, पुलिस अफसर और राजनेता, सभी एक साथ हैं.  इन सभी रूपों में वे समाज को अपना सक्रिय योगदान देते रहे हैं और देते रहते हैं. प्रस्तुत है पीपल’स फोरम, लखनऊ की संपादक डॉ नूतन ठाकुर की डॉ अहमद से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-

प्र- कुछ अपने फॅमिली बैकग्राउंड के बारे में बताएं?
उ- मैं एक बहुत ही गरीब खानदान से आया हूँ. इतने गरीब परिवार से हूँ कि कोई सोच नहीं सकता है. हम अपने स्कूल के लिए सात किलोमीटर पैदल जाया करते थे, आना-जाना चौदह किलोमीटर हो गया. हमारे फादर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. परिवार काफी बड़ा था. हमने गाँव के ही स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा पास की. उसके बाद इंटरमिडीएट किया, बीए ओनर्स किया. बीए ऑनर्स में डिस्टिंक्शन के साथ पास किया. इसके बाद पटना चला गया और पटना यूनिवर्सिटी से एमए किया पोलिटिकल साइंस में. फिर मैं लेक्चरर रहा दो साल- छपरा में और मगध यूनिवर्सिटी में. चूँकि एक तो मैं खुद टीचर का बेटा था, ऊपर से पढाने का शौक था, सो लेक्चरर का जॉब मुझे अच्छा लगता था. यह शौक मेरा आइपीएस में आने के बाद भी बना रहा. अक्सर जिलों में क्लासेज लिए. जैसे मुज़फ्फरनगर में पीजी क्लासेज लिए, आजमगढ़ में लिए, जहां भी मौका मिला पढ़ाया.

इसी बीच भारत सरकार ने योजना निकली कि जामिया मिलिया को एक्सटेंटेड यूनिवर्सिटी बनाया जाए. इसके लिए उन्हें एक आदमी चाहिए था जो को-ओर्डिनेट करे, प्रोपर प्लानिंग करे. उन्होंने मुझे चुना और मैं जामिया मिलिया गया. वहाँ मैं ओएसडी रहा साढ़े तीन साल. वहाँ साइंस के तमाम पीजी क्लासेज हमने शुरू कराये. उसके बाद मैं मिनिस्ट्री ऑफ वेलफेयर में रहा, भारत सरकार में. फिर मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स में रहा और वहाँ मैं डाइरेक्टर था एसपीसी में. इस दौरान मुझे कई बार विदेश भी जाना पड़ता था. इस प्रकार मैंने भारत सरकार में भी काम किया और शिक्षा प्रसार के लिए भी काम किया. इसके अलावा चेयरमैन पुलिस हाऊसिंग कार्पोरेशन था और एडिशनल डीजी ला एंड ऑर्डर आदि कई पदों पर उत्तर प्रदेश में भी रहा. इसके बाद मुझे एक चांस मिला आगरा यूनिवर्सिटी में और मैंने अपनी आईपीएस की नौकरी छोड़ दी तथा वाईस चांसलर पद पर चला गया.

प्र- आपका तो कई विभागों का अनुभव रहा, तो उनसे पुलिस में क्या अलग लगा?
उ- बेसिकली तो मैं पुलिस अफसर था, ट्रेनिंग पुलिस की थी. दो बातें लगीं, एक तो यह कि जब तक ये पुलिस अवाम से करीब नहीं आएगी और जब तक पुलिस की छवि में तबदीली नहीं होगी, तब तक इसका भला नहीं होगा. ये जो पब्लिक को-ऑपरेशन है, हमारी सफलता का नाप यही है. हमारी गुडविल ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है. मैं हमेशा अपने इन्स्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टर को कहा करता था कि यदि कोई महिला थाने पर आ रही है तो समझिए आपकी बहन है, आपकी माँ है. इसी तरह आपके घर वालों की तरह दूसरों को भी समझें. मैंने दो नारे दिए थे, एक था- गेट टू द पीपुल, बजाय क़ानून झाड़ने के हम अवाम के पास जाएँ. दूसरा था- बच्चों को साथ लो. जिससे पुलिस की खराब छवि खत्म हो.

प्र- आपको क्या लगता है कि आपके समय में और अब के समय में पुलिस में अच्छे के लिए कुछ बदलाव आया है या परेशानियां बढ़ी हैं?
उ- परेशानियां बढ़ी हैं. पुलिस के लोग अपनी असली ड्यूटी भूल गए हैं. पुलिस ज्यादा ओवरबीयरिंग हो गयी है. बेलगाम सी हो गयी है और तफ्तीश वगैरह तो छोड़ दीजिए, टेक्नीकल बातें है पर आम जनता से जो बर्ताव है और आम आदमी का जो ख़याल है पुलिस के बारे में वह पहले से काफी खराब हुआ है. कोई भी आदमी थाने जाने से घबराता है, यहाँ तक रिटायर्ड पुलिस अफसर भी थाने जाने से घबराता है. हमारे एक डीजी थे बहुत ईमानदार और मशहूर थे, जेएन चतुर्वेदी वो आज रहते है देहरादून में, वे कहते थे कि रिटायर होने के बाद वो थाने जाने से बहुत डरते थे.

प्र- क्या कुछ ऐसी पोलिसी या क़ानून में बदलाव की जरूरत है जिससे पुलिस की छवि में सुधार हो?
उ- कानून लाख बना दीजिए, कोई अंतर नहीं आएगा. अलेग्जेंडर पोप एक मशहूर अंगरेज़ कवि हुआ है, उसने कहा था- “फॉर फोरम्स ऑफ गवर्नमेंट, लेट फूल्स कांटेस्ट, व्हाट एवर इज बेस्ट एडमिनिस्टरड इज द बेस्ट” मतलब कि चाहे कोई भी व्यवस्था और क़ानून ले आया जाये, जब तक उसका सही पालन नहीं हो पायेगा, वह बेकार है. असल तो प्रशासन की बात है. आज मुख्यमंत्री और मंत्री कह दें पुलिसवालों से कि यह बात बर्दाश्त नहीं होगी तो पुलिसवाले ठीक हो जायेंगे, पर कहने का ढंग सही हो. पर राजनितिक लोग यह सोचते हैं कि यदि पुलिस ठीक हो गयी तो हमारा क्या होगा. आज कल पोलिटिक्स तो चोरों की चल रही है. अब उन्हें सोचना है कि जालिम के तौर पर याद किये जायेंगे या अवाम के दोस्त के तौर पर.

प्र- आज कल पुलिस एसोशिएशन की जो मांग हो रही है, उस पर आपकी क्या राय है?
उ- बिलकुल होना चाहिए, क्यों नहीं होना चाहिए. सवाल यह है कि जब मांग सुनी नहीं जाती तो ही इस प्रकार की आवाज़ उठती है. जब हम शुरू में नौकरी में आये थे तो मंगल और शुक्र के दिन ऑर्डरली रूम हुआ करते थे. तो मैंने कहा कि जिसको जो परेशानी हो वह अपनी बात कह सकता है. मुझे याद है कि हम लोग अपने सब काम छोड़ कर छुट्टी तक से लौट आते थे कि आज आर्डरली रूम है. आज पूछिए कितने अफसर आर्डरली रूम जाते हैं. अरे एक सिस्टम था जिसमे शिकायतों का निस्तारण होता था. अब वह सब खतम हो गया. बिलकुल उनकी यूनियन होनी चाहिए, उनकी तकलीफों का निस्तारण कैसे हो.

प्र- जैसे यूपी में एक सोच बनी हुई है कि एक बार पहले पीएसी के दंगे हो चुके हैं तो दुबारा ऐसा हो सकता है. इस पर आपका क्या सोचना है?
उ- ऐसा है कि पुलिस अफसर को सोचना चाहिए कि कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल, इन्स्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टर हमारे हाथ में रहें, हमारे साथ रहें. उन्हें सजा भी दीजिए, पर उनसे मोहब्बत भी करेंगे. अब फ़ोर्स में अफसर को भी यह सोचना होगा कि ये लोग क्लर्क नहीं हैं फ़ोर्स के लोग हैं. इनकी समस्या को रीड करना होगा. और सच्चाई यही है कि जो सन तिहत्तर में पुलिस रिवोल्ट हुआ था उसमे गलतियां हम लोगों की थीं, अफसरों की थी. शुरू में चीजों को हलके से लिया और जब बात बढ़ गयी, तक चौकन्ने हुए

प्र- इसका मतलब इन लोगों को वाजिब छूट दी जाये?
उ- उसमे सवाल ये है कि जो यूनियन बने तो सारे लोग उसके मेंबर हों. यदि आईपीएस अफसरों का यूनियन है जहां वे अपने मामले उठाते हैं तो इन लोगों का यूनियन क्यों नहीं बन सकता है. यदि वे फील करते हैं कि उनकी समस्यायों का निराकरण सही ढंग से नहीं हो रहा है तो उन्हें हक है अपना यूनियन बनाने का.

प्र- आप तो पुलिस और पोलिटिक्स दोनों में रहे हैं. इस तरह आपको दोनों जगहों में कैसा लगता है और क्या अंतर महसूस होता है?
उ- असल बुनियादी खराबी यहीं पर है. पुलिस का माइंडसेट इस तरह का है कि पब्लिक उसकी नौकर है. पुलिस भी ऐसा करते हैं और पोलिटिशियन भी ऐसा ही चाहते हैं ताकि उनका बाजार बना रहे. एक जिले में तैनात हुआ तो ऊपर मेरी यही शिकायत हुई कि जब ये सब लोगों की बात सीधे सुन लेते हैं तो हम लोग किस मर्ज़ की दवा हैं. पोलिटिशियन ये चाहते हैं कि हम जाएं, हम ही पूरी बात कहें, और इसके बदले पैसे भी जनता से लें.

प्र- अभी आपका आगे क्या सोचना हैं? चुनाव लड़ना है?
उ- मेरा इलेक्शन लड़ना एक बड़े मकसद के तहत है. मैं लोगों को सेंसिटाईज करना चाहता हूँ कि उन्हें अपने अंदर एक आत्मविश्वास पैदा हो, मेरे लिए जीतना-हारना महत्वपूर्ण नहीं है. मेरी स्पीचेज में भी मैं यही कहता हूँ.

प्र- चुनावों में क्या सुधार होने चाहिए?
उ- हम लोगों ने इलेक्शन प्रोसेस को करप्ट कर दिया है. इतना पैसा खर्च हो रहा है इलेक्शन में, इलेक्शन कमीशन लाख कोशिश करता है, कुछ रोक नहीं पाता है. और पोलिटिशियन भी यही चाहते हैं कि ये गलत तरीके बने रहें ताकि उनके लोग आ जाएँ. इसके लिए अवाम को ही जागना होगा और सोचना होगा. उनमे यह भावना पैदा हो कि जो भी पैसा खर्ज करते हैं उन्हें रिजेक्ट कर दें. अभी जो लोक सभा में लोगों के काफी पैसा खर्च कर दिया और वही लोग जीते, जो अच्छी बात नहीं है. इसे बदलना होगा.


AddThis