बृजलाल भी लल्लनजी की तर्ज़ पर चलना पसंद करते हैं!

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डा. नूतन ठाकुर शरद जोशी के उपन्यासों पर आधारित लोकप्रिय धारावाहिक “लापतागंज” में एक बहुत ही मजेदार चरित्र हैं लल्लन जी. लल्लन जी पीडब्ल्यूडी में काम करते हैं और इस बात पर उन्हें काफी अभिमान भी है. उनका एक खास अंदाज़ है कि जब तक कोई उन्हें सीधे तौर पर कोई बात नहीं कहता है, वे उसे ना तो सुनते हैं और ना उससे अपना कोई मतलब मानते हैं. वे वहीं खड़े रहेंगे, सारी बात उनके सामने होती रहेगी पर उनका कहना होगा कि हमसे क्या मतलब, क्योंकि किसी ने मुझे सीधे तो कहा नहीं है.

लगता है उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवर पुलिस अधिकारी स्पेशल डीजी बृजलाल भी लल्लन जी की तर्ज़ पर चलना पसंद करते हैं. तभी तो जब तब ठीक उनके सामने खड़े हो कर, उनका नाम ले कर, उनको इंगित करके कोई बात नहीं कही जाए, वे यह मानते हैं कि “हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं.”

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी चारों ओर चीख-चीख कर यह कह रही थीं कि मेरे लखनऊ स्थित निवास को जीतेंद्र सिंह बबलू और इन्तेज़ार आब्दी ने और कई लोगों के बिरजूसाथ मिलकर जलाने का काम किया. उन्होंने तो इस कार्य में प्रदेश की मुख्यमंत्री तक पर परोक्ष रूप से आरोप लगाए थे. साथ ही उन्होंने कई सारे पुलिस अफसरों को भी इसके लिए नामित किया था. रीता जोशी यह सब कहती रहीं और लिखती रहीं. उन्होंने प्रदेश पुलिस को ये सारी बातें लिख कर दीं, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को यह बात बताई, हाई कोर्ट तक ये बातें रिट याचिका के रूप में लिख कर दिया पर शायद बृजलाल जी को मिल कर, उनको इंगित करते हुए, उनका नाम ले कर यह सब नहीं कहा इसीलिए उन्होंने यही माना कि उन्हें इन बातों की कोई जानकारी ही नहीं है.

इसी चलते लगभग दो सालों तक जीतेन्द्र बबलू और आब्दी के बारे में कोई कार्रवाई नहीं हुई और अब जब दो दिनों पहले ये दोनों लोग अचानक से गिरफ्तार हो भी गए तब भी बृजलाल का अखबारों में यही बयान आया कि इस पूरे मामले में विलम्ब रीता बहुगुणा जोशी के कारण ही हुआ. चूँकि उन्होंने पुलिस को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया और पुलिस वालों को कुछ भी नहीं बताया, इसीलिए मुज्लिमों की गिरफ्तारी होने में विलम्ब हुआ. यानी जबरा मारे, रोये ना दे. रीता जोशी का घर जला और दोष भी उन्हीं का. बड़ी अजीब विडंबना है और बहुत ही दुखदायी भी. झूठ का दायरा कितना बड़ा हो सकता है, आदमी कितनी निर्लज्जता से झूठी बातें इतने शान से कह सकता है, इसका इससे बढ़ कर उदाहरण क्या हो सकता है.

अब चूँकि बृजलाल प्रदेश के सबसे “बड़े” और “ताकतवर” पुलिस अधिकारी है, अतः उनकी कही गयी हर बात सही है. ऊपर से वे इस समय तो स्वयं को क़ानून ही समझते होंगे. यदि ऐसा नहीं होता तो मैं नहीं समझती कि वे इतना खुल कर रीता जोशी की अब तक की सारी बातों को एक सिरे से दरकिनार करते हुए कह देते- “हमसे तो किसी ने कहा ही नहीं.”

मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि रीता जोशी क्या करतीं जिससे यह माना जाता कि वे पुलिस का सहयोग कर रही थीं. क्या पुलिस को दिए गए कागज़, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दिए गए प्रार्थना पत्र, आगहाई कोर्ट में प्रस्तुत रिट याचिका काफी नहीं थे? प्राप्त जानकारी के अनुसार रीता जोशी ने इस मामले में इन दोनों लोगों के अलावा कई पुलिसवालों को भी मुलजिम बनाया है. घटना के समय रीता जोशी घर पर नहीं थीं. उनकी भी जानकारी के वही सूत्र हैं जिन पर पुलिस या सीबी-सीआईडी की विवेचना आधारित होगी. उन्होंने भी वही टीवी क्लिपिंग और फुटेज देखे होंगे जो पुलिस ने देखे और जिनके आधार पर अब जाकर अचानक सीबी-सीआईडी को बातें एकदम दूध और पानी की तरह साफ़ दिखने लगा है.

बबलू और आब्दी की हैसियत कितनी अधिक है इसका अंदाजा तो इसी बात से हो जाता है कि जिन लोगों को उसी सरकार के अंग सीबी-सीआईडी ने गिरफ्तार किया, उन्हीं लोगों को देखने के लिए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शामिल नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा स्वयं जेल में मिलने गए. क्या यही वह बात है जो उत्तर प्रदेश पुलिस या सीबी-सीआईडी को कई सारी बातों को देखने से मना कर देती हैं और बृजलाल की तरह यह कहने को मजबूर कर देती हैं कि रीता जोशी ने तो सहयोग दिया ही नहीं.

मैं यह जानती हूँ कि सत्ता में बड़ी ताकत होती है. सत्ता के बाजीगर यह सब करें, यह तो समझ में आता है पर सत्ता के प्रकाश से इधर-उधर चमकने वाले लोग भी ऐसा करने लगते हैं तो बड़ी दिक्कत होती है. आज ही देश के चुनिन्दा अवकाश प्राप्त अधिकारियों ने ब्यूरोक्रेसी को राजनैतिक हस्तक्षेप से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की है. मैं ऐसे सभी प्रयासों को पूरी तरह बेमानी और बेकार मानती हूँ. कोई भी सत्ता अधिकारियों को पीछे-पीछे दुम हिलाने को नहीं कहती- कम से कम लिखित में तो आदेश नहीं ही करती है, पर यदि अधिकारी स्वयं ही अपनी आँखें मूँद लेने को उद्धत हो तो सुप्रीम कोर्ट क्या कर लेगा?

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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