जय हो, अमिताभ ठाकुर जीते

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: अंततः मिली पोस्टिंग : ईओडब्लू मेरठ के एसपी बने : अमिताभ ठाकुर मेरे लिए भी एक टेस्ट केस की तरह रहे. इस दौर में जब बौनों का बोलबाला है, क्रिमिनल गवरनेंस का दौर है, पैसे की ताकत व माया है तब कोई अधिकारी निहत्था होकर अपने पर हो रहे अन्याय का मुकाबला करे और जीत जाए, यह तथ्य न सिर्फ चौंकाता है बल्कि कइयों को प्रेरणा भी देता है. अमिताभ ठाकुर को अब तक जिसने भी पढ़ा है, वो मेरी तरह यही मानता होगा कि यह शख्स अपनी कुछ कथित बुराइयों के बावजूद जनपक्षधर और लोकतांत्रिक लोगों के लिए उम्मीद की किरण की तरह है.

उनकी कई वर्षों की लंबी लड़ाई रंग लाई और अंततः उन्हें राज्य सरकार को पोस्टिंग देने को मजबूर होना पड़ा. हालांकि सिस्टम में रहते हुए सिस्टम की बुराइयों के खिलाफ गांधीवादी तरीके से लड़ी गई लड़ाई में उनका नुकसान भी हुआ. उन्हें जो प्रमोशन मिलने चाहिए थे, नहीं मिले. पर दूर से देखा जाए तो ये बहुत छोटी चीजें हैं जिससे निजी नुकसान अमिताभ ठाकुर के करियर को भले हुआ हो लेकिन उन्हें इस निजी नुकसान को उठाकर हजारों-लाखों ईमानदार कर्मचारियों, अफसरों को जो प्रेरणा दी है, वो अमूल्य है. अमिताभ के लिख को जब कोई पढ़ता है तो उसे यकीन नहीं होता कि ये शख्स उसी खूंखार यूपी पुलिस का हिस्सा है जिसके कारनामों की अक्सर मीडिया के भीतर-बाहर प्रमुखता से चर्चा होती है.

अमिताभ के तर्कों, उनकी बातों, उनकी जनपक्षधरता, चेतना को उन्नत और परिष्कृत करते जाने की उनकी जिद उन्हें उनके समकालीनों से बहुत अलग और बहुत ऊंचे खड़ा करती है. वो चाहे स्टडी लीव प्रकरण हो जिसके दौरान उन्होंने आईआईएम, लखनऊ से पढ़ाई पूरी की या फिर पुलिसिंग के मुद्दे पर उनके बेबाक विचार हों या अपने जीवन के बारे में उनका ईमानदार आत्ममूल्यांकन हो, वो अमिताभ ठाकुरनूतन ठाकुरसब यह बताता है कि अमिताभ के पास आंतरिक ऊर्जा भरपूर है. और, इस ऊर्जा को बल दिया, मजबूत बनाया, आगे बढ़ाया उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहने वाली उनकी पत्नी, पत्रकार व आरटीआई एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर ने.

पति के कोर्ट कचहरी के कागजात को पढ़ना-संभालना हो या अवसाद के दिनों में निराश न होने वाला दम प्रदान करना, नूतन ठाकुर ने पति की सारी ईमानदार लड़ाइयों, गतिविधियों, मुश्किलों में खुलकर साथ दिया बल्कि कई बार वो खुद आगे दिखीं और अमिताभ उनका अनुसरण करते हुए. जाहिर है, यह जीत सिर्फ अमिताभ या उनके चाहने वालों की नहीं है, यह जीत उस महिला की भी है जिसने महिला होने के मायने बदल डाले और अफसरों की बीवियों को नया रास्ता दिखाया. हो सकता है मेरे यह सब लिखने में किसी को अतिशयोक्ति दिखे या लगे, लेकिन सच बात ये है कि आज के भयानक बाजारू, सत्तालोलुप, करियरवादी और अवसरवादी दौर में अगर कोई व्यक्ति या कोई दंपति सामूहिकता की भावना के साथ खुद की निजी भावना को जोड़ देने में सफल हुआ है तो उसका हर मोड़ पर खैरमकदम किया जाना चाहिए.

मैं तो बस यही कहूंगा कि अमिताभ और नूतन जी की जय हो. यूं ही कदम-कदम बढ़ाए जा, बहुत लोग इन कदमों को फालो करेंगे, सराहेंगे, कुछ खुलकर तो कुछ चुपचाप. मुझे खुशी है कि मैंने अपने निजी संघर्षों के इस दौर में अमिताभ और नूतन जैसे मित्र पाए हैं जिनसे कई बार मैं खुद अवसाद के क्षणों में ऊर्जा पाता हूं और मेरी तरह कई अन्य लोग होंगे जो इस दंपति से जुड़कर बहुत कुछ सीखते-महसूसते होंगे. अमिताभ ठाकुर और नूतन ठाकुर से अपील है कि इस जीत को वो आखिरी न मानें. मुश्किलें और भी आएंगी क्योंकि सच कह कर जीत जाना बहुत मुश्किल काम है इस दौर में. तो साजिशें कम न होंगी, मुश्किलें कम न होंगी, बस वो इरादे व वो तेवर कायम रहे जिसके बूते अब तक का यह सफर तय किया है. आप भी चाहें तो अमिताभ और नूतन को इस तात्कालिक जीत पर विश कर सकते हैं, उनकी इन मेल आईडीज This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर मेल मेल करके. जय हो.

यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया


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