टाइम्स आफ इंडिया मुर्दाबाद, द हिंदू जिंदाबाद

E-mail Print PDF

: इन बनियों ने तो पैसे के लिए अब आत्मा तक बेच डाला : अखबार से संपादकों की औकात खत्म करने की शुरुआत किसने की? टाइम्स आफ इंडिया. भारत में पेड न्यूज की व्यवस्थित शुरुआत किस घराने ने की? टाइम्स आफ इंडिया. अखबार की आत्मा, मस्तिष्क और सिरमौर समझे जाने वाले मास्टहेड को बेचने की शुरुआत किसने कर दी है? टाइम्स आफ इंडिया ने.

और, जिस राह पर टाइम्स आफ इंडिया चलता है, उसी ओर चल पड़ते हैं हमारे हिंदी वाले बनिये. टाइम्स आफ इंडिया सारा खेल बेहद क्रिएटिव तरीके से खेलता है जिससे उसकी तरफ कम ध्यान जाता है, खासकर हिंदी वालों का कम ध्यान जाता है, इसलिए शोर कम मचता है. लेकिन यही काम जब हिंदी वाले अखबार शुरू करते हैं तो हो-हल्ला मच जाता है. बात यहां हिंदी अंग्रेजी की नहीं. बात शुरुआत करने की है. एक गंदे खेल की शुरुआत टाइम्स आफ इंडिया ने कर दी है. वो अब विज्ञापन कंपनियों को अपना मास्टहेड बेचने लगा है. जर्मनी की कार कंपनी वोल्क्सवेगन ने 31 मार्च के दिन टाइम्स आफ इंडिया का मास्टहेड खरीद लिया. सब कुछ ब्लू ब्लू था. द ब्लू टाइम्स आफ इंडिया.

यही कंपेन द हिंदू में भी था लेकिन द हिंदू ने अपने मास्टहेड से छेड़छाड़ करने की अनुमति मार्केटियरों को नहीं दी. कह सकते हैं कि द हिंदू ने एक बार फिर पत्रकारीय सरोकार और परंपरा की लाज रखी. इसके पहले यूनीनार और एमटीएस मोबाइल कंपनियों ने टीओआई के मास्टहेड को खरीदा था. जो टाइम्स आफ इंडिया अपने मास्टहेड के बारे में गर्व से कहता रहा है कि मास्टहेड आफ द नेशन, उसे टीओआई ने मार्केटियरों के हवाले अपने मास्टहेड को कर दिया है.

वैसे, आज के भयंकर मार्केट इकानामी में, बाजारू दौर में, पैसा पाने के लिए हर कोई अपना सबसे खास गुण बेचने पर उतारू है. कह सकते हैं कि जो कुछ विशिष्ट है, अनोखा है, बचा हुआ है, पवित्र है, सम्मानीय है उस पर निगाह मार्केटियरों की है. क्योंकि मार्केटियर माल बेचने कमाने के लिए नए नए प्रयोग करते रहते हैं. इस प्रयोग के आगे बड़े बड़े शूरमा ध्वस्त नजर आते हैं. कभी कोई नामचीन पत्रकार दलाली करता दिखता है तो कोई नामचीन अखबार अपना मस्तिष्क को बेचता नजर आता है. किसी भी प्रकार धन इकट्ठा करने का जो नैतिक मूल्य इस मार्केट इकोनामी ने स्थापित कर दिया है, वह सभी पवित्र संस्थाओं को भ्रष्ट और संवेदनशील मनुष्यों को धूर्त बनाता जा रहा है. जो इस आधुनिक नैतिक मूल्य को नहीं अपना पा रहा है, या इससे दूरी बनाए हुए हैं, उसे कथित मेनस्ट्रीम के लोग उल्लू, खिसका हुआ, बेचार मान लेते हैं और अंततः वह संवेदनशील मनुष्य या संस्था भी भ्रष्टाचार के राह पर चल पड़ती है.


AddThis