नए दौर का ‘हिन्दुस्तान’

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हिन्दुस्तानी समाज में यह दौर छटपटाहट का है। 121 करोड़ की विशाल जनसंख्या वाले इस देश को लगने लगा है कि हमारी व्यवस्था बंद दरवाजों और खिड़कियों वाली उस पुरानी हवेली की तरह हो गई है जो अतीत के बासी अंधेरे में कैद है। हुक्मरान अपनी जोड़तोड़ से सत्ता में बने रहने को ही सब कुछ समझते हैं और संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में तंत्र का प्रभुत्व लोक की असहायता साबित हो रहा है। भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, रोजमर्रा की जरूरियात का अभाव और कदम-कदम पर अपनी विवशता के दायरे में कैद जिंदगी जीने को अभिशप्त लोगों का असंतोष उबला पड़ रहा है।

अन्ना हजारे को मिला समर्थन इसका प्रमाण है। यह सपने देखने नहीं बल्कि यथार्थ को गढ़ने और जीने का दौर है। इसके लिए सत्ता की चौहद्दियों पर कब्जा जमाए लोग जितने दोषी हैं उतनी ही आम आदमी पर दशकों से थोपी गई असहायता भी तरक्की की राह का रोड़ा बन गई है। प्रणाली के तीनों खंभे जड़ता भरी जर्जरता के शिकार हो गए हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जानेवाला मीडिया भी तरह-तरह के विवादों की लपेट में है। इसीलिए यह समय ऐसे गंभीर आत्ममंथन का है, जब न केवल राज कर रहे लोग, बल्कि इस देश का जिम्मेदार आवाम भी इस काल-जर्जर सिस्टम के कायाकल्प में सक्रिय भूमिका अदा करे। पर यह हो कैसे?

जिम्मेदार मीडिया संस्थान होने के नाते हम पिछले एक साल से अंदर ही अंदर इस सवाल से जूझ रहे थे। हमारा मानना है कि मीडिया को समाज से सिर्फ कदमताल नहीं करनी चाहिए बल्कि जरूरत पड़ने पर उससे कुछ कदम आगे बढ़कर गाइड की भूमिका अदा करनी चाहिए। आजादी के बाद शुरुआती दौर में समाज के साथ मीडिया ने भी कुछ पटखनियां खाईं और एक बार जो लंगड़ाकर चलना शुरु हुआ तो आगे चलकर एक विशाल वैचारिक अपंगता में तब्दील होने लगा। देश की यह इतिहास-सिद्ध खूबी है कि उसे अपने विकास के लिए लंबी चौड़ी क्रांतियों की जरूरत नहीं होती। यहां के लोग खुद अपनी रहगुजर बनाते हैं। इसीलिए छटपटाहट के इस दौर में यह अपने अंदर झांकने का समय है। हमारे सामने यक्ष प्रश्न था। एक मीडिया संस्थान के मुट्ठी भर लोग यह कैसे तय कर सकते हैं कि इतने विशाल पाठक वर्ग को क्या चाहिए? उसकी जरूरतें क्या हैं? उसकी आकांक्षाएं किधर देख रही हैं? समय की मांग को वह खुद किस तरह लेता है और उसकी हमसे उम्मीदें क्या हैं? हफ्तों चले वाद-विवाद के बाद हमने सवालों की सूची बनाई और हजारों दरवाजों को जवाब की तलाश में खटखटाना शुरू किया। कई चौंकानेवाले निष्कर्ष सामने आए। उन्हें विचारों की आग में तपाया और पकाया गया। कंटेंट बनाया। जरूरी डिजाइन रचे और फिर से जनता के दरबार में हाजिर हुए। अधिकांश को लगा कि हां, अखबार ऐसा ही होना चाहिए। यकीन जानिए। हिंदी का अखबार निकालना आसान नहीं है।

महादेवी वर्मा ने मुझसे तीस साल पहले हिन्दी मीडिया की दुर्दशा पर चर्चा की थी। मैंने उनसे कहा था कि हमारा पाठक वर्ग इतना विशाल और इतना बहुआयामी है कि उसे एक साथ संतुष्ट करना बेहद मुश्किल है। हमें महादेवी वर्मा से लेकर मुंगरा बादशाहपुर के एक पान विक्रेता तक को संतुष्ट करना होता है। इन तीन दशकों में यकीनन समय बदला है। हमने बिहार और झारखंड की गलियों तथा गांवों में समाधान ढूंढ़ते हुए पाया कि वहां के लोगों की सोच उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली एन.सी.आर. के उन लोगों से काफी कुछ मेल खाती है। सबके सब तरक्की चाहते हैं। इसके लिए एक जवाबदेह अखबार से वे नया नजरिया चाहते हैं। उन्हें अपने वैचारिक आग्रहों को छोड़ने में भी कोई गुरेज नहीं है बशर्ते, इससे उनके और उनके परिवार की तरक्की होती हो।

हम भी मानते हैं कि तरक्की की शुरुआत सबसे पहले आम आदमी से ही होनी चाहिए। इस बात की भी खुशी है कि तीन दशकों में महादेवी वर्मा जैसे लोगों और मुंगरा बादशाहपुर के वैचारिक धरातल में समानता के काफी बिंदु उभरे हैं। इन्हीं बिंदुओं को जोड़कर हमने एक सांचा बनाया जो ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की कहावत पर समूचे तौर पर खरा उतर सके। चाहे वे हमारे परिशिष्ट हों या फिर रोजमर्रा की खबरों को देखने का तरीका। आज से हमारी पूरी कोशिश होगी कि हम हिन्दी हृदय प्रदेश के जागृत लोगों के लिए एक ऐसा अखबार बना सकें जो उनके सपनों को पूरा करने में उनकी मदद करे। इसीलिए जो ‘हिन्दुस्तान’ अब हर रोज आपके दरवाजे पर दस्तक देगा वह पहले के मुकाबले ज्यादा सुगठित और विचार संपन्न होगा। हम पूरी विनम्रता से यह भी कहना चाहेंगे कि डिजाइन में परिवर्तन सिर्फ अपने पन्नों को खूबसूरत बनाने के लिए नहीं किए गए हैं। यह कंटेंट को ज्यादा व्यवस्थित और आपकी रुचि के अनुरूप बनाने की एक कोशिश है।

संसार के सबसे बड़े न्यूजपेपर डिजाइनर माने जाने वाले डाक्टर मारियो गारसिया से भी यही आग्रह था कि हम आपकी खूबियों का इस्तेमाल अपनी विरासत को संवारने और बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं। खुशी है कि उन्होंने इसके लिए भरपूर शोध किया और हमें जो समाधान सुझाए वे चौंका देनेवाले थे। अब ‘हिन्दुस्तान’ ज्यादा साफ-सुथरा होगा। इसके फोंट आपकी आंखों को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सुकून देंगे और हमें ज्यादा सामग्री परोसने में सुविधा रहेगी।

एक बात और आपसे साझा करना चाहूंगा। हमने नये कलेवर और तेवर के लिए 12 अप्रैल को जानबूझकर चुना है। आज ‘हिन्दुस्तान’ अपनी शानदार सेवा-यात्रा के 76वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पाठकों की समूची तीन पीढ़ियों के स्नेहिल संरक्षण को रिटर्न गिफ्ट देने का इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता था?

शशि शेखर

प्रधान संपादक

साभार : हिंदुस्तान


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