दैनिक जागरण के झूठ के खिलाफ धरना शुरू

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पेड न्यूज के मामले में भद पिटा चुके दैनिक जागरण ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधान सभा और स्थानीय निकाय चुनावों में पैसे के बदले लोकप्रियता बेचने की मुहिम चला रहा है. नतीजा जनाक्रोश के रूप में सामने आ रहा है. जागरण की ब्लैकमेलर रणनीति का केंद्र बन चुके उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में लगभग आधा दर्जन संगठन जागरण के खिलाफ धरने पर जा बैठे हैं. धरने पर बैठे संगठनों ने जागरण पर कई तरह के आरोप लगाए हैं.

आरोप है कि पैसे लेकर ये अखबार अभी चुनावों से पहले ही उमीदवार विशेष के समर्थन में न सिर्फ हवा बनाने की कोशिश कर रहा है बल्कि उन्हें जबरिया समाजसेवी बनाकर भी प्रस्तुत कर रहा है और जनता को दिग्भ्रमित करने वाली भविष्यवाणियां कर रहा है जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. ये पूरा मामला नवगठित ओबरा विधान सभा से जुडा हुआ है. यहाँ पर राजनैतिक दलों के दिग्गजों समेत कई छात्र नेता भी चुनाव मैदान में हैं. जानकारी मिली है कि एक वक्त छात्रसंघ बहाली को लेकर आत्मदाह की कोशिश में बुरी तरह से झुलसे और छात्र संघर्ष समिति के संयोजक विजय शंकर यादव भी चुनावों में उतरने वाले हैं. उनके समर्थन में दो दिनों पहले कई संगठनों ने अपनी एक आम बैठक बुलाई थी और एक प्रस्ताव पारित किया था.

लेकिन हद तब हो गयी जब दैनिक जागरण ने अगले दिन उस आम सभा को एक दूसरे उम्मीद्ववार, जिससे अखबार को लाखों का विज्ञापन मिलता है के समर्थन में दिखा दिया. सिर्फ इतना ही नहीं, अखबार ने ये खबर भी छाप दी कि छात्र संघर्ष समिति ने भी उसी उमीदवार का समर्थन किया है. महत्वपूर्ण है कि इस वक्त जागरण का ओबरा संवाददाता प्रमोद चौबे पूर्व में स्थानीय निकाय चुनावों में प्रतिनिधि रह चुका है और अपनी गतिविधियों को लेकर हमेशा से चर्चा में रहा है. जैसे ही ये खबर लोगों ने अखबार में पढ़ी, आग बबूला हो उठे और अखबार के विरुद्ध  धरने पर बैठ गए. अखबार के खिलाफ हो रहे इस धरना प्रदर्शन में विभिन्न संगठनों के साथ साथ आम नागरिक और छात्र भी शामिल हो गए हैं.

महत्वपूर्ण है कि दैनिक जागरण ने पूर्व के चुनावों में भी जेब के हिसाब से प्रत्याशियों के समर्थन विरोध में ख़बरें छापीं. अखबार का ये कारनामा अब सिर्फ चुनावों तक ही नहीं रहता. अखबार द्वारा चुनावों के बाद भी स्थानीय स्तर पर राजनैतिक भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए मुहिम शुरू कर दी जाती है. जो जितना धन खर्च करता है अखबार के भीतर के पन्नों पर उतनी ही जगह पाता है. शर्मनाक ये है कि बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपदों में भ्रष्ट धनपशुओं और बाहुबलियों को संसद विधानसभाओं के साथ साथ स्थनीय निकाय में प्रतिनिधित्व देने की ये मीडियाई गुणा गणित अखबार के खिलाफ तो माहौल तैयार कर ही रही है, जागरण के पत्रकारों के लिए भी शामत का सबब बन गयी है.

जनपद के “फोरम आफ जर्नलिस्ट“ ने इस पूरे मामले पर दैनिक जागरण को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि झूठी और पेड ख़बरें छापकर अखबार न सिर्फ जनता को बेवकूफ बना रहा है, बल्कि पत्रकारों और पत्रकारिता को भी शर्मसार कर रहा है. वहीँ “छात्र संघर्ष समिति” के संयोजक विजय शंकर ने कहा है कि जब तक जागरण के स्थनीय प्रतिनिधि को बर्खास्त नहीं किया जाता और संपादक महोदय खुद ये सब दोहराए न जाने का आश्वासन नहीं देते, तब तक ये धरना जारी रहेगा.


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Comments (6)Add Comment
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written by कौवा पांडे , April 21, 2011
इस घटना के पीछे पूर्व बयूरोप्रमुख चंद्रकांत पांडे उनके गुर्गों और उनके गुरु घंटाल गोविन्द जी भैया का हाँथ है ,ये लोग जैसे तैसे करके जागरण अखबार के सत्ताधारी राकेश पण्डे को हटा कर अपना कब्ज़ा जमाना चाहते हैं ,जानकारी तो ये भी है कि इस आन्दोलन को मुकाम तक पहुंचाने के लिए चंद्रकांत ने धन भी मुहैया कराया हैप्रमोद चौबे और राकेश पांडे दोनों असली पत्रकार हैं ,चंद्रकांत पांडे एंड कंपनी पत्रकारिता की जगह सोनभद्र में धन ,बल और ब्लेकमेलिंग का साम्राज्य स्थापित करना चाहती है ,जिसका एक हिस्सा गोविन्द गुरु को भी जायेगा
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written by RITESH SRIVASTAVA, April 20, 2011
good job vijay bhai lage rahehe is viswas k sath k sach thak sakya par parajit nahi so sakta main aur mere bahut say dosto jis kisi ney bhi aap k sangarsho k kahni padi un sab ko yeh viswas ho chala k ab jo log abhi tak jhoot k sahare say age badthe rahe ab unke benaqb hone ka samay aa gaya hai .We hope ur struggle well make gr8 change.Aise reporters jo fake news bana kar cheap popularity hasil karna chahte they atre the black spot on yhe face of journalism. I personally request to the innocent readers and to the respected news paper to please avoid this type of jorunalist and get rid of them as soon as posible .To maintain there as they say tak sach zinda rahe
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written by ak nagkric, April 19, 2011
bhai, yaswant ji, es khabar ko chalane ke pahle kam se kam prmod chaube se ka bhi pachh liya jana chahiye tha. etna ap jan len ki dharne par bathe bijaysankr adi mahaj ek mohra hain. asal kel pharde ke piche se awadh khann men akanth lipth jagran dwara kabhi dutkare gaye, bad men puchkare gaye byakti ka hath hai. chunki us byakti ki chahat hamesha se obra office hathiakar awadh khann ka bishal samrajya khara karne ka raha hai. ummid hai asaliyat ki tahkikat kar sahi chij samne layenge
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written by ak nagkric, April 19, 2011
phoram of journlist kis chiria ka nam hai, ye to mujhe nahi pata, eske agua ka nam de diye hote to kliyer ho gaya hoto. etna jarur pata hai ki ap tak es khabar ko phuchane wale ki samajik stithi jara bhi achi nahi hai. awadh khanan se lekar blakmeling tak akanth dube huye hain. bhaiya yaswant apko bhi kam se kam pramod se bhi bat kar leni chahiye thi, thabhi ese portal par lana chahiye tha. etna mai bata dena chahta hu ki es purv niyojit propgande ke piche kabhi jagran se dutkare, bad men ek prabhawsali ke hastschep par puchkare gaye byacti tatha obra men ek pan tak ke liye patrkarita ki dhauns dene wale byacti ka hata hai. ak nagrik
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written by praful kumar mishra, April 19, 2011
nam bade darshan chote kuch yahi hal media main bade akhbaro ka hai . yah akhbar salery ke nam per kuch nahi dete hai parkeroko jese ke chalte yah paterkero ko yah hal hai
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written by Rakesh, April 19, 2011
एक मूर्तिकार का बेटा था उसने मूर्ति बनाने के व्यापार में हाथ आजमाना शुरू किया. काम में लगन होने कि वजह से उसने बहुत बेहतरीन काम किया. उसको इस बात कि कोफ़्त थी कि उसके पिता ने कभी उसके काम कि तारीफ नहीं की. एक बार उसने पूरी शिद्दत से पत्थर तराश के मूर्ति बनाना शुरू किया...बिना अपने पिता को बताये बहुत दिनों तक काम करने के बाद उसने कला का एक नायाब नमूना पेश किया... पूरे शहर क्या पूरे राज्य में उसका नाम हुआ. उसके पिता ने देखा और बहुत तारीफ की. जब उसे पता चला कि यह मूर्ति उसके बेटे ने बनायीं है तो उसने कहा... "आज मैंने एक कलाकार कि हत्या कर दी." यह एक सकारात्मक आलोचना का ही प्रभाव था कि मेरे बेटे ने अभी तक अपने जीवन कि सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ बनायीं. जब एक कलाकार को आत्ममुग्धता कि बीमारी लग जाये तो उसकी कला का ही अवमूल्यन होता है." स्वतंत्र और निरपेक्ष आलोचक न होने कि वजह से कुछ ऐसा ही हाल पत्रकारिता का हो चला है. आशा है कि आपके इस लेख से हमारे पत्रकार भाई अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों और समाज में अपने लेखन के महत्व को समझेंगे

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