फिर से प्रकाशित होने लगा 'द संडे पोस्‍ट'

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दो अंकों के ब्रेक के बांद साप्ताहिक अखबार 'द संडे पोस्ट'  फिर प्रकाशित होने लगा है। पिछले महीने 'द संडे पोस्ट'  के प्रबंधन ने अपने जनपक्षीय तेवरों का हवाला देते हुए उत्तराखंड सरकार द्वारा विज्ञापनों पर लम्बे समय से प्रतिबंध लगाए जाने से अखबार बंदी का एलान कर दिया था। घोषणा के मुताबिक अखबार का प्रकाशन भी बंद कर दिया गया था। लेकिन इस बीच अखबार को बंद किए जाने के फैसले के पक्ष-विपक्ष में प्रतिक्रियाएं आने से अखबार के प्रबंधन ने दो अंकों के बाद फिर अखबार निकालना शुरू कर दिया है। अखबार अपने धारदार तेवरों के साथ बाजार में आ रहा है।

लिख की सच जिंदा है अब तक

अपूर्व जोशी

'द संडे पोस्ट'  को बंद कर पाना मेरे बस की बात नहीं। पिछले दस सालों में कई बार ऐसा लगा अब इस अखबार को निकाल पाना संभव नहीं। हिम्मत कई बार चुकने को हुई फिर मामला संभल गया। सच तो यह कि आर्थिक दृष्टि से यदि लाभ-हानि को आधार मान आकलन किया जा, तो इसे कब का बंद हो जाना चाहिए था। लेकिन यह कोई बिजनेस तो है नहीं कि साल के अंत में लाभ की बैलंसशीट का होना अनिवार्य हो। अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर के शब्दों में-  'A good news-paper, i suppose, is a nation talking to itself.' 'द संडे पोस्ट' को कुछ ऐसा ही समाचार पत्र बनाने का हमारा प्रयास रहा। कामरेड समर भन्डारी, सचिव भाकपा उत्तराखण्‍ड का फोन आया कि '' भाई 'दि संडे पोस्ट'  उत्तराखंड का का जरूरी अखबार है, अब बंद हो रहा है तो कहीं भीतर से दुखी हूं। यह मेरी आदत में शुमार हो गया है।''  कुछ ऐसा ही पत्रकार और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी ने फोन पर कहा। सबसे पहला फोन वरिष्ठ स्तंभकार/लेखक सुभाष गताडे का आया था। वह भी खिन्न थे कि अखबार बंद हो रहा है। लखनऊ से पत्रकार राकेश श्रीवास्तव ने फोन पर जानकारी दी कि 'भड़ास 4 मीडिया'  वेब पोर्टल पर 'द संडे पोस्ट'  के बंद होने पर विस्तार से आया है।

पत्रकार दीपक आजाद ने देहरादून से इस पोर्टल पर अपने विचार रखे। उन्होंने मेरे संपादकीय को आधार बना उत्तराखण्‍ड की निशंक सरकार को निशाने पर लिया। देहरादून से ही प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र 'उत्तराखंड आज'  ने भी 'चुकाई यशोगान न करने की कीमत'  शीर्षक से इस बाबत निशंक सरकार की कड़ी आलोचना की। मैं इन सभी मित्रों/ शुभचिंतकों का हृदय से आभारी हूं। आप सभी ने मुझे अपने निर्णय पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया। 27 मार्च को कौसानी के निकट रनमन में एक विद्यालय के कार्यक्रम में भाग लेने गया। दो दिन रानीखेत रहा। वहां भी अखबार के बंद होने पर सभी ने खेद जताया। मुझे स्वयं पिछले दो हफ्तों से एक अजब किस्म की बेचैनी का अनुभव हो रहा था। इसे खालीपन भी कहा जा सकता है। नैनीताल-हल्द्वानी मार्ग में ज्यूलीकोट के निकट सड़क किनारे नर्सरी देख कुछ पौधे खरीदने की इच्छा हुई। नर्सरी के मालिक रहीस भाई ने बातचीत के दौरान बताया कि वह 'द संडे पोस्ट'  के नियमित पाठक हैं और अखबार को बहुत सहेज के रखते हैं। इन सब प्रसंगों का जिक्र इसलिए क्योंकि इन्हीं के चलते मेरा विश्वास, कि इस अखबार के बगैर अधूरा हूं, और दृढ़ हुआ।

साथ ही शुभ चिंतकों, मित्रों और आम पाठकों ने जोर दिया कि इस अखबार के जनपक्षीय और निष्पक्ष तेवरों की राज्य को सख्त जरूरत है। जहां तक मेरे वजूद का प्रश्न है, मेरे पैशन का सवाल है, मुझे 'थर्टी सेकन्ड्स ओवर टोक्यो'  जैसी कैंति के लेखक बॉब कोन्सडाइन का यह कथन याद आता है-  ''call it vanity, call it arrogant presumption, call it what you wish, but I would grope for the nearest grave if i had no newspaper to work for, no need to search for and sometimes find the winged world that just fits, no keen wonder over each unfolding day may bring.''  पिछले दो सप्ताह मेरे लिए ऐसे ही थे। मेरे सहयोगी और परिजन, मेरे मित्र और इस अखबार के कई शुभेच्छु पिछले कुछ अर्से से यह सलाह देने लगे हैं कि पॉजीटिव बनो, कुछ सकारात्मक लिखो। इतनी निगेटिविटी भली नहीं आदि-आदि। स्वयं मुझे भी कई बार यही लगने लगता है। कोशिश पूरी करता हूं कि 'द संडे पोस्ट'  को सकारात्मक सोच वाला अखबार बना सकूं। लेकिन कुछ अर्से बाद वापस वही ढाक के तीन पात।

दरअसल, चारों तरफ जब अंधकार का साम्राज्य हो तो कैसे यह पॉजीटिविटी संभव है? प्रतिष्ठान विरोधी होना ही हमारा प्रारब्ध है। हमारी यही विश्वनीयता भी है। कैसे हम सत्ता समर्थक हो सकते हैं? यह तो आत्महत्या समान होगा। मैं कभी भी लाभ-हानि के तराजू पर तौल कर इस अखबार को नहीं चला सकता। जब तक छपेगा श्रेष्ठ मूल्यों के प्रति समर्पित रहेगा। यही मेरा और इस अखबार का धर्म है। दीपक आजाद ने 'भड़ास 4 मीडिया डॉट कॉम'  पर जो लिखा उस पर आई कुछेक प्रतिक्रिया भी मैंने पढ़ी। जो हमारे पक्ष में हैं उन्हें छोड़ मैं एक 'शुभेच्छु'  नामक किसी छद्मनामधारी की टिप्पणी का यहां उल्लेख करना चाहूं,  जिन्होंने लिखा है कि 'द संडे पोस्ट'  भू-माफियाओं और विज्ञापन माफियाओं का अखबार है। यानी जो अखबार आर्थिक दिक्कतों, विशेषकर उत्तराखण्‍ड सरकार द्वारा विज्ञापन रोक दिए जाने के चलते बंदी के मुहाने पर आ खड़ा है,  वही विज्ञापन माफिया और जिस व्यक्ति की पूरे उत्तराखण्‍ड में एक इंच भूमि न हो वह भू-माफिया। यूं इस प्रकार की अनर्गल टिप्पणियों के हम आदि हो चुके हैं। हर वह जिसके खिलाफ लिखा गया हमें ब्लैकमेलर का खिताब देने से नहीं चूकता, भूमाफिया और विज्ञापन माफिया जरूर पहली बार मिले 'सम्मान'  हैं।

दिल्ली सरकार में एसडीएम पद पर बैठे एक महानुभाव द्वारा उत्तराखण्‍ड में गलत तरीके से खरीदी गई जमीनों को लेकर जब ' द संडे पोस्ट'  ने मुहिम चलाई तो जरूर पर्चेबाजी अल्मोड़ा शहर में मेरे खिलाफ हुई थी। बुद्धिजीवियों के इस शहर में इस तरह के पर्चेबाजी का कल्चर पुराना है। उत्तराखण्‍ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी जो स्वयं अल्मोड़ा के ही निवासी हैं,  इसका शिकार होते रहे हैं। मैं बहुत गर्व के के साथ कहता हूं कि ' द संडे पोस्ट'  को भू-माफियाओं/विज्ञापन माफियाओं का अखबार साबित करने का षड्यंत्र चाहे जितना हो, दुष्प्रचार चाहे कोई कितना भी क्यों न करे ऋषिकेश भूमि घोटाला का सच सामने लाने और लगभग चार सौ करोड़ की जमीन जिसे निशंक सरकार ने पूरी बेहयायी और बेशर्मी के साथ खुर्द-बुर्द कर डाला था, उसे वापस राज्य की संपत्ति बनवाने का श्रेय तो 'द संडे पोस्ट'  को ही देना होगा। हालांकि कइयों को यह मेरा बड़बोलापन लग सकता है, फिर भी मैं याद दिलाना चाहूंगा कि इस अखबार ने पिछले दस सालों में लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्लाबोला।

उत्तराखण्‍ड में शायद ही किसी अन्य अखबार के तेवर इतने तीखे और प्रतिष्ठान विरोधी रहे होंगे। यही कारण है कि राज्य से प्रकाशित कई ऐसे अखबारों जिनका नाम तक शायद ही किसी ने सुना हो, को लाखों का विज्ञापन राज्य सूचना निदेशालय देता आया है। जाहिर है इसके पीछे राजनीतिक दबाव से कहीं ज्यादा सेटिंग-सेंटिंग का कमाल है। यह कोई मिथ्या आरोप नहीं बल्कि ऐसा कड़वा सच है जो सूचना के अधिकार के चलते सामने आया है। चूंकि हम कड़वे हैं इसलिए ब्लैकमेलर हैं, भूमाफिया हैं, निगेटिव सोच वाले हैं और जो मीठे हैं, जिनकी भाषा की मिठास उच्च मंत्रियों और नौकरशाहों को भाती है उन्हें मिलते हैं एक ही अंक के लिए 35-35 लाख के विज्ञापन। तो भड़ास में प्रकाशित इस टिप्पणी ने भी मेरे संकल्प को मजबूती देने का काम किया कि अखबार जारी रहेगा ही रहेगा। तेवर भी वही पुराने रहेंगे यानी तीखे और प्रतिष्ठान विरोधी। हालांकि कुछेक बदलाव जरूर हमने किए हैं। 24 पृष्ठों के बजाय अब केवल 16 पृष्ठ ही हैं।

खबरों के प्रस्तुतिकरण का तरीका भी थोड़ा बदला है। युवाओं को जोड़ने की नीयत से भी कुछेक बदलाव किए हैं। लोकवाणी का पेज समाप्त है क्योंकि चिट्ठियों का आना आश्चर्यजनक रूप से कम हो गया है। यदि पत्र आते हैं तो उन्हें माह के किसी एक अंक में अवश्य स्थान दिया जाएगा। 'जीवित इतिहास'  नाम से एक नया स्तंभ शुरू किया जा रहा है जिसके जरिए  ऐसी घटनाओं से पाठकों को रू-ब-रू कराया जा रहा है जिन्हें जान-बूझकर दफन कर दिया गया लेकिन जो किसी न किसी रूप में आज भी जीवित हैं। अन्य स्तंभ भी शुरू किया जा रहे हैं जिन्हें आप आगामी अंकों में देखेंगे। साथ ही इस अखबार के माध्यम से एक नई पहल भी शुरू करने का मेरा इरादा है,  हालांकि अभी उस पर कुछ लिखना जल्दबाजी होगी। इतना इशारा अवश्य दूं कि मेरी दृष्टि में पत्रकार केवल तटस्थ आलोचक अथवा समीक्षीक नहीं हो सकता। हमारे देश के कई बड़े संपादक एवं बुद्धिजीवी मानते हैं कि संपादक- पत्रकार एक्टिविस्ट नहीं होता। यानी वह किसी मुद्दे को लेकर मोर्चा नहीं खोल सकता। मैं इस धारणा को नहीं मानता। मेरी सोच है कि स्टैंड लेना और उसे युद्धु में बदलना जरूरी है। तो आने वाले समय में इस समाचार पत्र के माध्यम से ऐसा कुछ करने का मेरा इरादा है, संकल्प है। इंतजार है सही समय का। तो उन सभी से जिनकी जिंदंगी का हिस्सा बन चुका है 'द संडे पोस्ट'  अब दो सप्ताह के अस्थाई ब्रेक के बाद नियमित मुलाकातों का क्रम फिर से शुरू होता है, इस विश्वास और कामना के साथ कि अब यह क्रम सांसों के बने रहने तक बना रहेगा।

(लेखक अपूर्व जोशी दि संडे पोस्ट के मालिक-संपादक हैं। संडे पोस्ट को बंद करने की घोषणा के दो सप्ताह बाद अखबार को फिर शुरू करने पर उन्होंने अखबार में यह संपादकीय लिखा है।)

संडे पोस्ट से संबंधित खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें - निशंक का कोप : साप्ताहिक से मासिक होगा दि संडे पोस्ट

देहरादून से दीपक आजाद की रिपोर्ट.


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