हर सप्‍ताह अमर उजाला में आयोजित होता है बेइज्‍जत दिवस!

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अजय कृष्‍ण त्रिपाठीवाराणसी अमर उजाला में इधर बीच काफी दिनों से सम्पादकीय कर्मचारी बेहद तनाव में बताए जाते हैं। काम का बोझ और जरूरत पड़ने पर अवकाश न मिलना आम बात हो चुकी है। सर्वाधिक कष्ट सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों को सोमवार की साप्ताहिक मीटिंग में झेलना पड़ता है। प्रत्येक सोमवार को सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों के कार्यों की समीक्षा की जाती है।

इस समीक्षा में अबतक किसी भी रिपोर्टर अथवा सहायक सम्पादक की प्रशंसा नहीं हुई, सिवाय डांट- फटकार के खून-पसीना बहाकर ड्यूटी बजाने वाले को कुछ नहीं मिलता। सोमवार की मीटिंग में सम्पादक महोदय बारी-बारी से लगभग पचासों लोगों का क्लास लेते है और उनके कार्यों में कोई न कोई त्रुटि निकालकर फटकार भी लगाते हैं। भीगी बिल्ली बने यह कर्मचारी आपस में सोमवार की मीटिंग को बेइज्जत दिवस करार दिये हैं। इस मीटिंग में कोई ऐसा नहीं बचता जिसे फटकार न सुननी पड़ती हो। ज्यादातर कोपभाजन डेस्क के लोग हीं होते है।

सोमवार की मीटिंग में जाने से पहले कर्मचारियों को सांप सूंघा रहता है। इस मीटिंग में कभी किसी की प्रशंसा नहीं की गयी। कर्मचारियों का कहना है कि प्रत्येक कर्मचारी कभी न कभी कोई न कोई ऐसी खबर जरूर दिया होगा जिसकी सराहना होनी चाहिए, कुछ खबरों की सराहना तो पाठक करता है लेकिन ऐसी सराही गयी खबरों की प्रशंसा सोमवार की मीटिंग में नहीं की जाती बल्कि खोज-खोज कर रिपोर्टरों और डेस्क पर काम करने वालों की त्रुटियां ही निकाली जाती है। ऐसी वजह है कि सोमवार की समीक्षा बैठक को सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों बेइज्जत दिवस घोषित कर रखा है।

इधर एक ऐसी चर्चा उभरी है कि प्रत्येक जिलों में डेस्क से एक व्यक्ति एक सप्ताह के लिए भेजा जाएगा जो वहां जाकर लोगों को दिशा-निर्देश देगा। ऐसी सुगबुगाहट से भी लोग परेशान हैं कि इस गर्मी में अपना ठीहा छोड़कर दूसरे जिलों में जाना पर वहां काम करना कितना मुश्किल होगा। मरता क्या न करता के अंदाज में फिलहाल अमर उजाला के कर्मचारी मन मारकर काम में लगे है और व्यवस्था परिवर्तन की बांट जोह रहे है। यह भी खबर है कि आगामी सप्ताह दो सप्ताह के भीतर यहां के स्थानीय सम्पादक भी यहां से स्थानान्तरित होने वाले हैं, अब लोग उनके स्थानान्तरण की बांट जोह रहे हैं, और सोच रहे हैं कि शायद नये सम्पादक के आने पर कुछ स्थितियां बदले। फिलहाल तो लोग बेइज्जत दिवस से निजात पाना चाह रहे है।

बनारस से अजय कृष्‍ण त्रिपाठी की‍ रिपोर्ट.


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Comments (3)Add Comment
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written by kamlesh, April 22, 2011
अगर आप लोगों में जरा भी गैरत होती तो बेइज्जती की ऐसी नौकरी को लात मारकर अपना काम कर रहे होते। अब झेलो इसको। smilies/angry.gifsmilies/angry.gif
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written by kapila khanm, April 22, 2011
¹ाह अमर उªााला में कûइÊ बात ³ाहीं है। ªामा³ो Àो Àाु³ाती आ रही हूं। हम तमाम दûÀतûं ³ो एक बार बैठकर इÀा अपमा³ाकारी र½ौए के बारे में Àाûचा। मामला ¹ाह है कि Ãोत्री¹ा Àतर के ªिात³ो भी अखबार हैं-अमर उªााला, ªाागर¯ा, भाÀकर, राªाÀथा³ा पत्रिका--¹ाा ऐÀो तमाम और। इ³ाकी अदरू³ाी Àांरच³ाा ³िाहा¹ात अद्धÊÀाामंती, Àााहूकारी और बबÊर है। इ³ाके ÀांÀथापकûं के पाÀा कभी कûइÊ ½ाड़ा ½िाªा³ा ³ाहीं था। छûटे Àतर Àो शुरू हुए और औकात Àो अ²िाक ªागह पा गए। इ³ाके भीतर का Àाब कुछ लिªालिªाा और ªालील है। कमÊचारि¹ाûं कû ¹ाथाÀांभ½ा कम ½ोत³ा दे³ाा, उ³हें गालि¹ाûं Àो ³ा½ााªा³ाा, कमरतûड़ काम ले³ाा इ³ा अखबारûं की का¹ाÊÀांÀकÈति का हिÀÀाा है। कह Àाकते हैं कि ªौÀो कûइÊ भट्ठा मालिका Àामाªा में पÀारी गरीबी और बदहाली का फा¹ादा ÀाÀतेदर में मªादूर रखकर उठाता है, ½ौÀो ही ¹ाह अखबार अप³ो मु³ााफाखûरी के लिए शिÃिात बेरûदगारûं का ³ााªाा¹ाªा फा¹ादा उठाते हैं और चौबीÀाûं घंटे उ³हें अंडर-फा¹ार रखकर र¢त के आखिरी बूंद तक चूष¯ा करते हैं। कûइÊ Àांपादकी¹ा का¹ाÊÀांÀकÈति ³ाहीं है। काफी दि³ाûं तक इ³ा अखबारûं के मालिक घरा³ाûं के बेटे बहू, भाइÊ भतीªो ही Àांपादक हûते थे। ¹ाह कित³ाा बड़ा दुभाÊग्¹ा है कि ªाû लûग ªिांदगी में एक पत्र तक ³ाहीं लिख पाते, ½ो Àांपादक ब³ा ªााते हैं। ¹ाा³ाी Àांपादक हû³ो के लिए बड़ा-लिखा हû³ाा ³ाहीं, प्रिगिंट प्रेÀा लग½ाा³ाा ªारूरी है। कइÊ अखबारûं में तû अभी भी ऐÀो ही Àांपादक हैं। अमर उªााला ªाब फैला तû कुछ लीगल-कार¯ाûं Àो Àांपादकी¹ा ½िाभाग Àो लेकर Àथा³ाी¹ा Àांपादक ³ााम दे³ो की परंपरा ªााली गइÊ। लेकि³ा इÀामें भी Àाब ªााल बष है। Àथा³ाी¹ा Àांपादक के तौर पर ³ााम किÀाी का ªााता है और प्रभारी हûता है कûइÊ और। ¹ाा³ाी अभी पाठकûं कû ²ाûखा दि¹ाा ªाा रहा है।
Àामाªा कû लेकर कûइÊ बड़ी ³ाªार ³ा हû³ो की ½ाªाह Àो अंदरू³ाी लûकतंत्र की ªागह लठैतगीरी चलती है। अमर उªााला में प्रभारि¹ाûं कû कÀााइ¹ाûं का पा½ार दि¹ाा ªााता है। कह Àाकते हैं कि ½ाह ठेके पर तै³ाात एक आदमी है, ªिाÀाके ³ाीचे तमाम ठेके पर काम कर³ो½ााले मªाूर हûते हैं। इÀालिए बेहतर ¹ाही हûगा कि इ³ा अखबार में काम कर³ो ½ााले कमÊचारी खुद कû ½ौÀाा ही देखें। ¹ाह बात लûगûं कû ªाल्द ही Àामझ में आ भी ªााती है। ÀामÀ¹ाा उ³ा ³ाए और भûले-भाले ¹ाु½ाकûं कû हûती है, ªाû Àाचमुच थûड़े Àामझदार और Àांदे½ा³ाशील हûते हैं। पढ़³ो-लिख³ो½ााले। ½ो ª¹ाादातर टिक ³ाहीं पाते। कûइÊ कूढ़मगªा और गंदा Àाा प्रभारी ऐÀो लûगûं का बदाÊश्त ³ाहीं करता। दªाʳाûं ऐÀो लûग हैं ªाû टुच्चे और भ्रष्ट प्रभारि¹ाûं की ½ाªाह Àो अमर उªााड़ा छûड़ गए और पत्रकारिता में अच्छा काम कर पाए। कइÊ तû इले¢ट्रा³िाक मीडि¹ाा में भी Àाफल रहे। एक बेचारे क½िा थे, ªाû इ³ा प्रभारि¹ाûं कû ‘रिंग मै³ा’ कहते थे। मुझे लगता है कि इ³हें Àाुपारी-Àांपादक कहा ªाा³ाा ठीक हûगा। ¹ो खुद ठेके पर हûते हैं। इÀालिए अंदर Àो इत³ो डरे हûते हैं कि कहीं उ³हें हटा ³ा दि¹ाा ªााए। तब उ³हें अप³ाा काम कû Àाही रख³ो और अखबार कû बेहतर कर³ो का ÀाबÀो अच्छा तरीका ¹ाही Àामझ में आता है कि रिपûटÊरûं और उपÀांपादकûं कû चौबीÀा घंटे चांप चढ़ाए रखû। कित³ो रिपûटÊर अÀाम¹ा दिल के मरीªा हû ªााते हैं कित³ो हाइÊपर-टेंश³ा के शिकार। कुछ तû आत्मÀामपʯा करके Àाी²ो-दलाल ब³ा ªााते हैं। खाते हैं और बªााते हैं। इ³ा Àाभी मामलûं में अखबारमालिक की शह और मिलीभगत हûती है। ¹ाह Àा½ााल ¢¹ाûं ³ाहीं पूछा ªाा³ाा चाहिए कि दूÀारे Àांगठ³ाûं और दलûं में लûकतंत्र Àांूघ³ो ½ााले अखबारûं के भीतर कûइÊ ½िापÃा ¢¹ाûं ³ाहीं हûता ? ¢¹ाûं अखबारûं में कûइÊ कमÊचारी ¹ाू³िा¹ा³ा ³ाहीं हûती ? इ³ा अखबारûं कû गहराइÊ Àो देखा ªााए तû इ³हûं³ो भी Àाा½ाʪा³िाक ÀांÀाा²ा³ाûं का दûह³ा ही कि¹ाा है और Àामाªा कû लूटा है। मशी³ा, ªामी³ा, कागªा, Àोल्Àाटै¢Àा Àाब में छूट चाहिए। ¢¹ाûं ? अगर आप उद्यम हैं तû उद्यम की शतûÊं पर आइए। इ³ाकी पड़ताल की ªााए तû अखबार Àामूह ªामी³ा घûटाले में किÀाी Àो कम ³ाहीं ³िाकलेंगे।
Àामाªा में पÀारी बेरûªागारी का भ¹ा दिखाकर लûगûं कû अपमा³िात कर³ा की भी कûइÊ हद हû³ाी चाहिए। के½ाल अमर उªााला की बात ³ाहीं है। दूÀारे अखबारûं की भी Àिथति ऐÀो ही है।

कपिला खा³ाम, दिल्ली
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written by Suprio Ray, April 22, 2011
सिर्फ आप के कार्यलय में ही एसा नही होता, हमारे यहाँ भी एसे ही महोल रोज बना रहता है। मालीक का काम अपना बेंक बेलंस बड़ना होता है, कर्मचारीयों की ..... .........

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