विष्णुजी, आप खुद को महान सिद्ध करने के लिए दूसरों को नाकारा घोषित करने के आदी हो चुके हैं

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श्रीयुत विष्णु जी, प्रणाम। This is in connection to the lengthy telephonic discussion held with you on 15th Aug’10.I was under the deep toxic impact of the high narcotic dose given to me by people plotting a conspiracy against me so I could not respond back to you and since then I am still under going the toxic effect and long illness.

But I was very keen to respond you back strongly for your base less and meaningless talks and I feel that the right time has come now. You very well understand that it’s none other than me who understood   your skills and potential which you carried during your Agra regime and your loyalty towards Jagran too. (Reference Note: It’s about 1987 when Newspaper AAJ was launched and was in its initial phase in Agra. The then you were the first reporter among the fleet who left DJ and joined AAJ.)

The true fact is this that you are heading with your full planning to make Jagran reach at its worst and bottom of fame. You cannot imagine the height of dissatisfaction leading among the people associated with the paper right from the units, District and Tehsil level(editorial staff) and this all has arisen only because of your impractical, impatient, partial and dictator kind of behavior. Let’s not discuss it any further and discuss only things related to me…….

आपके पास मेरे और आगरा यूनिट के बारे में जानकारियां बेहद आधी-अधूरी हैं। मेरा मानना है कि आधी-अधूरी जानकारियां अथवा अधकचरा ज्ञान बहुत घातक होता है। उस स्थिति में नतीजे गलत, सिर्फ गलत ही आते हैं।

सबसे पहले मैं आपको यह बता दूं कि जूनियर सब एडिटर के पद पर रहते हुए भी मुझे स्थानीय प्रबंधतंत्र ने तीन बार लोकल इंचार्ज (चीफ रिपोर्टर) बनाकर रखा और उसके बाद दोबार मैंने स्वयं चीफ रिपोर्टर की कुर्सी पर बैठने से स्पष्ट इनकार कर दिया था। वर्ष ९१ से ९९ की इस अवधि के दौरान एक बार जनरल डेस्क का और तीन बार प्रादेशिक डेस्क का इंचार्ज भी रहा। यहां मैं विनम्रता के साथ यह बताना चहूंगा कि स्थानीय प्रबंध तंत्र के पास इंचार्ज के रूप में मेरा कभी कोई विकल्प नहीं था। इस दौरान आपके 'आज के अर्जुन' भी इसी संस्थान में कार्य करते थे।

--सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और आवश्यक तथ्य नोट करें कि १९९५ में तत्कालीन प्रधान संपादक आदरणीय नरेंद्र मोहन जी द्वारा कानपुर में बुलाई गई समाचार संपादकों की पहली बैठक में तत्कालीन न्यूज एडीटर श्यामजी को जबरिया छुट्टी पर घोषित कर स्थानीय प्रबंध तंत्र ने जूनियर सब एडिटर होते हुए भी अकेले मुझे इस बैठक में आगरा से कानपुर भेजा था। आपके 'आज के अर्जुन'  तब क्राइम रिपोर्टर थे और प्रशांत कुलश्रेष्ठ उस समय जनरल डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे। फिर भी मुझे इस काबिल क्यों समझा गया कि जूनियर सब एडिटर होते हुए भी मैं समाचार संपादकों की इस बैठक में आगरा का प्रतिनिधित्व करूं। आदरणीय सुनील गुप्ता जी मेरे इस कथन के गवाह हैं। अफसोस कि श्री विनोद शुक्ला जी मेरी ये गवाही देने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं।

--वर्ष १९९०-९१ के दंगों में पत्रकारों के उत्पीड़न और दंगे के समाचारों की जांच के लिए आगरा आई भारतीय प्रेस परिषद की टीम के सामने अकेले मुझे ही भेजा गया। उनके तीन दौर के सवाल-जवाब मैंने ही झेले थे। प्रबंध तंत्र के पास प्रेस परिषद को झेलने के लिए कोई और विकल्प क्यों नहीं था, जबकि आगरा में चीफ सब एडिटर और न्यूज एडिटर भी काम करते थे?

--१९९८ में उच्च प्रबंध तंत्र और मेरे बीच तत्कालिक परिस्थितियों  और आपसी अविश्‍वास के चलते मैंने स्वेच्छा से चीफ रिपोर्टर का पद यह कहते हुए सशर्त छोड़ दिया था कि मैं आज के बाद किसी भी कीमत पर चीफ रिपोर्टर की कुर्सी नहीं संभालूंगा। आदरणीय सुनील जी और तत्कालीन न्यूज एडिटर गिरीश मिश्र ने जब मुझे फिर से चीफ रिपोर्टर बना दिया तो मैंने उनके प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकरा दिया था. श्री सरोज जी स्वयं इसके गवाह हैं।

---वर्ष १९९८-९९ में आदरणीय सुनील गुप्ता जी ने मुझे न्यूज एडिटर घोषित करते हुए सरोज जी को साथ ले जाकर आगरा और मथुरा में तमाम प्रभावशाली और महत्वपूर्ण लोगों से मेरा परिचय नए न्यूज एडिटर के रूप में करा दिया था, लेकिन मैंने तत्कालीन परिस्थितियों में आपसी अविश्‍वास के चलते न्यूज एडिटर बनने से इनकार कर दिया था। श्री सरोज जी मेरे इस कथन के प्रत्यक्ष गवाह हैं।

---श्री गिरीश मिश्र द्वारा जागरण आगरा छोड़ने के बाद सरोज जी ने एक नहीं बल्कि कई बार न्यूज एडिटर बन जाने के लिए मुझ पर दबाव डाला, लेकिन मैंने स्वयं इनकार किया। ये इनकार मेरी किसी कमजोरी के कारण नहीं था, बल्‍कि अविश्‍वास के कारण था।

....लेकिन मैंने सरोज जी को आश्‍वस्त किया था कि समाचार संपादक की कुर्सी पर बैठे बिना ही मैं आपको कोई समस्या नहीं आने दूंगा। मैंने उस दौर में जागरण के प्रबंध तंत्र को समाचार संपादक की कमी कभी महसूस नहीं होने दी और कंधे से कंधा मिलाकर सरोज जी का साथ दिया। वे ही मेरे इस कथन के गवाह हैं। उस दौर में अखबार ने हर क्षेत्र में कितनी उन्नति की यह बताने की मुझे जरूरत नहीं है। प्रसार, विज्ञापन के आंकड़ों के अलावा अखबार की लगातार बढ़ती हुई लोकप्रियता इसका प्रमाण है।

---आगरा के बहुचर्चित गैंग रेप प्रकरण में जब जागरण की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई थी और अमर उजाला से सीधी अखबारी जंग छिड़ गई थी, तो उसे बचाने के लिए जी-जान से मैं ही सामने आया था। उस दौरान आगरा में जांच करने आई प्रदेश और राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम को झेलने के लिए संस्थान के पास मैं इकलौता व्यक्ति था। उस समय आपके 'आज के अर्जुन'  क्या कर रहे थे? उनकी काबिलियत और बोल्डनेस तब कहां घास चरने गई थी?

---जनवरी २००५ में जागरण की ही गृह पत्रिका ''टीम जागरण'' में मुझे मेरे परिवार के साथ सचित्र छापते हुए संपादकीय प्रभारी अधिकृत रूप से घोषित किया गया था। आदरणीय विष्णु जी, मुझे इस पद से कब, किसने और क्यों हटा दिया यह मुझे तो क्या, किसी को भी नहीं पता। आखिर क्यों? टीम जागरण संस्थान की पत्रिका थी और प्रकाशन के लिए सामग्री भी स्थानीय संपादक द्वारा भिजवाई जाती थी, मेरे द्वारा नहीं।

शहर के तमाम कायर्क्रमों में भाग लेने पर जागरण ने ही नहीं, बल्कि  दूसरे स्थानीय अखबारों ने भी मुझे संपादकीय प्रभारी के रूप में ही छापा है।

विष्णु जी, आपने मुझसे सवाल किया था कि मैं २००५ के बाद कहां था, हर जगह तो आनंद शर्मा ही जा रहे थे।  महोदय, इसका जवाब ये है कि आनंद जी को जबरन सरोज जी से सिफारिश करके मैंने ही अपने साथ ले जाना शुरू किया था। मैं मानेसर की पहली बैठक के अलावा, लखनऊ की चुनावी बैठकों और नोयडा में श्री राजीव खुराना के कार्यक्रमों में भी विधिवत शामिल होता रहा हूं। मैंने तो बाद में आनंद के अलावा सुनयन शर्मा और आशीष भटनागर को भी अपनी जगह इन बैठकों में इस आशय से भिजवाया था ताकि आगरा से निकलकर वे अपने संस्थान की ऊंचाइयों से रूबरू हो सकें और जागरण ग्रुप का भव्य स्वरूप खुद अपनी आंखों से देख सकें।

...... हां, उसके बाद कई बार मैं स्वास्‍थ्‍य कारणों (डिस्क स्लिप) के कारण लंबे सफर से स्वयं भी बचता रहा और इसके लिए बाकायदा देवेश भैया और सरोज जी से इजाजत लेता था।

....विष्णु जी आपने मुझसे पूछा था कि मैं पांच साल से कहां था? अब मैं आपसे पूछता हूं कि आप उससे पहले के सात सालों में (१९९८ से २००५ तक) कहां थे? जो आपको मैं कहीं दिखाई नहीं दिया? यदि आप उस समय सशरीर जागरण में ही थे तो सिर्फ अपने आप में और अपनी यूनिट में मगन रहे होंगे। उस समय आपको आगरा के असली हालात के बारे में कोई जानकारी क्यों नहीं रही, यह आप जानें।

विष्णु जी, मैं आपको याद दिलाता हूं कि जब आप मीतेन-प्रभजोत रघुवंशी की शादी में आगरा आए थे, तो आपने कार्यक्रम स्थल पर आकर मुझसे कहा था कि मैं आपकी वजह से लेट हो गया। मैंने सआश्‍चर्य आपसे पूछा था - कैसे, तो आपने कहा था कि मैं होटल में लोकल चैनल पर आपकी डिबेट देख रहा था। आप जिस तरह डिबेट में हावी थे, उसे देखकर मुझे लगता है कि जागरण की ब्रांडिंग का इससे बेहतर कोई तरीका हो ही नहीं सकता। इसके लिए आपने मुझे बधाई भी दी थी। मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि मैंने कभी भी सिर्फ अपने पद और विभाग के लिए नहीं, बल्कि प्रसार और विज्ञापन के साथ तालमेल कर पूरी यूनिट के लिए कार्य किया है।

....अब मैं एक बहुत बड़ा और स्पष्ट कारण भी आपको बता दूं कि मैं बैकफुट पर खुद क्यों गया था। दरअसल सन २००६ के बाद कुछ लोगों को अपना अस्तित्व मेरे कारण संकट में नजर आने लगा था। उनके अंदर अति-महत्वाकांक्षा अंगड़ाईयां लेने लगी थीं। संस्थान के अंदर और बाहर मेरी लोकप्रियता उनकी नींदें उड़ा रहीं थीं। मानेसर और नोयडा-दिल्ली के रास्ते मैंने उन्हें दिखा ही दिए थे। यही वजह थी कि फिर मेरे खिलाफ साजिशें शुरू हो गईं। साजिशों, अंतरकलह और गंदी कूटनीतिक चालों से दूर रहने के लिए ही मैं बैकफुट पर गया था। हर बार प्रबंध तंत्र से पंगा लेकर मैं ही उच्च प्रबंध तंत्र की नजर में खलनायक क्यों बनता रहूं? जबकि उसका फायदा सबको यहां तक कि कंपनी को भी मिलता है।

वर्ष २००७ में जब अखबार को फादर्स प्रॉपर्टी की तरह प्रयोग करते हुए प्रातः स्मरणीय आनंद शर्मा जी ने मेरे प्रभाव को खत्म करने के लिए अखबार में ही मोर्चा खोल दिया। सरोज जी सहित पूरा आगरा कार्यालय इसका गवाह है कि आनंद शर्मा को मेरे कोप से बचने के लिए मूक रूप से फिर से मेरी ही शरण में आना पड़ा था।

मैंने आदरणीय देवेश भैया को अखबार के दुरुपयोग के अलावा सरोज जी और आनंद की जुगलबंदी के संबंध में उसी समय बता दिया था। उन्होंने डेढ़ साल तक उन पर निगरानी भी रखी और सरोज जी की कृपा से आनंद जी ने समाचार संपादक के लिए अपनी दावेदारी की, तो देवेश भैया ने उन्हें आगरा से मेरठ का रास्ता दिखाते हुए कहा था कि अब सरोज जी और आनंद का ये नेक्सेस मैंने तोड़ दिया है। आप निश्चिंत होकर काम करें। पर्दे के पीछे से आगरा के कामकाज को अप्रत्यक्ष रूप से आनंद ने मेरठ में बैठकर प्रभावित किया। मैं और रवि शर्मा समय-समय पर देवेश भैया को इस बारे में बताते रहे और वे हमें हमेशा आश्‍वस्त करते रहे।

विष्णु जी, मैं पूछता हूं कि सन १९९९ से २००९ तक जब आगरा यूनिट बिना किसी समाचार संपादक के निर्बाध गति से चलती रही और बेहतर परिणाम देती रही तो फिर ऐसा क्या हो गया कि आनंद के मेरठ जाते ही सरोज जी ने आगरा में न्यूज एडिटर की कमी का राग अलापना शुरू कर दिया और उस पर अंत में आप भी ताल-ठप्पे लगाने लगे।

....अब आप कहेंगे कि आगरा में कंपनी के हिसाब से कोई कार्य नहीं हो रहा था तो मेरा जवाब है कि जब मुझे संपादकीय प्रभारी तो क्या, प्रादेशिक इंचार्ज के रूप में भी स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने दिया जा रहा था तो मैं आपको कोई परिणाम कैसे देता? प्रादेशिक के दो-दो जिले तो राजेश मिश्रा और अनिरुद्ध चौहान के पास थे। मुझसे यह कहा गया था कि मैं जिलों में उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने दूं। यदि वे चाहें तो उन्हें आवश्‍यक दिशा-निर्देश दूं।मैं सिर्फ वही कर रहा था जो मुझे आदेश दिए गए थे।

....आपने वही देखा जो आपको दिखाया गया। पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के चलते कभी भी फैसले सही नहीं होते। मेरे इस कथन को भविष्य स्वयं ही सिद्ध कर देगा।

विष्णु जी मैं मूल रूप से एक क्राइम रिपोर्टर हूं। मुझे जांच करना भी आता है, सबूत जुटाना भी और सबूत मिटाना भी। मैं आपके इस वक्रोक्ति को सिरे से खारिज करता हूं कि मैंने जो आरोप लगाए हैं उनका जांच अधिकारी भी मैं ही बनूं। न तो आपका यह कहना स्वभाविक रूप से ठीक था और न ही कानूनी रूप से। शिकायतकर्ता स्वयं जांच अधिकारी कैसे हो सकता है? मैं एक स्थापित पत्रकार हूं और मुझे पता है कि एक-एक लाइन और एक-एक शब्द का अपना एक अर्थ होता है। मैं तो सबकुछ साबित कर सकता हूं, लेकिन क्यों करूं? आप और कंपनी अपना काम क्यों नहीं करना चाहेंगे? आप और कंपनी इनको गोद मैं बैठाएं या गले से लगाएं इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

विष्णु जी हर व्यक्ति का अपना अलग जीवन दशर्न होता है। अपने गुरुजनों और अग्रजों पर सार्वजनिक और मनमाने कटाक्ष करने का आदर्श कार्य आपको ही मुबारक हों। मेरे परिवार ने मुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए हैं। बाबू गुलाबराय के शब्दों में 'जो अपने जीवन को जितनी अच्छी तरह जी लेता है, वह उतना ही बड़ा कलाकार है, लेकिन हम जैसे लोगों को जीने की कला नहीं आती'। विष्णु जी, यह कलाकारी आप को ही मुबारक हो। मैं हर जन्म में ईश्वर से यही कामना करुंगा कि मुझे आप जैसा बुद्धिमान, कामयाब और महान कभी सपने में भी न बनाए।

कुछ लोगों को परपीड़ा में आनंद की अनुभूति होती है। मनोविज्ञान की भाषा में उन्हें सेडिस्ट कहते हैं। क्षमा चाहते हुए बड़ी विनम्रता से कहना चाहूंगा कि उन्हीं में से एक आप भी हैं। आप स्वयं को महान सिद्ध करने के लिए दूसरों को नाकारा घोषित करने के आदी हो चुके हैं और इसके लिए हमेशा उतावले दिखते हैं। आप ऐसा दिखावा करते हैं जैसे जागरण इस मुकाम पर सिर्फ आपके करामाती दिमाग से पहुंचा है और यूनिटों में काम करने वाले लोगों का तो कहीं कोई योगदान ही नहीं है। आप तो धन्य हैं प्रभु।

आपने जागरण के संपादकीय विभाग को पेजिनेटर और आपरेटर बनाने का हैरतअंगेज कारनामा कर के कंपनी का कितना भला कर दिया है यह जागरण के प्रबंध तंत्र को आज नहीं तो कल पता चल ही जाएगा। ये तो मात्र एक उदाहरण है । संपादकीय विभाग में किए जा रहे तमाम अस्वाभाविक नए प्रयोग आप जैसे 'हीरे' ही कर सकते हैं।

परम आदरणीय विष्णु जी मेरा आपसे कोई पूर्वाग्रह और दुराग्रह नहीं है। अपनी भावनाओं के बारे में आप स्वयं जानें। ईश्वर मुझे, आपको और हम सबको सद्बुद्धि देते हुए सदमार्ग दिखाए। ईश्वर आपको इससे भी ज्यादा यशस्वी और महान बनाए।

जागरण की विभिन्न यूनिटों में पत्रकारों की खाल ओढ़े बैठे कई चारण भाटों को यह प्रतिक्रिया करने की बहुत जल्दी होगी कि मेरे जैसे कड़वा सच कहने वाले व्यक्ति को तो तुरंत बर्खास्‍त कर दिया जाए। अफसोस कि उन्हें मैं ऐसी किसी प्रतिक्रिया का मौका नहीं दे रहा हूं।

मैं इसी माह सशर्त इस्तीफा दे चुका हूं जो कि मेरे सौभाग्य से और दूसरों के दुर्भाग्य से स्वीकार भी हो चुका है। आपको ये मेल भेजकर तो मैं सिर्फ जागरण के सैकडो सम्पादकीय सहयोगियों की भावनाएं आप तक पहुंचा रहा हूं जो बेचारे नौकरी के डर से आपके अव्यवहारिक नादिरशाही फरमानों का आये दिन शिकार हो रहे हैं.

क्षमा याचना सहित

विनोद भारद्वाज

आगरा

(यह पत्र विनोद भारद्वाज ने दैनिक जागरण के सभी मालिकों, संपादकों और मैनेजरों को भेजा है.)

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