पत्रिका ने बताया विज्ञापनदाता उसके माई बाप नहीं

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चैतन्‍य भट्टजबलपुर में तकरीबन एक बरस पहले आरंभ हुये अखबार ''पत्रिका''  ने अपने आक्रामक तेवरों और किसी को भी न छोड़ने की नीति से न केवल जबलपुर की पत्रकारिता को एक नई पहचान दी है बल्कि शहर के बड़े-बडे़ बिल्डरों द्वारा की गई जमीनों की बंदरबांट का खुले आम पर्दाफाश कर यह संदेश भी दे दिया कि विज्ञापन दाता अखबार का माई बाप नहीं होता, विज्ञापन अपनी जगह है और खबर अपनी जगह.

अभी तक जबलपुर में हर अखबार में किसी विज्ञापन दाता के खिलाफ यदि कोई खबर आती थी तो चाहे वो संपादक हो या फिर रिपोर्टर उसे इसकी सूचना अखबार के संचालकों को देनी होती थी,  समाचार उनकी टेबल तक पहुंचाना होता था इस निर्देश के लिये कि इसका क्या किया जाये? जाहिर सी बात है कि वह समाचार मालिक के पास से संपदकीय विभाग को कभी वापस नहीं मिलता था.  हां इस समाचार के बल पर अखबारों के मालिक उक्त विज्ञापनदाता के दो चार अतिरिक्त विज्ञापन जरूर कबार लेते थे.

स्थिति कितनी खराब और दयनीय थी कि प्रदेश के एक बड़े कहे जाने वाले अखबार के जबलपुर संस्करण के एक पत्रकार ने शहर के एक बहुत बड़े नियमित विज्ञापन दाता के खिलाफ एक समाचार छाप क्या दिया, बेचारे की नौकरी पर बन आई. किसी तरह जोड़-तोड़ कर उसने अपने नौकरी बचाई. किसी भी विज्ञापनदाता के खिलाफ समाचारों को प्रकाशन होना आज से एक साल पहले तक तो नामुमकिन ही था और यह किसी एक अखबार की नहीं बल्कि शहर के हर अखबार की कहानी थी.

लगभग एक साल पहले ''पत्रिका'' ने जबलपुर में अपना संस्करण शुरू किया,  आने के बाद उसने अपने तीखे तेवरों से जबलपुर के पाठकों को एक नई पत्रकारिता से परिचय करवाया. पत्रिका ने न कांग्रेस के विधायक को छोड़ा,  न भाजपा के नेताओं को,  यहां तक कि प्रदेश के एडवोकेट जनरल जो सरकारी सर्किट हाउस के कमरों पर कब्जा किये बैठे थे, के खिलाफ समाचार छाप कर उन्हें कब्जा छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया. नेताओं या किसी बड़े व्यक्ति के खिलाफ तो समाचार पहले भी कभी कभार प्रकशित हो भी जाता था, पर किसी विज्ञापनदाता के खिलाफ समाचार छपना तो जबलपुर के अखबारों में नामुमकिन ही था, पर ''पत्रिका''  ने इस मिथ को तोड़ा.

स्थिति ये बनी कि अंतिम पृष्ठ पर किसी बिल्डर का विज्ञापन छपा है तो मुख्यपृष्ठ पर उसके द्वारा जमीन हथियाने का समाचार भी ''पत्रिका''  में आपको पढ़ने मिल जायेगा.  जबलपुर में यह हिम्मत पत्रिका ने दिखाई इसका असर ये हुआ कि दूसरे अखबारों को भी मजबूरी में वे समाचार छापना शुरू करना पड़ा जो अभी तक नहीं छपते थे.  पत्रिका के इस आक्रामक रवैये ने दूसरे अखबारों को इस बात के लिये मजबूर कर दिया है कि यदि उन्हें प्रतिस्पर्धा में बने रहना है,  अपनी पोजीशन को बरकरार रखनी है तो उन्हें भी ऐसे समाचार छापने ही होंगे, चाहे वे किसी भी बड़े से बड़े विज्ञापन दाता के खिलाफ क्यों न हो.

पत्रिका की इस नीति से ऐसे संपादकों और पत्रकारों को हिम्मत मिली है जो सब कुछ जानते समझते हुये भी अपनी कलम ऐसे लोगों के खिलाफ नहीं चला पाते थे, जो विज्ञापनों के दम पर अपने आप को अखबारों का माई बाप मानते थे. ''पत्रिका''  ने ऐसे विज्ञापनदाताओं को भी उनका चेहरा दिखा दिया कि वे ये न समझे कि लाखों रुपयों के विज्ञापन देकर उन्होंने अखबारों को अपना गुलाम बना लिया है या अखबार उनके विज्ञापनों के बोझ तले दब कर अपने कर्तव्यों को भूल जायेंगे.

लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में संपादक रहे हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by ram sevak yadav, May 15, 2011
jabalpur ke patrkaron ne kitne rupaye se naukari chalo ki ayr aaj kitni sampatiyon ke malik hain jara ye bhi dekh lete to achcha hota jabalpur ke patrkar vijhyapan dene walon ke khilaf samachr laganyege to hi vo patrkar kahlayenge aisa to nahi hai patrkar ko to sirf sach jhapna hota hai khilaf ya samrthan kiska .sach chapna hai to jis jamin ki bandar bat karke antarrajiy bus aadda ban raha hai uske bare me es sahar ke ek bade afsar ka kahna hai ki ye unki uplabdhi hai us afsar se jabalpur ke patrkar kuon kuchch nahi puch rahe .
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written by dabang singh, May 10, 2011
kya bat karte ho aap. indore me patrika ke patrkaar blackmailing karke vigyapan jugaad rahe hai. gulaab kothari shoping maal hai
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written by yogendra verma, May 02, 2011
पतरिका का ने एक नई शुरूआत की है इसके लिये उसके संचालकों को सबसे पहले बधाई दी जाना चाहिये कि उन्‍होंने अपने संपादको और संवददाताओं को लिखने की छूट दी वरना आजकल तो अखबार में क्‍या लिखा जाना है ये संपादक नही बल्कि मालिक तय करतें है इस शुरूआत से दूसरे अखबारों के मालिको को भी सोचना होगा कि वे क्‍या करे यदि वे ऐसा नही करेगे तो पाठक उनके अखबारों को पढ्ना ही छोड् देगे क्‍योकि हर कोई सचाई जानना चाहता है और कम से कम मीडिया से तो यही उम्‍म्‍ीद करता है चैतन्‍य भटट जी को भी बधाई कि उन्‍होंने यह खबर भडास के माध्‍यम से मीडिया जगत तक पहुचाई जिस दिन सारे अखबार ये तय कर लेगे कि विज्ञापनों को खबरों से कोई लेना देना नही है उस दिन से सही पतरकारिता की शुरूआत हो जायेगी
योगेन्‍द्र कुमार
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written by manish , April 30, 2011
journalism of this sort must be encouraged by the readers
by incresing the readership of new paper.
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written by reporter, April 29, 2011
भट्ट जी आप में और पत्रिका संपादक में यही बात एक जैसी है. आप भी किसी की नहीं सुनते थे और पत्रकारिता धर्म का पालन करते थे. यही मुख्य वजह है की आप के दुश्मनों की संख्या ज्यादा और दोस्तों की कम. पत्रिका में जो हो रहा है वो काबिले तारीफ है.पत्रकारों को पहचान दिलाने और इज्ज़त से सर उठाकर चलने में बहुत मदद की है
संपादक जी सिद्धार्थ भट्ट का हम जबलपुर के रिपोर्टर धन्यबाद करते है.
आशा करते है आगे भी ऐसा ही जलवा बरक़रार रहेगा.

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