सहारा का संकट और शिवराज का विज्ञापन

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सहारा के संकट के दिनों में शिवराज सरकार के एक विज्ञापन ने उसके निवेशकों को सावधान कर दिया है. कहते हैं कि संकट आए तो अपने भी मुंह फेर लेते हैं. ऐसा ही हाल सहारा ग्रुप का है. मध्य प्रदेश में सहारा को राज्य सरकार हर महीने करीब पचास लाख का विज्ञापन देती है. और इतना ही विज्ञापन छत्तीसगढ़ से भी मिल जाता है.

स्ट्रिंगर्स भी तीस-चालीस लाख का विज्ञापन अलग से कर देते हैं. कुल मिलाकर चाँदी ही चाँदी रहती है सहारा की. लेकिन हाल ही में जबसे सहारा ग्रुप संकट में आया है, सहारा पैरा बैंकिंग के डिपाजिटर्स भागने लगे हैं. इसका एक कारण तो कुछ ''शुभचिंतकों'' का यह एसएमएस था कि शायद सुब्रत रॉय भी 2जी-3जी मामले में जेल जा सकते हैं, ऐसे में सहारा से अपना पैसा निकाल लेना उचित है. बची खुची कसर प्रदेश की शिवराज सरकार ने नईदुनिया, दैनिक भास्कर और पत्रिका सहित सभी प्रमुख अख़बारों में एक विज्ञापन छपवाकर पूरी कर दी जिसमें यह बताया गया है कि किसी भी ''आयाराम गयाराम फाइनेंस कंपनी में अपना पैसा न लगाएँ क्योंकि यह सुरक्षित नहीं''.

सभी जानते हैं कि सहारा का आधार ग्रामीण इलाकों के वे निवेशक हैं जिन्होंने बैंक से ज़्यादा ब्याज के लालच में वहाँ धन लगा रखा है. विज्ञापन में कहीं भी सहारा का नाम नहीं है लेकिन लोग जानते हैं कि ब्लैकमेलिंग के शिकार शिवराज को यही बेहतर मौका मिला सहारा से हिसाब बराबर करने के लिए. विज्ञापन और एसएमएस का असर यह हुआ कि सहारा पैरा बैकिंग का नियमित होने वाला कलेक्शन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. अब इसे कहते हैं दुबले और दो आषाढ़. विज्ञापन की प्रतिलिपि संलग्न है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


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