शेष कार्रवाई से बचने के लिए ली गई रविंद्र जैन की बलि

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एक गैर पत्रकार अख़बार मालिक से जिस तरह की उम्मीद की जानी चाहिए, राज एक्सप्रेस के मालिक अरुण सहलोत ने ठीक वैसा ही किया। उन्होंने राज एक्सप्रेस के ग्रुप सम्पादक रविन्‍द्र जैन को सरकारी दबाव में आकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। चर्चा है की रविन्द्र जैन को हटाने की कार्रवाई सहलोत और सरकार के बीच हुए एक गुप्त समझौते के तहत हुई है। चर्चा है कि मिनाल रेसीडेंसी के शेष अतिक्रमण को हटाने से रोकने के लिए सहलोत सरकार के सामने झुक गए।

बताते हैं कि सरकार की तरफ से समझौते की पहली शर्त रविन्‍द्र जैन को राज एक्सप्रेस से अलग करने की थी। यही नहीं सहलोत से यह भी कहा गया था कि वह रविन्द्र जैन को हटाने की सूचना अपने अख़बार राज एक्सप्रेस में इस प्रकार से छापें, जिससे रविन्द्र जैन को बे-इज्जत होने का अनुभव हो और दूसरे पत्रकार और अख़बार वाले भी इससे सीख ले सकें और भविष्य में सरकार के खिलाफ छापने से पहले सौ बार सोचें।

गौर तलब है कि गत दिनों सरकारी अमले द्वारा अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के तहत मिनाल मॉल को मटियामेट कर दिया गया था। मॉल तोड़े जाने का ठीकरा रविन्‍द्र जैन के सिर फोड़ा जा रहा था। रविन्‍द्र जैन के दुश्‍मनों ने तो अपने अखबार में इस बात को प्रमुखता से प्रकाशित भी किया था। अब सवाल यह उठता है कि सहलोत का मॉल क्या इसलिए तोड़ा गया कि वह सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर बनाया गया था? या इस लिए तोड़ा गया, क्योंकि सहलोत के अख़बार राज एक्सप्रेस में निरंतर सरकार विरोधी खबरें छप रहीं थी और उन ख़बरों को लेकर सरकार तिलमिला रही थी।

अगर पहली बात सही है तो मॉल तोड़े जाने के दोषी अरुण सहलोत स्वयं है, क्यों बनाया सरकारी जमीन पर मॉल। और अगर दूसरी बात सही है कि राज एक्सप्रेस में छप रही सरकार विरोधी खबरों से सत्ता में बैठे लोग अखबार के सम्पादक रविन्द्र जैन से नाराज थे तो सहलोत और रविन्‍द्र जैन के लिए इससे बड़ी उपलब्धि दूसरी कोई हो नहीं सकती। इसके लिए तो अख़बार के सम्पादक का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया जाना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है की आज अखबार मालिकों और सत्ताधारियों को भांडगिरी करने वाले पत्रकारों की जरूरत है न कि निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले रविन्द्र जैन जैसे ईमानदार पत्रकारों की जो नुकसान फायदे के गुणा-भाग में पड़ने की बजाए केवल पत्रकारिता को धर्म समझते हैं।

काश! यह बात अरुण सहलोत को अखबार निकालने से पहले समझ में आ जाती।

हमसे पूछो की सहाफत (पत्रकारिता) मांगती है कितना लहू
लोग समझते हैं यह धंधा बड़े आराम का है।

लेखक अरश्‍ाद अली खान पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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Comments (7)Add Comment
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written by bhupendra jain, May 18, 2011
सरकार विरोधी खबरें छापने के आरोप में राज ऐक्सप्रेस से विदा किये गये रविन्द्र जैन जैसे पत्रकारों का असल में यहीं हश्र होना चाहिये क्योकि जिस तरह अरुण सहलोत पत्रकार नहीं है उसी तरह रविन्द्र जैन भी पत्रकार नहीं है असल में उन्होनें एक मैनेजर के रूप में राज ज्वाइन किया था और धीरे धीरे मालिक के विस्वासपात्र बने इसके बाद शुरू हुआ असली खेल सरकार से लेकर उद्योग जगत से जुडे लोग सभी को एक ही चाबुक से चलाया जाने लगा अंत में अति का अंत हुआ और रविन्द्र जैन बन गये राज के बंटाधार। हम जैसे पत्रकारों को एक नकली पत्रकार को इस कदर निकाले जाने का कोई मलाल नहीं है ये सबक है अखबारों की दम पर ब्लैकमेल करने वालों का अंत ।
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written by Brijmohan , May 18, 2011
बिल्कुल सही लिखा है की रवीन्द्र जैन को बलि का बकरा बनाया गया है.अरुण सहलोत एक निहायत ही अहंकारी और शेख़चिल्ली जैसे सपने देखने का आदि है.साथ ही मानसिक रूप से विकृत है.अपने चम्मचों और जी हजूरियों के बीच बैठ कर शेखी बघारना इस का प्रिय शगल है.बाबूलाल गौर का लड़का इस का बिज़्नेस पार्ट्नर था जिस की बड़ी ही रहस्य मय परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी.अरुण सहलोत की मर्ज़ी के बिना राज ग्रूप में पत्ता नही खड़कता है,बेचारे रवीन्द्र जैन की क्या औकात कि वह अपनी मर्ज़ी से एक शब्द भी पेपर मेंचछपा सके.
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written by almaas, May 16, 2011
arshad sir baat yeh he ki,gerpatrkar akhbaar maaliko ka poori tarah se media par qabza he or patrkaro ki majboori he ki veh ji hazoori karen.jahaan tak patrkarita ka sawal he to wo ateet ki baat ho gayee he,ab to patrkarita ke naam par babu giri ho rahi he jisa akhbar ka malik chahta he vensa chhapta he.sarkar bhi nahi chahti ki patrkarita ho o babuon se hi khush he. jay m.p. jay bharat
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written by Mahesh, May 16, 2011
Ravindra jain apni galtiyo ke karan raj express se bahar hue hai.

Ravindra ka badbolapan, apne aap ko jayada hosiyaar samjhna, ye dono ke karan raj se bahar ho gay.

Ravindra apne Fayde ke liya apne sambaho ki bhi bali Chada deta hai. ye aadmi relation banabe layak nahi hai. Jab Raj Ke Malik 1,50000.00 Betan Or Zaylo Gaadi di thi to Ravindra ji duniya bhar mai gate firte hai. or malik ke liye kuch bhi kar gujarne ki baat kahte the.

Kher jo hua accha hua. kuch dino tak Patrkar Biradri Saant rahegi, Or is ghatna se dushre log sabak lenge. Dushre Ravindra ki rah par nahi Chalenge.

Bagwan Ravindra Ko Sadbuddi De.
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written by Vipin Jain, Indore, May 15, 2011
sarkaari virodhi muhim chalaneme ravindra jain ka poora haath hai. is mein arun sahlot ko doshi theraya nahi jaasakta. ravindra jain 100% doshi hai. aur isko iss se bhi bada saja milna chahiye. taki aisa galat sujhav ke anya akbar wale, saathi partrakar bhai aur bhadas jaisa website malik sabak seekh sake
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written by Manoj Jain shashi, May 14, 2011
ye akhbaron ke malik hote hi dhoorta hai. inka kam patrakarita karna nahi, apne papo ko chhipana ya phir blackmailing ke jariye apna ullu seedha karna jyada hota hai.
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written by kabeer, May 13, 2011
arshad bhai aapki baat bilkul sahi he shri jain ka kaam patrkarita he na ki arun sehlot ke kale jale ko mitne se bachana,jahaan tak unhe nikalne ki baat he yeh to patrkaro ka shoshan he.akhbaar malik na apna gussa jain parnikalkar patrkar jagat ke munh par tamachha jada he.iski jordar ninda ki jani chahiye?

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