तीन नए अखबारों की तीन दिशाएं

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: प्रस्‍तुति में डीएनए और जनसंदेश से आगे हैं जनवाणी : पिछले कुछ दिनों में मुझे कई सारे नए अखबारों के संपादक या मालिक से मिलने का मौक़ा मिला, जिसके बाद मेरे मन में एक बात निश्चित तौर पर आ गयी है कि इलेक्ट्रौनिक मीडिया तथा वेब मीडिया के आ जाने के बाद भी प्रिंट मीडिया अभी पूरी दमदारी से कायम है. हमारे देश में, खास कर हिंदी बेल्ट में, वैसे भी कई बार प्रिंट मीडिया को एक बहुत बड़ा लाभ मिलता है. वह है आम लोगों की वेब के प्रति गैर-जानकारी तथा अनभिज्ञता.

उसमे भी कई लोग जानकार हो कर भी वेब का नियमित इस्तेमाल नहीं कर पाते और इस तरह वेब की ताकत से महरूम रह जाते हैं. इसकी तुलना में लाख चाहने पर भी इलेक्‍ट्रानिक मीडिया प्रिंट या वेब का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि शब्दों को अपनी आँख से देख कर पढ़ने का जो आनन्द इन स्थानों पर मिलता है वह इलेक्ट्रौनिक चैनलों में नहीं हो पाता.

मैं बात कर रही थी हिंदी में नए उभर रहे अखबारों की, जिन्हें हम नए अखबार कह सकते हैं और कुछ हद तक छोटे अखबार भी. ऐसे ये अखबार इतने छोटे भी नहीं हैं पर दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला जैसे अखबारों की तुलना में छोटे तो माने ही जायेंगे, कम से कम प्रसार और बाह्य प्रस्तुति में. इस तरह का एक अखबार मैंने बहुत पहले जनमोर्चा देखा था जब हम लोग फैजाबाद में थे. मैं शीतला सिंह जी के कार्यालय भी गयी थी और देखा था कि किस तरह वे पिछले चालीस साल से अधिक समय से अखबार निकाल रहे हैं, अपनी तरह का अखबार निकाल रहे हैं और अपनी शर्तों पर निकाल रहे हैं.

यह सही है कि इस अखबार का प्रसार और प्रचार सीमित है और यह मुख्यतया फैजाबाद और आसपास के जिलों में ही बिकता और दिखता है, यह भी सही है कि बाकी बड़े अखबारों से यह कम पृष्ठों का है. पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि जनमोर्चा अखबार का महत्व किसी तरह से कम है.लेकिन अब तो जनमोर्चा बहुत पुराना अखबार हो गया है. एक लंबे समय से इस तरह का कोई अखबार मैंने वास्तव मे जनता के बीच जा कर अपना प्रभाव छोड़ने वाला नहीं देखा था. बहुत पहले हम लोग मुरादाबाद में थे तो वहाँ अम्बरीश गोयल एक अखबार निकालते थे, जो सांध्यकालीन था और जिसे जनता के बीच मान्यता थी. बाकी जगहों पर मैंने इस तरह की स्थिति कम ही देखी थी.

जिन तीन नए अखबारों की मैं चर्चा करुँगी उनमें दो लखनऊ के और एक मेरठ का है. इन में सबसे पुराना अखबार डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट है, जिसे संक्षेप में डीएनए कहते हैं. निशीथ राय इसके संपादक हैं, जो लखनऊ विश्वविद्यालय में आचार्य भी हैं और समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं. आम तौर पर यह धारणा है कि डीएनए अखबार समाजवादी विचारधारा का पोषक है और उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी से भी इसका जुड़ाव सर्व-स्वीकार्य है. मैं स्वयं देख रही हूँ कि पिछले एक लंबे समय से निशीथ राय इस अखबार के जरिये जनपक्षधरता को निरंतर सामने रख रहे हैं. मैं खास कर के शांति भूषण और उनके लड़के से जुड़े इलाहाबाद में ख़रीदे गए जमीन और मकान की खबर का जिक्र करुँगी जो सबसे पहले खबर डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में छपी थी. इस खबर में लगा आरोप कितना सही या गलत है, यह मैं नहीं जानती क्योंकि अभी मामला न्यायालय में है, पर इतना जरूर है कि इतने ताकतवर आदमी के खिलाफ खुल कर खबर लिखना बड़ी बात मानी जायेगी.

दूसरा जो नया अखबार सामने आया है वह है जनसन्देश टाइम्स. लखनऊ से प्रकाशित होने वाला यह अखबार आम तौर पर बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा माना जा रहा है, क्योंकि इसके बोर्ड में बसपा के कई बड़े नेताओं के जुड़े होने की बात कही जा रही है. साथ ही इस अखबार के उद्घाटन में जिस तरह से सत्तारूढ़ दल के कई मंत्री आये थे उससे भी इस बात को बल मिलता है. पर मैं एक बात बड़ी ईमानदारी से कहूँगी कि सुभाष राय जैसे संपादक, जो पूरी तरह से अपने पेशे के प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं, इस बात को पूरी तरह देख रहे हैं कि अखबार किसी पार्टी का मुखपत्र नहीं बन कर एक निष्पक्ष सामजिक दर्पण की तरह उभर कर सामने आये. इस रूप में सुभाष राय की मेहनत रंग लाती भी दिख रही है. मैं इस अखबार के सम्पादकीय विभाग से जुड़े हरेप्रकाश उपाध्याय का भी जिक्र करुँगी जो अच्छी-खासी मेहनत कर के जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ को विशेष उपलब्धियों से भरा बना रहे हैं.

तीसरा अखबार जनवाणी है, जो मेरठ से प्रकाशित हो रहा है. अन्य तमाम अखबारों से यह अलग इस रूप में है कि इसके मालिक इस अखबार के प्रचार-प्रसार पर पानी पैसे की तरह बहा रहे हैं. इन तीनों अखबारों में कलेवर और प्रस्तुति में जनवाणी बहुत आगे है क्योंकि जहां बाकी दोनों अखबार साफ़ तौर पर कुछ छोटे अखबार दिखते हैं, वहीं जनवाणी की प्रस्तुति उसे किसी भी बड़े अखबार से कमतर नहीं ठहराती. इस रूप में जनवाणी का अलग महत्व है. इसके साथ ही जिस तरह से मेरठ मंडल में जनवाणी का प्रचार किया गया है वह भी काबिलेगौर है. मैंने आज तक किसी स्थानीय अखबार का इतना व्यापक प्रचार नहीं देखा है. आप मेरठ में हैं तो आपको सिर्फ एक ही अखबार के बैनर पोस्टर पूरे शहर में दिखेंगे, जनवाणी के. हर चौक-चौराहे पर, सड़कों पर, हाईवे पर. मेरी जानकारी के अनुसार इस प्रचार के अच्छे नतीजे भी आ रहे हैं. इसके साथ एक संपादक के रूप में यशपाल सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी है और एक बड़े से टीम को काफी कुशलता के साथ संचालित कर रहे हैं. ये तीनों अखबार अलग-अलग ढंग से अपने आप को स्थापित करने और अपनी महत्ता बढाने में लगे हैं, देखें आगे स्थितियां किस तरह से परिवर्तित होती हैं.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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