गलतियों का पिटारा है अमर उजाला का ‘उत्तराखण्ड उदय’

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उत्तराखण्ड की समकालीन पत्रकारिता में ‘अमर उजाला’ का अपना एक महत्व और स्थान है। सन् 1970 के दशक में बरेली और 1980 के दशक में मेरठ से प्रकाशित होने के साथ ही अमर उजाला ने  उत्तराखण्ड के क्रमशः कुमाऊं और गढ़वाल मण्डल की पत्रकारिता में अपना एक मुकाम हासिल किया। इस समाचार पत्र ने दोनों मण्डलों के छोटे-छोटे कस्बों तक भी अखबार और समाचारों की पहुँच को आसान बनाया और जनसामान्य की जनसमस्याओं को समाचारों के माध्यम से प्रमुखता दी।

साथ ही अखबार ने यहाँ के रीति-रिवाजों, त्यौहारों, संस्कृति-समाज, भौगोलिक स्थितियों, जनांदोलनों, सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों को पत्रकारिता के माध्यम से नई पहचान दी। अमर उजाला के सम्पादकों और संचालकों ने पत्रकारों की एक टीम उत्तराखण्ड में तैयार की, जो यहाँ की हर घटना, परिघटना और यहाँ की धड़कनों से पूरी तरह जुड़े रहते थे। ‘अमर उजाला’ के उत्तराखण्ड की हर हलचल से गहरे तक जुड़े रहने के कारण ही एक समय उत्तराखण्ड में अखबार का मतलब ही ‘अमर उजाला’ से होता था। इसी कारण पिछले दिनों ‘अमर उजाला’ ने ‘उत्तराखण्ड’ के एक राज्य के रूप में दस साल पूरे करने पर जब ‘उत्तराखण्ड उदय’ के नाम से एक पुस्तक का प्रकाशन किया तो उसे खरीदने से खुद को रोक नहीं पाया। हालांकि 208 पेज की पुस्तक की कीमत 200 रुपए देखकर मन एक बार झिझका जरूर, पर खरीद ही लिया।

‘उत्तराखण्ड उदय’ को खरीदने के बाद घर आकर जब पन्ने दर पन्ने पलटे तो अपना माथा पीट लिया। ‘अमर उजाला’ जैसे प्रसिद्ध और जिम्मेदार अखबार के किसी प्रकाशन में उत्तराखण्ड से सम्बन्धित ढेर सारी गलतियाँ देखकर लगा कि शायद अब ‘अमर उजाला’ कई दूसरे अखबारों की तरह चलताऊ हो गया है। अन्यथा ‘उत्तराखण्ड उदय’ में इतनी गलतियाँ कैसे हो सकती हैं? लापरवाही या अज्ञानता की शुरुआत पेज-3 के ‘उत्तराखण्ड एक नजर में’ से ही हो जाती है। इसमें प्रमुख रेलवे स्टेशनों में रुड़की, लक्सर, काशीपुर, रामनगर, कोटद्वार, रुद्रपुर, हल्द्वानी, टनकपुर, लालकुआँ और खटीमा के नाम ही नहीं हैं। इसी पेज में प्रमुख धार्मिक तीर्थ स्थलों में जागेश्वर, बागेश्वर, पाताल भुवनेश्वर, गंगोलीहाट, गार्जिया देवी मंदिर (रामनगर) के नाम शामिल नहीं हैं।

उत्तराखण्ड के इतिहास पर लिखे गए दो लेखों- इतिहास की गौरव गाथा- जयप्रकाश उत्तराखण्डी और मानव संस्कृति के उषाकाल से आबाद- डॉ. देवकी नंदन डिमरी- में भी चंद शासन के सम्बन्ध में अलग-अलग कालखण्ड लिखे गए हैं। जय प्रकाश उत्तराखण्डी जहाँ अपने लेख में कुमाऊं में चंद शासकों का शासनकाल सन् 1455 के बाद मानते हैं वहीं डिमरी अपने लेख में इसे 13वीं सदी से मानते हैं। एक राजवंश के शासन काल में डेढ़ शताब्दी का अन्तर क्या दर्शाता है? इतिहास वाले हिस्से में विलसन नाम के एक अंग्रेज से सम्बन्धित रामेश बेदी का लेख क्यों शामिल किया गया? समझ से परे है। इसी हिस्से में डॉ. अतुल शर्मा के लेख ‘पहाड़ों में गूंजे थे आजादी के तराने’ में सतही जानकारी है। इसमें बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 1921 में बागेश्वर में हुए बेगार प्रथा के अंत के बारे में दो शब्द तक नहीं हैं और न ही सल्ट और खुमाड़ के प्रसिद्ध जनांदोलन के बारे में लिखा गया है। अब तक कलमकारों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन और टिहरी के प्रजामण्डल आंदोलन को एक साथ घालमेल कर स्वतंत्रता आंदोलन बताने की भेड़चाल अतुल शर्मा ने भी दिखाई है।

‘सफर एक जन आंदोलन का’ लेख में डॉ. डी.एन. भटकोटी ने यह नहीं लिखा कि उत्तरांचल राज्य का नाम कब से उत्तराखण्ड हुआ। जबकि राज्य का नाम उत्तराखण्ड 1 जनवरी 2007 से अस्तित्व में आया। इस लेख में 23 नवम्बर 1987 को उत्तराखण्ड क्रान्तिदल द्वारा दिल्ली में की गयी विशाल रैली का वर्णन न किया जाना अखरता है। ‘उत्तराखण्ड तारीख के पन्नों में’ में भी गम्भीर गलतियाँ की गयी हैं। इसमें श्रीयंत्रा टापू कांड 1995 में हुआ लिखा है, जबकि यह 1996 है। इसी तरह उधमसिंह नगर, रुद्रप्रयाग, चम्पावत, बागेश्वर जिलों का गठन भी 1996 में लिखा गया है, जबकि उधमसिंहनगर 1995 में तथा शेष अन्य जिलों का गठन 1997 में हुआ था। इसी में यह लिखा गया है कि 2002 के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला, जबकि काँग्रेस ने किसी भी दल के साथ कोई गठबंधन नहीं किया था, बल्कि उसे अकेले ही पूर्ण बहुमत (36 सीटें) मिला था।

इसी तरह उत्तराखण्ड का नाम उत्तराखण्ड बनने का प्रस्ताव विधानसभा ने 2006 में केन्द्र सरकार को भेजा था, न कि 2005 में। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने की बात लिखी गयी है, जबकि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, बल्कि वह सबसे बड़े दल के रूप सामने आई थी। बाद में उक्रांद के तीन विधायकों और तीन निर्दलियों के समर्थन से भाजपा ने सरकार बनाई। 2010 की घटनाओं में भीषण प्राकृतिक आपदा में लगभग दो सौ लोगों के मारे जाने का कोई वर्णन नहीं है।

भूगोल के अन्तर्गत ‘गढ़वाल और कुमाऊं मण्डल’ अध्याय में हरिद्वार जनपद के वर्णन में लिखा गया है कि इसके दक्षिण में रुड़की, मुजफ्फरनगर और बिजनौर जिले हैं। रुड़की कब जिला बना? यह अमर उजाला वाले ही जानें। साथ ही एक रोचक जानकारी यह भी है कि हरिद्वार जनपद को  मिलाकर एक संसदीय क्षेत्र बनाया गया है। सही यह है कि विधानसभा सीटों के नए परिसीमन के बाद हरिद्वार जनपद के 11 और देहरादून जनपद के 3 विधानसभा सीटों को मिलाकर हरिद्वार संसदीय (लोकसभा) सीट बनी है। इसी में लक्सर तहसील को ‘लस्कर’ लिखा गया है। इसी अध्याय में यह भी जानकारी दी गई है कि हरिद्वार में 9 विधानसभा सीटें हैं, जबकि नए परिसीमन में यह संख्या अब 11 हो गयी है। जिसके आधार पर 2009 में लोकसभा चुनाव हो भी चुके हैं।

उत्तरकाशी जनपद के विवरण में इसका गठन 1997 में लिखा गया है और यह भी कि 1997 में जनपद बनने से पूर्व उत्तरकाशी चमोली, पौड़ी और टिहरी जनपदों का हिस्सा था। जबकि उत्तरकाशी जनपद का गठन 24 फरवरी 1960 को हुआ। पौड़ी जिले के विवरण में सीमा से लगने वाले जिलों में अल्मोड़ा का नाम नहीं है जबकि पौड़ी के सीमान्त का काफी बड़ा हिस्सा अल्मोड़ा जनपद से मिला हुआ है। रुद्रप्रयाग के बारे में लिखा है कि ‘अलकनन्दा यहीं से आगे बढ़कर भागीरथी से मिलती हुई गंगा की ओर बढ़ती है,’ जबकि देवप्रयाग (टिहरी) में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और यहीं से भागीरथी का नाम गंगा पड़ता है।

अल्मोड़ा के विवरण में लिखा है, ‘अल्मोड़ा के लिए हल्द्वानी, काठगोदाम और नैनीताल से नियमित बसें चलती हैं लेकिन अधिकांश लोग गरमपानी मार्ग से जाना पसन्द करते हैं।’ इससे ऐसे लगता है जैसे अल्मोड़ा जाने का कोई और रास्ता है। जबकि सही यह है कि अल्मोड़ा जाने का मुख्य मार्ग हल्द्वानी और काठगोदाम से गरमपानी होकर ही जाता है। उधमसिंहनगर में सिर्फ तीन तहसीलों रुद्रपुर, खटीमा, काशीपुर का नाम लिखा है जबकि यहाँ बाजपुर, गदरपुर, सितारगंज, किच्छा और जसपुर में भी तहसीलें हैं और इनमें रुद्रपुर तो तहसील ही नहीं है। चम्पावत के बारे में कहा गया है कि यह पहले अल्मोड़ा जिले का हिस्सा था, जबकि सही यह है कि 1997 में अस्तित्व में आने से पहले इसका अधिकांश भाग पिथौरागढ़ तथा टनकपुर वाला क्षेत्र उधमसिंह नगर से जुड़ा था। नैनीताल के बारे में लिखा गया है कि इस जनपद की सीमाएँ अल्मोड़ा और उधमसिंहनगर से मिलती हैं जबकि नैनीताल की सीमाएँ इन दो जनपदों के अलावा पौड़ी और चम्पावत जिलों से भी मिलती हैं। सभी 13 जनपदों के बारे में आधी-अधूरी और सतही जानकारी दी गई है।

भूगोल के अन्तर्गत ही ‘गढ़वाल और कुमाऊं की भौगोलिक स्थिति’ शीर्षक से डॉ. प्रीतम सिंह नगी का आलेख छपा है। इसके पहले ही पैरा में लिखा गया है कि राज्य आंदोलन में कई ‘बेगुनाहों’ ने अपनी शहादत दी। जैसे कि शहादत गुनहगार देते हों? इसी पैरा के आखिर में लिखा गया गया है कि 2006 में जनभावना के आधार पर राज्य का नाम उत्तरांचल से ‘उत्तराखण्ड’ किया गया। जबकि यह 2006 न होकर 1 जनवरी 2007 है। इसी आलेख के दूसरे पैरे में डॉ. नेगी ने उत्तराखण्ड में 86 छोटे-बड़े शहरों की संख्या लिखी है। यह संख्या उन्होंने कहाँ से लिखी, यह तो वही जानें। शहर की परिभाषा डॉ. नेगी की कौन सी है?

यदि विकासखण्ड मुख्यालयों, नगरपालिका, नगर पंचायतों और एक नगर निगम, छावनी परिषदों, तहसीलों तथा उप तहसीलों को शहर मान लें तो यह आंकड़ा 200 से ज्यादा होता है। लगभग इसलिए कि अनेक नगर पालिका, नगर पंचायत ही ब्लॉक और तहसीलों के भी मुख्यालय हैं। वैसे इनकी कुल संख्या- 258 है। इसी पैरे में डॉ. नेगी ने यह भी लिखा है कि राज्य के भावर, तराई और देहरादून सांझा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। देहरादून को इसमें अलग से शामिल करने से यह भ्रम पफैलता है जैसे देहरादून तराई-भावर का अंग न हो। डॉ. नेगी देहरादून के प्रसिद्ध डी.ए.वी. कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर हैं।

सबसे ज्यादा घालमेल राजनीति के तहत ‘उत्तराखण्ड का राजनीतिक भूगोल’ के अन्तर्गत किया गया है। इसमें लोकसभा की पाँच सीटों में हरिद्वार का नाम ही गायब है। विधानसभा सीटों के नाम इतने गलत लिखे गए हैं कि लगता है उसके प्रूफ देखने की गलती किसी ने नहीं की। शायद यह गलती हो जाती तो विधानसभा के नाम सही छप जाते। थराली को थाराली, घनसाली को घानसाली, सहसपुर को साहसपुर, डोईवाला को दोइवाला, झबरेड़ा को झाबरेरा, पिरानकलियर को पीरनकलियार, यमकेश्वर को यामकेश्वर, डीडीहाट को दीदीहाट, कपकोट को कापकोट, द्वाराहाट को द्वारहाट, सल्ट को सल्त, हल्द्वानी को हलद्वानी, कालाढूंगी को कालाभूंगी, जसपुर को जासपुर, गरदपुर को गादरपुर लिखा गया है।

डी.ए.वी. कॉलेज के राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. डी.एन. भटकोटी ने भी राजनीति के अन्तर्गत ‘सियासत के 10 साल’ में अपनी चलताऊ राजनीति का ज्ञान ही उत्तराखण्ड के बारे में दर्शाया है। उन्होंने लिखा है कि तिवारी 7 मार्च 2002 को मुख्यमंत्री बने जबकि सही तिथि 2 मार्च 2002 है। तीसरे पैरे में डॉ. भटकोटी लिखते हैं कि राज्य गठन से पहले राज्य की पाँचों लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा था, जो कि गलत है। नैनीताल सीट पर नारायण दत्त तिवारी काँग्रेस के सांसद थे। अपने इसी लेख के प्रमुख पार्टियों की स्थिति के अन्तर्गत भाजपा का विश्लेश्षण करते हुए डॉ. भटकोटी लिखते हैं कि 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने टिहरी, पौड़ी और नैनीताल लोकसभा सीटें जीती, जबकि नैनीताल सीट काँग्रेस ने जीती और भाजपा ने अल्मोड़ा सीट जीती थी। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के वर्णन में भी डॉ. भटकोटी ने काँग्रेस के बारे में एक गजब का आंकड़ा पेश किया है। उन्होंने लिखा है कि राज्य गठन के समय उत्तराखण्ड में काँग्रेस के 8 विधायक थे। यह आंकड़ा कहाँ से लिया डॉक्टर साहब, हमें भी बता दें? यहाँ जरूर पिछली गलती सुधार कर भटकोटी ने लिखा है कि 2004 में नैनीताल से केसी बाबा काँग्रेस के सांसद बने।

इसी तरह ‘बहुजन समाज पार्टी’ के बारे में डॉ. भटकोटी लिखते हैं कि राज्य गठन के समय बसपा का एक विधायक था और उसके एक एमएलसी को विधायक का दर्जा देकर विधानसभा का सदस्य बनाया गया। जैसे कि किसी ने बसपा के साथ कोई कृपा की हो, जबकि वास्तविकता यह है कि भाजपा, काँग्रेस और बसपा के जो भी एमएलसी उत्तराखण्ड से थे उन सभी को उत्तराखण्ड की अंतरिम विधानसभा का सदस्य माना गया था। यहाँ भटकोटी ने 9 नवम्बर 2000 को बनी अंतरिम विधानसभा को कार्यवाहक विधानसभा लिखा है जो कि गलत है। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के वर्णन में एक गलत तथ्य डॉ. भटकोटी ने यह लिखा है कि उक्रांद हमेशा से गढ़वाल में दिवाकर भट्ट और कुमाऊं में काशी सिंह ऐरी के साथ बँटा हुआ रहा है।

इसमें उक्रांद का झंडा भी गलत प्रकाशित किया गया है। उक्रांद के झंडे का दो तिहाई हिस्सा हरे रंग का है और शेष एक चौथाई के उपर वाला आधा हिस्सा सफेद तथा नीचे का आधा हिस्सा लाल रंग का है। समाजवादी पार्टी के विवरण में लिखा है कि सपा के अम्बरीश कुमार अंतरिम विधानसभा में लोकलेखा समिति के अध्यक्ष बन गए। यह ऐसे लिखा गया है जिससे यह लगता है कि अम्बरीश अपने मन से अध्यक्ष बने। जबकि सही यह है कि विधानसभाध्यक्ष विधानसभा की विभिन्न समितियों के अध्यक्ष, सभापति के पद पर विधायकों को अपने विवेक से मनोनीत करते हैं।

‘उत्तराखण्ड के राज्यपाल’ के वर्णन में सुदर्शन अग्रवाल को 8 जनवरी 2005 से 22 अक्टूबर 2007 तक और उनके स्थान पर आए बीएल जोशी को 29 अक्टूबर 2007 से 18 जुलाई 2009 तक उत्तराखण्ड का राज्यपाल लिखा गया है। यहाँ पर सवाल यह है कि फिर 22 अक्टूबर 2007 से 27 अक्टूबर 2007 तक उत्तराखण्ड का राज्यपाल कौन था? इसी तरह मुख्यमंत्री निशंक का कार्यकाल 24 जून 2009 से लिखा गया है जबकि उनका कार्यकाल 27 जून 2009 से शुरू हुआ। इसी अध्याय में कोश्यारी का मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल 30 अक्टूबर 2010 लिखा गया है, जबकि सही है 29 अक्टूबर।

‘पहाड़ के मेले’ वाले अध्याय में भी उत्तरकाशी के माघ मेले, बागेश्वर और हल्द्वानी के उत्तरायणी मेले, द्वाराहाट के बिखौती मेले, श्रीनगर के बैकुंठ चतुर्दशी मेले, जौनपुर के मौण मेले, देवी धुरा के बग्वाल मेले, नैनीताल और अल्मोड़ा के नंदादेवी मेले, कशीपुर के चैती मेले तथा भीमताल के हरेला मेले का कोई वर्णन नहीं है। उत्तराखण्ड के प्रमुख तीज-त्योहार लेख के शुरू में झुमेलो नृत्य करते हुए एक फोटो प्रकाशित किया गया है। जिसके वर्णन में लिखा है, ‘कुमाऊं में जौनसारी जाति के लोग हरेला त्योहार पर झुमेला नृत्य करते हुए।’ इस वर्णन को पढ़कर कोई भी पाठक ‘उत्तराखण्ड उदय’ के सम्पादकों के सामान्य ज्ञान पर हंसने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता।

कुमाऊं में जौनसारी जाति (यह जनजाति है) नहीं रहती है। यह गढ़वाल मण्डल के देहरादून जिले में रहती है। दूसरा जौनसारी जनजाति हरेला त्योहार नहीं मानती। यह त्योहार कुमाऊं मण्डल में मनाया जाता है। ऐसे में जौनसारी जनजाति हरेला त्योहार पर कुमाऊं में झुमेलो नृत्य कैसे कर सकती है? इस लेख में भी त्योहारों के बारे में पूरी जानकारी न देकर केवल खानापूर्ति की गई है। ‘पहाड़ी लोकगीत’ वाले लेख में थारु जनजाति की महिलाओं का नृत्य करते हुए फोटो लगाया गया है जो कि अटपटा लगता है। यह लेख भी पेज भरने के लिए किसी स्मारिका से साभार प्रकाशित किया गया है। ‘आश्रम और खास शख्सियतें’ लेख भी कुछ आश्रमों के संचालकों के महिमा मंडन के लिए छापा गया जान पड़ता है।

अमर उजाला के इस विशेष अंक ‘उत्तराखण्ड उदय’ का सम्पादन करने वाले लोगों ने इसके सम्पादन में कोई गम्भीरता और जिम्मेदारी नहीं दिखाई, यह इसे पढ़ने के बाद कहा जा सकता है। ‘अमर उजाला’ जैसे उत्तराखण्ड के एक जिम्मेदार अखबार से तो पाठकों को यह उम्मीद बिल्कुल नहीं रही होगी कि वह ‘उत्तराखण्ड’ के एक दशक के विश्लेषण के नाम पर एक चलताऊ सी जानकारी और वह भी ढेर सारी गलतियों के साथ, एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करेगा। इन ढेर सारी गलतियों से उन युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा, जो इसे पढ़कर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करेंगे। उन्हें तो इस बात का जरा भी आभास नहीं होगा कि एक जिम्मेदार और प्रसिद्ध अखबार के प्रकाशन में इतनी गम्भीर गलतियां भी हो सकती हैं? दैनिक अखबारों में तो आप इस तरह की गलतियों को दूसरे दिन या पत्रिकाओं में अगले अंक में ‘भूल सुधार’ के नाम से ठीक भी कर लें, लेकिन इस तरह की पुस्तकों में जब तक भूल सुधार होगा तब तक तो कई युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हो चुका होगा, क्या ‘अमर उजाला’ प्रकाशन इसकी कोई जिम्मेदारी लेगा?

लेखक जगमोहन रौतेला उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं। अमर उजाला के ‘उत्तराखंड उदय’ की यह समीक्षात्मक रिपोर्ट 'युगवाणी' पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है।


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