मैं तो इसे नए लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल ही कहूंगा

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संजय कुमार सिंह: ''पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की डिग्री जरूरी नहीं'' पर प्रतिक्रिया :  नए लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल है। हिन्दी पत्रकारिता में कैरियर औसतन 45 साल का है - सब एडिटर के बाद सीनियर सब और चीफ सब तक। एक न्यूज एडिटर के तहत 30-40 उपसंपादक, वरिष्ठ उपसंपादक और मुख्य उपसंपादक रह सकते हैं। ऐसे में चीफ सब बनने के बाद प्रमोशन होगा नहीं तो आदमी कुंठित होगा।

तमाम परीक्षाओं-नौकरी आदि की उम्र निकल जाने के बाद किसी लायक नहीं रहेगा। न्यूज एडिटर से ऊपर का पद भी मालिकानों के पंसदीदा लोगों को ही मिलता है। ऐसे में वह भी कुंठित और पीड़ित हो ही जाता है।  पत्रकारिता से मिलता जुलता काम पत्रकारिता पढ़ाना रहता है। अगर आपने बगैर स्नातकोत्तर किए पत्रकारिता शुरू कर दी तो इस क्षेत्र में भी सम्मानजनक काम नहीं मिल पाएगा। जोड़-तोड़ आए तो ठीक है वरना चीफ सबी या ज्यादा से ज्यादा न्यूजएडीटरी करते रहिए। हालांकि इस समय तक स्थिति को करीबी से देख लेने के बाद खुद पत्रकारिता पढ़ाने की इच्छा नहीं होगी और आप खुद अपनी रोटी चलाने के लिए नए लोगों को उसी संकट में धकेलने का महान काम कर पाएंगे इसपर मुझे शक है। पत्रकारिता की डिग्री हुई तो बाद में कहीं कोई संभावना बन भी जाए सिर्फ स्नातक के भविष्य का तो भगवान ही मालिक है। हालांकि, मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उसका जीना मुहाल हो जाएगा। जीएंगे तो अनपढ़ भी। पर वे कैरियर की बात नहीं करेंगे।

दूसरी ओर, चीफ सबी करते हुए अपने संपादक मालिक को आप कब महंगे लगने लगेंगे कोई नहीं जानता। जिस दिन आपको निकालना होगा– आपका संपादक / मालिक आपके एडिशन की गलती पकड़ने के लिए आपसे वरिष्ठ-कनिष्ठ, योग्य-अयोग्य किसी या सभी लोगों को घोषित या अघोषित तौर पर लगा देगा जो पहले आपसे गलती करवाएंगे या आपके एडिशन इंचार्ज रहते हुए करेंगे और फिर पकड़वाएंगे। या सही को गलत घोषित कर देंगे और आप उसे सही साबित करने में अपनी सारी ऊर्जा लगाकर अगले एडिशन में गलती कर ही देंगे। ऐसी स्थिति में आप जितने दिन चल जाएं। खुद इस्तीफा नहीं देंगे तो वीआरएस की पेशकश और जैसे अभी ललचा कर नौकरी दी जा रही है वैसे ही कुछ लाख देकर ले ली जाएगी और फिर आप 40-50 साल में बेरोजगार हो ही जाएंगे।

यह सब मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं, कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने 25 से 40 साल की उम्र तक बहुच अच्छा काम किया है पर अब बेरोजगार हैं या कुछ और धंधा करने लगे हैं। जो पत्रकारिता में हैं वे विकल्प न होने की मजबूरी झेल रहे हैं और संतुष्ट तो कत्तई नहीं हैं। एकाध अपवाद जरूर हैं पर उन्हें यह डर सताता रहता है कि किस दिन उनका संस्थान उन्हें जय राम जी की कह देगा।  कम उम्र में ही पत्रकारिता से बेरोजगार हुए जिन लोगों के ठीक-ठाक खाने कमाने का जुगाड़ है वे नौकरी मांगने नहीं जाते और उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। जिनकी मजबूरी है उन्हे जो मिलती है कर लेते हैं। उसमें कितने पैसे मिलते होंगे इसका अनुमान लगा लीजिए। वरिष्ठ पदों पर जिस तेजी से लोग नौकरी बदलते हैं उससे भी स्थिति स्पष्ट है और जो कुंठित होते हुए भी बदल नहीं पा रहे हैं उससे पता चलता है कि संभावना कितनी है।

यहां मुझे अपने पिछले आलेख पर राजेश आहूजा की प्रतिक्रया का ख्याल आ रहा है। उन्होंने लिखा है, “आपका सन्देश क्या है? लोग प्रापर्टी बनाने के लिए पत्रकारिता का पेशा छोड़ दें और शानदार जीवन शैली के लिए एलजी सैमसंग की बिक्री बढाने वाले विज्ञापनों का अनुवाद करें? हद है यार कैरियरवाद की भी।“  इस पर मेरा मानना है कि हिन्दी पत्रकारिता में कैरियर है ही नहीं। मैंने देश के एक अच्छे अखबार और सम्मानित संस्थान में 15 साल नौकरी की और कुल जमा एक तरक्की पाई।  इसके बावजूद 15 साल उसी अखबार में रहा क्योंकि उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं था। आप कह सकते हैं कि मैं नालायक था और मुझे काम नहीं आता होगा, या करता नहीं होउंगा इसलिए तरक्की नहीं मिली होगी। पर सच यह भी है कि तरक्की पाने वाले गिनती के लोग ही थे। ऐसे में मेरा मानना है कि दो चार साल की मस्ती ज्यादातर लोगों को बहुत महंगी पड़ती है। राजेश आहूजा इसे कैरियरवाद की हद मानें तो मैं क्या, कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता।

पत्रकारिता के कैरियर का अपना ग्लैमर है और शायद इसीलिए बड़ी तादाद में नए लोग पत्रकार बनने के लिए उपलब्ध रहते हैं। इसका नतीजा यह होता है ज्यादातर अनुभवी और पुराने लोगों को सम्मानजनक वेतन मिलने की संभावना नहीं रहती है। हिन्दी पत्रकारिता के ज्यादातर संस्थान उतनी ही तनख्वाह देते हैं जितनी मजबूरी होती है। ऐसे में आपको नौकरी नहीं सेवा करनी हो तो बात अलग है। इस स्थिति के बावजद कोई पत्रकारिता ही करना चाहता है (मैं अग्रेजी और टीवी पत्रकारिता की बात नहीं कर रहा) तो उसे चाहिए कि वह अपने कमाने, परिवार चलाने भर खर्च का बंदोबस्त कर ले उसके बाद कूद जाए मैदान में, जो तनख्वाह मिलेगी वही काफी लगेगी। लेकिन पिता जी का होटल जिन्दगी भर नहीं चलेगा और आपके बच्चे भी चाहेंगे कि उनके पिताजी उनके लिए और अच्छा होटल चलाएं। जहां सब कुछ उन्हें भी उसी तरह मुफ्त मिलता रहे जिसतरह आप अपने पिताजी के होटल में प्राप्त करते रहे हैं।

अच्छा काम कर सकने वाले कई लोगों के उपलब्ध होने के बावजूद दैनिक जागरण और अमर उजाला वाले नए लोगों को पत्रकारिता सीखाने का लालच दे रहे हैं तो इसीलिए कि उन्हें नए लोगों की ही जरूरत है। आपको इस लालच में फंसना है कि नहीं यह आपको तय करना है। मेरे हिसाब से तो यही गनीमत है कि विज्ञापनों में यह नहीं लिखा है कि पत्रकारिता सीखाने के लिए वे कोई पैसा नहीं लेंगे और यह सच भी लिख दिया है कि इस दौरान काम करने के वे कोई पैसे नहीं देंगे। मुझे तो यही काफी लग रहा है और याद दिलाने का मन हो रहा है – शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।

लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता अखबार में कार्यरत रहे हैं. कई वर्षों से आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. पैसे कमाने के लिए अनुवाद की खुद की कंपनी चलाते हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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