ये रवींद्र धारीवाल तो मालिकों का बहुत बड़ा दलाल निकला

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कंपनियां किस तरह अपने यहां काम करने वाले नौकरों की आत्मा-संवेदना को खत्म कर देती हैं और उन्हें रोबोट में तब्दील कर देती हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण देखना हो तो किसी दिन रवींद्र धारीवाल से मिल आइए. यह आदमी बेनट कोलमैन ऐंड कंपनी लिमिटेड में काम करता है. यह वही कंपनी है जो टाइम्स आफ इंडिया और नवभारत टाइम्स जैसे कई अखबार, पोर्टल, टीवी का संचालन करती है. धारीवाल इस कंपनी में सीईओ है.

सिर्फ सीईओ ही होता तो ठीक था. वह इन दिनों लेखक बन गया है. टाइम्स ग्रुप है भइया, जिसे चाहे लेखक बना दे और जिसे चाहे चिरकुट घोषित कर दे. सो, सीईओ की नौकरी बजाते बजाते और मालिकों की मुंहदेखी करते कराते रवींद्र धारीवाल इन दिनों लेखक बन गया है. पर यह लेखक आत्मा के झकझोरने पर नहीं बना है. आत्मा को खत्म करके बना है. एक दिन रवींद्र धारीवाल से इसके मालिकों ने कहा कि तुम एक लेख लिखो जिसमें बताओ की दरअसल जो पत्रकारों व गैर-पत्रकारों के लिए वेतन बोर्ड है, वह मीडिया का मुंह बंद करने के लिए है. और तुम इसके पक्ष में खूब तर्क जुटाओ और लिख पेलो.

धारीवाल ने यही किया. वेज बोर्ड को मीडिया विरोधी घोषित करने के लिए खूब तर्क गिना डाले हैं. इनका लिखा नवभारत टाइम्स के दिल्ली-मुंबई संस्करणों में छपा ही है, संपादकीय पेज पर, संभवतः टीओआई समेत ग्रुप के अन्य अखबारों में भी प्रकाशित हुआ है. धन्य है यह लेखक और धन्य है बेनेट कोलमैन कंपनी. पढ़िए और अनिवार्य रूप से रवींद्र धारीवाल के तर्कों के जवाब नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए दीजिए ताकि इस नकली व दलाल लेखक को पता चल जाए कि लिखना उसका काम नहीं, जो उसका काम है वह वही करे. और, कहां सोए हैं पत्रकार संगठनों के नेता और पदाधिकारी लोग. क्या उनके पास रवींद्र धारीवाल के लिखे का है कोई जवाब?

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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मीडिया का मुंह बंद रखने की कवायद

रवींद्र धारीवाल

प्रेस को नियंत्रित करने के लिए प्रेस कर्मचारियें का वेतन निर्धारित करने से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है? कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ निभीर्क होकर लिख ही कैसे सकता है, जबकि वह जानता हो कि उसका वेतन सरकार ही निर्धारित कर रही है। एक के बाद एक भारतीय सरकारों ने प्रेस को नियंत्रित करने का आसान तरीका यह पा लिया है कि अखबारों के लिए वैधानिक वेज बोर्ड बना दिया जाए, जिसके तहत अयथार्थ रूप से ऊंचे वेतन निर्धारित कर दिए जाएं जिन्हें देना कानून के तहत जरूरी हो। भारतीय समाचार पत्र उद्योग देश का वह एकमात्र उद्योग है, जिसमें वैधानिक रूप से वेज बोर्ड का प्रावधान है। यहां तक कि दूसरे मीडिया सेक्टरों, जैसे टीवी, रेडियो, इंटरनेट आदि में भी यह प्रतिगामी चलन नहीं है।

आजादी पर नकेल

उदारीकरण के इस दौर में, जब हर तरह की आथिर्क प्रक्रिया में लाइसेंस, कोटा, परमिट आदि खत्म किए जा रहे हैं, आखिर सिर्फ समाचार पत्र उद्योग का वेतन ही सरकार निर्धारित क्यों करती है, खासकर तब जबकि ये बाजार की मांग और आपूर्ति पर आधारित नहीं हैं, और इनका आधार किसी किस्म की योग्यता अथवा व्यावसायिक निपुणता नहीं है। समाचार पत्र उद्योग को इस तरह अलग कर देना साफ तौर पर भेदभावपूर्ण है। इसका उद्देश्य संविधान द्वारा मीडिया को दी हुई आजादी पर नकेल डालना है। यही नहीं, यह प्रावधान पूर्व श्रम मंत्री रवींद्र वर्मा की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय श्रम आयोग की उस अनुशंसा का भी उल्लंघन करता है जिसमें सन् 2002 में कहा गया था: किसी भी उद्योग में कर्मचारियों के वेतन निर्धारण के लिए वेज बोर्ड की आवश्यकता नहीं है, न ही वैधानिक और न दूसरे प्रकार के।

अखबार ही क्यों

सच तो यह है कि सन् 1966 के बाद किसी भी अन्य उद्योग के लिए वेज बोर्ड नहीं बनाया गया। (सिवाय चीनी उद्योग के, जहां 26 वर्ष पहले अंतिम वेज बोर्ड का गठन किया गया था और बाद में उसे भी खत्म कर दिया गया।) इस वजह से किसी भी तरह की गड़बड़ नहीं हुई क्योंकि लोग अपने वेतन से संतुष्ट थे। उनकी यूनियनें बाजार में मांग और पूर्ति के अनुरूप सौदेबाजी करने में खासी समर्थ थीं। ऐसे में सिर्फ समाचार पत्र उद्योग के लिए एक के बाद एक वेज बोर्ड लाने और हकीकत का ध्यान रखे बिना उनकी अनुशंसाएं स्वीकार कर लेने का प्राथमिक उद्देश्य प्रेस को सरकार पर निर्भर बनाए रखने और सत्तारूढ़ लोगों द्वारा इसका इस्तेमाल अपने फायदे में किए जाने का ही जान पड़ता है।

वेज बोर्ड गठित करना और उन्हें बगैर पर्याप्त दिशा निदेर्श के अकूत अधिकार देना सिर्फ गैरलोकतांत्रिक ही नहीं, अव्यावहारिक भी है। लेकिन इसके अलावा यह सीधे-सीधे अपना प्रभाव आरोपित करने की कोशिश भी है। यह संविधान में दिए हुए हमारे सबसे बुनियादी अधिकारों के विरुद्ध है। संविधान की धारा 19 -1 ए में जो अभिव्यक्ति की आजादी हमें मौलिक अधिकार के रूप में मिली हुई है, उसमें कोई लेखक जो उचित समझता है, उसे सिर्फ लिखने और प्रकाशित करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है, बल्कि प्रिंट मीडिया का कारोबार चलाने की आजादी भी दी गई है, ताकि सूचनाओं और ज्ञान को प्रसारित किया जा सके। नियम- कानून या हस्तक्षेप के रूप में राज्य सरकार द्वारा इस पर बार-बार नकेल कसने की कोशिश से यथासंभव बचने की कोशिश की जानी चाहिए।

अखबार अपना कारोबार कैसे चला सकते हैं, जब अपने ही कर्मचारियों के वेतन निर्धारण में उनके फैसले का कोई महत्व नहीं होगा। यह तो सीधे-सीधे उनके कारोबार में हस्तक्षेप है। इस रूप में सरकार के पास एक ऐसा हथियार है जो उनके नियमित प्रकाशन और अस्तित्व के लिए ही खतरा बन सकता है। अखबारों का प्रकाशन तर्कसंगत कैसे होगा, जब उनके कर्मचारियों के वेतन असंतुलित ढंग से आकाश छूने लगेंगे। उदाहरण के लिए, जैसी कि हाल में सिफारिश की गई है, उन्हें पियन और ड्राइवर को 45 हजार रुपये प्रति माह तक देना पड़ेगा- यह अपनी जान जोखिम में डाल कर सीमा की हिफाजत करने वाले जवान के वेतन से कई गुना ज्यादा है। जिस तरह के वेतन की सरकार सिफारिश कर रही है, उसे वह खुद अपने ही कर्मचारियों को क्यों नहीं देती?

अजीब बात है कि इस पूरे प्रकरण में जिस वेतन के भुगतान का सरकार इतने जोरदार ढंग से निदेर्श देती है, उसका एक भी पैसा उसे नहीं देना होता, और इस क्रम में बढ़े खर्चों की वजह से कोई अखबार यदि घाटे में जाने लगे तो वह उसे बचाने भी नहीं आती। हेविट द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक वेज बोर्ड की ताजा सिफारिशों के पहले इसके अंतर्गत आने वाले कर्मचारी बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय निगमों में अपने ही समान काम करने वाले कर्मचारियों की तुलना में 26 से 44 प्रतिशत ज्यादा वेतन पा रहे थे।

मजीठिया बोर्ड की सिफारिशें

इसीलिए नवीनतम, न्यायमूर्ति मजीठिया वेज बोर्ड की 80 से 100 प्रतिशत वेतन बढ़ोत्तरी की सिफारिशों के साथ जनवरी सन् 2008 से 30 प्रतिशत अंतरिम राहत की बात ने समाचार पत्र उद्योग में हाहाकार मचा दिया है, क्योंकि कर्मचारी बाजार के लिहाज से पहले ही ऊंचा वेतन पा रहे हैं। इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी ने कहा है कि इन वेतनमानों को लागू करने से अखबार बंद हो जाएंगे, और इनमें सिर्फ छोटे और मध्यम श्रेणी के अखबार ही शामिल नहीं होंगे। एक प्रमुख समाचार पत्र समूह एबीपी प्राइवेट लिमिटेड तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। यह अब सरकार के ही हित में है कि वह प्रेस को उसकी यह मूल स्वतंत्रता दे कि वह अपना कारोबार सरकारी हस्तक्षेप के बगैर चला सके, क्योंकि वेज बोर्ड सरीखे हथियार न सिर्फ प्रेस को गलत तरीके से प्रभावित और नियंत्रित करते हैं, बल्कि प्रेस को अव्यावहारिक बनाकर हमारी मूल स्वतंत्रता का हनन भी करते हैं।

लेखक बेनट कोलमैन ऐंड कंपनी लिमिटेड के सीईओ हैं.


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