रायपुर में अखबार खोलकर पत्रकारों को ठगा जा रहा

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रायपुर में नए खुल रहे अखबारों के हाल बेहाल हैं. कुछ महीने पहले ही सैकड़ों लोगों का पैसा लेकर फरार दैनिक 'नेशनल लुक' के मालिक राजेश शर्मा ने कई पत्रकारों को एक झटके में बेरोजगार कर दिया था. अब पत्रकारों से आठ-दस दिन काम कराकर पैसा न दिए जाने की बात सामने आ रही है. ये हाल है लगभग डेढ महीने पहले शुरू हुए दोपहर के टैबलायड अखबार 'आज की दिनचर्या' का.

अखबार को पूरा रंगीन और सोलह पेज का निकालने की बात कही गई थी. शुरू के 15 दिनों तक यह अखबार सिर्फ आठ पेज का निकाला गया. पहले सभी पन्‍ने रंगीन निकलने के बाद दूसरे दिन से ही अंदर के पन्‍ने सादे कर दिए गए. अखबार के संपादक प्रणय जैन हैं, जो कुछ समय पहले मुंबई में एड एजेंसी चलाते थे. इस दोपहर के अखबार की खासियत यह है कि ज्‍यादातर खबरें दूसरे अखबारों या अन्‍य माध्‍यमों से कट-पेस्‍ट की जाती हैं.

अखबार प्रबंधन जिन पत्रकारों को एप्‍वाइंट करता है, उनसे सात से दस दिन काम लेने के बाद कुछ न कुछ कमियां निकाल कर बाहर कर दिया जाता है. जबकि इस दौरान उनके काम करने के दिन के पैसे नहीं दिए जाते हैं. प्रबंधन इस तरह की कोई शर्त ज्‍वाइनिंग से पहले नहीं रखता है कि आपका टेस्‍ट लिया जा रहा है, या आपका काम ठीक नहीं होगा तो निकाल दिया जाएगा, उसका पैसा नहीं दिया जाएगा. प्रबंधन नए पत्रकारों को सिर्फ बेवकूफ बनाकर अपना काम निकाल रहा है.

पिछले दिनों पुलिस ने एक स्‍कोडा गाड़ी से 65 लाख रुपये की नकदी पकड़ी थी, उससे भी इस समूह का संबंध होने की चर्चा है. संपादक के रवैये से कई पत्रकार और आपरेटर काम छोड़कर चले गए हैं. सवाल अखबार निकालने का नहीं बल्कि उसके लिए अपनाए जा रहे तरीके का है. कुछ दिन काम कराकर पत्रकारों को छला जा रहा है. रायपुर में जैसे अखबार निकालकर दलाली करने का दौर चल पड़ा है. पत्रकारों को शिकार बनाकर संपादक-मालिक अपने काम निकाल रहे हैं.

कुछ समय पूर्व लोगों के अरबों रुपये लेकर फरार हुए 'नेशलन लुक' के मालिक-संपादक राजेश शर्मा अभी भी फरार है, जबकि उसके यहां काम करने वाले दर्जनों पत्रकार बेरोजगार हो चुके हैं. यह शख्‍स भी अखबार का दबाव बनाकर अपने उल्‍टे-सीधे कामों को अंजाम दे रहा था. जिस अमित अग्रवाल के मकान में राजेश शर्मा अपना चैनल चला रहा था, अब उस अमित अग्रवाल ने भी 'ट्रू सोल्‍जर' नाम से एक सांध्‍य दैनिक प्रकाशित करना शुरू कर दिया है. अब यह पत्रकारों का कितना भला करेंगे भगवान जाने.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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