छोटे अखबारों का गला घोंटने वाले मोहंती ने किया 460 करोड़ का घोटाला

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मध्यप्रदेश के छोटे अखबार वाले साल 2000 के वे मनहूस महीने आज तक नहीं भूल सके हैं, जब मध्यप्रदेश सरकार के जनसम्पर्क विभाग की सूची में जुड़े 465 साप्ताहिक अखबार वालों के विज्ञापन यह कहकर बंद कर दिए गए कि सरकार के पास बजट की कमी है। साल भर में महज तीन करोड़ रूपए से भी कम देने वाली सरकार इतनी कंगाल हो गई थी कि उसने छोटे अखबारों का गला घोंट दिया ।

परन्‍तु इसमें असली कहानी कुछ और थी,  जब मध्यप्रदेश के सर्वाधिक बदनाम आईएएस सुधीरंजन मोहंती जनसम्पर्क विभाग के आयुक्त और संचालक बने तो उन्होंने बड़े अखबारों को लाभ पहुंचाने के लिए एक योजना बनाई और इस योजना को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सामने प्रस्तुत कर दिया। मोहंती ने छोटे साप्ताहिक अखबारों के विज्ञापन बंद करने की इस योजना में तर्क यह दिया कि इन अखबारों का कोई पाठक वर्ग नहीं है।

असल में मोहंती के काले कारनामें कई साप्ताहिक अखबारों ने छापे थे इसी से चिढ़कर मोहंती ने बदले की कार्रवाई की और इसमें मोहरा बने चतुर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। उन्होंने मोहंती के इस प्रस्ताव को मानते हुए उस पर हस्ताक्षर कर दिए। इस प्रकार अजु‍र्न सिंह के जमाने से जो अखबार विज्ञापन पा रहे थे,  वे रातों रात सड़क पर आ गए। इनमें कई पुराने पत्रकार थे जो किसी समय बड़े अखबारों में काम करते थे और मालिकों से विवाद के बाद खुद के अखबार निकालने लगे।

अब मोहंती का कारनामा देखिए मात्र तीन करोड़ के लिए छोटे अखबारों का गला घोंटने वाले इस आईएएस ने मध्यप्रदेश औघोगिक विकास निगम के 460 करोड़ से अधिक रुपए ऐसे उघोगपतियों को बांट दिए जिनके उघोग बंद होने की कगार पर थे। इन उघोगपतियों से कोई गारंटी भी नहीं ली गई, नतीजा यह निकला कि सारा पैसा डूब गया।

जब इस मामले की शिकायत हुई तो मोहंती के खिलाफ आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्‍यूरो ने प्रकरण दर्ज किया और अब शिवराज सरकार की पहल पर मामला कोर्ट तक पहुंच गया है, लेकिन मोहंती अभी भी निलंबित नहीं हुए हैं। सवाल इसी बात का है कि छोटे अखबारों के गले घोटकर मोहंती ने राज्य सरकार का 460 करोड़ रूपया डूबा दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने जो पाप अपने माथे लिया उसके लिए अखबार वाले आज भी उन्हें कोसते हैं।

इन्दौर से अजु‍र्न राठौर की रिपोर्ट.


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