यही हाल रहा तो बिहार में पत्रकार और पत्रकारिता पर कोई यकीन नहीं करेगा

E-mail Print PDF

: फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी का अखबारी कवरेज- एक पोस्टमार्टम : एक तरफ बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की तुलना विपक्षी दल आपातकाल के दमन से कर रहे थे, दूसरी ओर बिहार में छपने वाले हिंदी अखबार भी इमरजेंसी के काले दिनों की याद दिला रहे थे. मगर बाबा के बहाने नहीं, फारबिसगंज में पुलिस गोलीबारी की रिपोर्टिंग के आइने में.

सत्तर के दशक में तो इंदिरा सरकार ने अखबारों पर जबरन सेंसरसिप लगाया था. तब बहुतेरे अखबारों ने अपनी सीमा में इसका जबरदस्त प्रतिवाद किया था. मगर नीतीश कुमार के 'सुशासन' में पिछले छह वर्षों से मुख्यधारा की  मीडिया पर जो सेंसरसिप हावी है, यह सेंसरसिप मीडिया संस्थानों ने अपने लिए खुद चुनी है. इस कारण यह ज्यादा खतरनाक है. राज्य के बड़े हिंदी अखबारों से खबरें लगातार कम होती जा रही हैं. इसकी जगह सरकारी बयानों और सूचनाओं ने ले ली है. लेकिन पटना के बड़े हिंदी अखबारों ने फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी कांड, जो कि नंदीग्राम के जैसा मामला था, से संबंधित सूचना या जानकारी देने की भी जरूरत नहीं समझी क्योंकि ये सूचनाएं भी सरकार व प्रशासन को कटघरे में खड़ी करती. इन अखबारों ने घटना के शुरुआती तीन दिनों तक जिन तथ्यों को नहीं छापा और छिपाया, वो हैं :-

  1. गोलीबारी के दूसरे दिन एक टीवी चैनल ने इस घटना से संबंधित एक वीडियो फुटेज जारी किया. फुटेज में एक पुलिस जवान गुस्से में घायल युवक पर कूदता और उसे बेरहमी से रौंदता हुआ दिखाया जा रहा था. वीडियो फुटेज सामने आने के बाद अखबारों की जिम्मेवारी बनती थी कि वो इस फुटेज के सहारे पुलिस-प्रशासन और सरकार को कटघरे में खड़ा करते, गोलीकांड स्थल जाकर पड़ताल करते, सरकार से कुछ तीखे सवाल करते, खबर को क्यों और कैसे के तराजू पर तौलते. लेकिन राष्ट्रीय सहारा को छोड़ रविवार 05 जून को किसी बड़े हिंदी अखबार ने इसके बारे में एक पंक्ति भी लिखना जरूरी नहीं समझा. बाकी तीनों अखबारों हिंदुस्तान, प्रभात खबर और दैनिक जागरण को लगा कि जनता को इस बर्बरता के बारे में बताने से बिहार के मीडिया को नियंत्रित करने वाला मुखयमंत्री सचिवालय नाराज होगा और वहां से बहने वाले विज्ञापनों के सोते सूखने लगेंगे.

  2. इन हिंदी अखबारों से यह तथ्य भी सिरे से गायब रहा कि निर्माणाधीन ग्लूकोज फैक्ट्री में भाजपा के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पुत्र सौरभ अग्रवाल भी साझेदार हैं.

  3. गोलीबारी के दूसरे दिन रविवार 05 जून को दोनों बड़े अखबारों हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के पटना संस्करण के पहले पन्ने पर फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी से संबंधित कोई खबर नहीं थी.

  4. राष्ट्रीय सहारा को छोड़ रविवार 05 जून को बाकी तीनों बड़े अखबारों ने इस पुलिस बर्बरता की विपक्षी दलों द्वारा की गयी भर्त्सना को या तो प्रमुखता से नहीं छापा या अंदर के पन्नों पर धकेल दिया.

  5. शनिवार को उपरोक्त अखबारों में इस गोलीकांड के विरोध में भाकपा (माले) द्वारा निकाले गये प्रतिवाद मार्च की खबर या तो अंदर के पन्नों पर किसी कोने में इस तरह छापी गयी कि मुश्किल से उस पर नजर पड़ती. या फिर इस मार्च को हिंदी अखबारों ने कोई जगह ही नहीं दी. दरअसल बड़े हिंदी अखबारों ने यह दिखाने की पूरी कोशिश की कि इस बर्बर घटना के बावजूद राजधानी पटना में सब शांति-शांति है.

साथ ही यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं है कि गोलीबारी की खबर घटना के अगले दिन 04 जून को इन चार बड़े अखबारों में किस तरह छपी.

  1. दैनिक जागरण ने इसे सिंगल कॉलम की छोटी खबर के रूप में पहले पन्ने पर छापा.

  2. प्रभात खबर ने भी सिंगल कॉलम की ही खबर छापी और खबर का शीर्षक इस चतुराई से लगाया कि पहली नजर में ऐसा न लगे कि बिहार में ऐसा कुछ हुआ भी है. प्रभात खबर ने शीर्षक लगाया 'पुलिस फायरिंग में चार की मौत'.

  3. उक्त चारों अखबारों में से किसी भी अखबार ने इस घटना को पहली खबर नहीं बनाया.

मूल प्रश्न अखबारों की निष्पक्षता, जनपक्षधरता पर लौटें तो यह साफ़ है कि नीतीश सरकार के पिछले लगभग छह सालों के कार्यकाल में हिंदी के बड़े अखबारों के निष्पक्ष नहीं रहने का यह कोई पहला मामला नहीं है और अंतिम तो बिल्कुल नहीं. फारबिसगंज गोलीबारी की घटना का इन अखबारों ने जिस तरह से कवरेज किया वो इसका एक नया उदाहरण मात्र है कि नीतीश सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल के दौरान ये चारों बड़े अखबार पाठकों की नजर में अविश्वसनीय होने का खतरा उठाने की हद तक जाते हुए सच दबाने में, सरकार की चाटुकारिता करने में लगे हैं. इन अखबारों को व्यवसायिक रूप से इस कारण भी कोई परेशानी नहीं हो रही है क्योंकि फिलहाल सभी बड़े हिंदी अखबार नीतीशपक्षी होने के सवाल पर एकमत हैं, एक ही राह के पथिक है या कहें कि एक ही गिरोह के सदस्य हैं.

इन अखबारों को इससे अब बहुत कम सरोकार रह गया है कि इससे पत्रकारिता की साख घटेगी. वास्तव में बिहार में पुलिस अत्याचार, भ्रच्च्टाचार, हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार जैसी घटनाएं तथाकथित 'जंगलराज' की समाप्ति के बाद आज भी बड़े पैमाने पर घट रही हैं. लेकिन मुखयधारा के बड़े हिंदी अखबार इनको प्रमुखता से उजागर करने की जगह इन खबरों को अंदर के पन्नों पर धकेलते हुआ कानून-व्यवस्था में सुधार के सरकारी दावों के सुर में सुर मिलाते रहते हैं. नीतीश सरकार से उपकृत व सम्मोहित बड़े अखबार इन खबरों को कम-से-कम जगह देने में लगे हैं. आज जो खबरें अंदर के पन्नों पर छापकर एक तरह से दबा दी जाती हैं, वो खबरें अगर फिर से पहले पन्ने पर आने लगे तब बिहार की जनता को समक्ष में आयेगा कि कानून-व्यवस्था में सुधार के सुशासनी दावे में कितना दम है.

लेकिन साथ ही फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी के अखबारी कवरेज के आईने में यह समझना भी जरूरी है कि बड़े अखबारों का यह चरित्र क्यों है? ये अखबार बिहार में आज भक्ति मार्ग अपनाते हुए भजन-कीर्तन में क्यों लगे हैं, भक्ति मार्ग से ज्ञान मार्ग की ओर अखबार क्यों नहीं बढ़ रहे हैं? इस सवाल का जबाव तलाशते हुए देश-दुनिया को किस तरह की अर्थव्यवस्था संचालित कर रही है, यह देखना बेहद जरूरी हो जाता है. आज का समय वित्तीय मुद्रा व मुद्रा के वर्चस्व का युग है. राजनीति और मुखयधारा के अखबार दोनों ही विशाल पूंजी से संचालित हो रहे हैं. ऐसे में संसदीय राजनीति पूंजी मुहैया कराने वालों के हित साधने में लगी है और बड़ी पूंजी से संचालित अखबार मात्र मुनाफा कमाने की होड़ में लगे हैं. साथ ही अखबारों के बदलते स्वरूप के लिए अखबार चलाने वालों की मानसिकता में आया बदलाव भी एक मुख्य वजह है. विज्ञापन से तो अखबार पहले भी चलते थे मगर विज्ञापन संपादकीय पर पहले इस कदर हावी नहीं था. आज कोरपोरेट मीडिया के एजेंड़ा और सरकार का एजेंडा एक बिंदु पर जाकर मिल जाते हैं.

दूसरी ओर, आज जब सैकड़ों शोध साबित कर चुके हैं कि मुद्दे मास मीडिया तय करता है, ऐसे में सरकारों द्वारा कन्सेंट मैनुफैक्चर (सहमति निर्माण) के लिए आज बड़े पैमाने पर मुख्यधारा की मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है और मुख्यधारा की मीडिया को चलाने वाले इसी बहाने अपना खजाना भर रहे हैं. मीडिया घरानों ने पत्रकारिता को अपने व्यावसायिक हित पूरे करने का साधन बना लिया है. वर्तमान में इसका सबसे सटीक उदाहरण बिहार में मुख्यधारा के मीडिया और सरकार के बीच के 'नाजायज' संबंधों में देखने को मिलता है. बिहार में पिछले 6 सालों के दौरान कोई नया उद्योग नहीं स्थापित हुआ लेकिन मीडिया प्रचार के बूते सरकार ने विकास के नाम पर जनता का समर्थन बटोर लिया.

बिहार में नीतीश सरकार के लिए ऐसा करना इस कारण भी आसान रहा है क्योंकि राज्य के 89 प्रतिशत अखबार पढ़ने वाले लोग सिर्फ दो अखबार हिंदुस्तान और दैनिक जागरण पढ़ते हैं. ऐसे में सरकार मात्र इन दो अखबार को ही मैनेज कर बिहार में बहुत बड़े स्तर पर पाठकों को प्रभावित कर रही है. बिहार सरकार के लिए एक सुविधाजनक स्थिति यह भी है कि सत्तारूढ़ जनता दल (यू) के एक सांसद एन. के. सिंह एचटी मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी शामिल हैं. इन सब परिस्थितियों के कारण अखबार नीतीश सरकार को खुश करने के लिए ज्यादा ही उद्विग्न रहते हैं.

आज बिहार में बड़े हिंदी अखबार सरकार के जनसंपर्क एजेंसी की भूमिका में है. बिहार सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए जनता का पैसा विज्ञापन के रूप में बड़े अखबारों पर लुटा रही है. सरकार मुखयधारा के मीडिया पर खर्च कर अपनी सत्ता वापसी का रास्ता तैयार करने में लगातार लगी रहती है. ऐसे में आज बिहार के मुखयधारा के अखबार सवाल नहीं उठा रहे हैं. जनपक्षी खबरें सामने नहीं आ रही हैं. पहले जनाधार और कैडर आधारित पार्टियां मुखयधारा के मीडिया को अपने लिहाज से महत्त्वहीन मानती थीं. लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, जनाधार कमजोर हुआ, पार्टियां कैडरविहीनता की स्थिति में आने लगीं, पार्टियां मीडिया के द्वारा छवि निर्माण करने लगीं. राजनीतिक पार्टियां मुख्यधारा के मीडिया का इस्तेमाल कर उन पैसिव वोटरों को प्रभावित करने लगीं जो पाठक-दर्शक भी हैं.

ऐसे में ही पार्टियों और मुख्यधारा के मीडिया का नापाक गठबंधन शुरू हुआ. ऐसे में भविष्य में जो सबसे बड़ा खतरा दिखाई देता है वो यह है कि नीतीश सरकार ने मीडिया को सेंसर कर जनमत को प्रभावित करने का एक आसान रास्ता राजनीतिक दलों को दिखाया है. इसकी पूरी आशंका है कि आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार की जगह कोई दूसरा ही क्यों न बैठे, वह मीडिया का गलत इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने, असफलता छुपाने के लिए जरूर करेगा. साथ ही ऐसा करते हुए वह गुरू नीतीश कुमार को मन-ही-मन बधाई भी जरूर देगा.

ऐसे हालात में आज इन संस्थानों में काम करने वाले पत्रकार ज्यादा दोषी नहीं ठहराये जा सकते हैं क्योंकि चीजें बहुत हद तक मीडिया संस्थानों के प्रबंधन तय कर रहे हैं. किसी भी मीडिया संस्थान के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में पत्रकार नहीं के बराबर हैं. ज्यादातर पत्रकार अपना पत्रकारीय कर्म नहीं भूले हैं मगर अब संपादकों-पत्रकारों के हिसाब से नहीं प्रबंधन के हिसाब से अखबार निकल रहे है. लेकिन अगर बिहार की बात करें तो यहां मामला उतना सपाट नहीं है. यहां के मीडियाकर्मियों का जातीय व वर्गीय चरित्र भी यहां मीडिया के पथभ्रष्ठ होने की एक बड़ी वजह है. मीडिया में जिन जाति और वर्ग के लोगों का वर्चस्व है, वर्तमान सरकार भी मूलतः उसी जाति व वर्ग के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है. कानून-व्यवस्था में सुधार के दावों ने बिहारी मध्य-वर्ग और मीडिया को एक तरह से सम्मोहित कर रखा है. लालू यादव के समय समाज के इस छोटे से मगर बहुत ही मुखर हिस्से में जो एक बहुत गहरा 'असुरक्षा का बोध' पैदा हुआ था, उस असुरक्षा बोध और वर्तमान सरकार के प्रति इस समूह के सम्मोहन को इस संदर्भ से काट कर नहीं देखा-समक्षा जा सकता है.

साथ ही बड़े अखबारों के जरिये सरकार की छवि चमकाने में सत्ता शीर्ष के पांव दबाने वाले वो पत्रकार भी मददगार साबित हो रहे हैं जो लालू के समय भी चाटुकारिता कर रहे थे और आज नीतीश का भी यशोगान कर रहे हैं. ऐसे पत्रकार पत्रकारिता नहीं धंधा करने लगे हैं और साथ ही ये मीडिया की धार भी कुंद कर रहे हैं. आजकल राजधानी पटना के हवाओं में एक नारा काफी तैर रहा है. नारे में नीतीश सरकार के तीन दलालों के नाम आते हैं. जिनमें से दो नाम पत्रकारों के हैं. फारबिसगंज पुलिस गोलीबारी के अखबारी कवरेज के आईने में देखें तो यह नारा काफी सटीक बैठता है.

दुखद स्थिति यह है कि चंद पत्रकारों को छोड़ दें तो, कहीं कोई शर्मिंदगी नहीं है और न ही कोई गलती का एहसास ही है. बिहार जो कभी अपनी दमदार और धारदार राजनीतिक पत्रकारिता के कारण जाना जाता था. वह अपनी चमक लगभग पूरी तरह खो चुका है. तीखे तेवर के लिए जाने वाले बिहार के ज्यादातर पत्रकारों को आज इस बात से बहुत ही कम सरोकार रह गया है कि उनके इस पेशेवर पाप से पत्रकारिता की साख घटेगी. पेड न्यूज और दूसरे मामले के बहाने शुचिता की वकालत करने वाले अखबार भी नीतीशपक्षी होने के लिए सारी पत्रकारीय मर्यादाओं को ताक पर रखने की होड़ में लगे हैं. बाजार के दबाव, कॉरपोरेट पूंजी की ताकत, जातीय व वर्गीय पूर्वाग्रहों और सत्ता प्रतिष्ठानों से हित साधने के लालच ने इन्हें नीतीश सरकार का भोंपू बनाकर छोड़ दिया है. अगर यही हाल रहा तो, वह दिन दूर नहीं, जब बिहार में पत्रकार और पत्रकारिता दोनों पर ही कोई यकीन नहीं करेगा.

दूसरी ओर बिहार के बड़े हिंदी अखबारों के वर्तमान चरित्र को वर्तमान राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीतिक-आर्थिक संदर्भों से काट कर नहीं देख जा सकता है. जिस तरह राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण हुआ है, वैसे ही पत्रकारिता से भी लोकतांत्रिक मूल्य गायब होते जा रहे हैं. सार्वजनिक जीवन की तस्वीर जितनी तेजी से बदली है उसका असर लाजिमी तौर पर मीडिया पर भी पड़ा है. समाज की जो जातीय संरचना है, उसके पीछे सदियों का उत्पीड़न है. निजी संपत्ति बनाने का मोह और आजादी है. इन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों को बदले बगैर, लगाम लगाये बगैर मुखयधारा के मीडिया के चरित्र के जनपक्षीय बन जाने की कामना करना, उसके लिए शोर मचाना बेकार की कसरत ही साबित होगी. इसके लिए एक बड़े, मजबूत, प्रतिबद्ध सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन की जरूरत है. जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मीडिया-मालिक नीतीश और दूसरी सरकारों का दोहन भी करते रहेंगे और अन्ना और रामदेव जैसों को हीरो बनाकर जनपक्षधर होने का नाटक भी करते रहेंगे.

जब तक ऐसे किसी आंदोलन की सूरत नहीं बनती तब तक एक रास्ता यह भी हो सकता है कि जब खबरों को भी सेलेबल प्रोडक्ट के रूप में भी तैयार किया जा चुका है. तब पाठक भी एक सचेत ग्राहक की तरह मीडिया प्रोडक्ट की गुणवत्ता को सवाल बनाकर कंज्यूमर कोर्ट तक पहुंचे. जिस दिन ऐसा हुआ मीडिया-मालिक बगले झांकने लगेंगे. आज सर्वाधिक असरदार पत्रकारिता डिजिटल वर्ल्ड में हो रही है. न्यू मीडिया के रूप में जनपक्षी मीडियाकर्मियों को और नये हथियार तलाशने-तराशने होंगे. नये समानांतर मीडिया से ही भविष्य में उम्मीद की जा सकती है. न्यू मीडिया में जो जनपक्षधर पत्रकारिता हो रही है, इसकी बदौलत ही पत्रकारिता लंबी आयु पायेगी.

यह विश्लेषण बिहार के एक पत्रकार ने भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. लेखक ने नाम न छापने की मजबूरी को बयान किया है, इसलिए बिना उनका नाम दिए इसे यहां प्रकाशित किया गया है. इस विश्लेषण को छापने का मकसद बिहार में फारबिसगंज गोलीकांड और सत्ता व मीडिया के रोल पर बहस की शुरुआत करना है. आप इस विश्लेषण के तथ्य से सहमत-असहमत हो सकते हैं. अपनी बात, राय नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए सब तक पहुंचा सकते हैं.


AddThis