आईएनएस वालों व संदीप गुप्त, कान में तेल आंख में ड्राप डालें फिर इसे पढ़ें

E-mail Print PDF

संजय कुमार सिंह: ताकि ठीक से सुनाई-दिखाई पड़े और ठीक से समझ आए : ((जवाब- पार्ट एक)) : मोतियाबिन्द के लिए यह इलाज ठीक है क्या? : वेज बोर्ड की सिफारिशों से तिलमिलाए अखबार मालिकों ने इसके खिलाफ अभियान छेड़ रखा है और भ्रम फैलाने वाली सूचनाएं प्रकाशित-प्रसारित कर रहे हैं।

अखबार मालिकों की संस्था इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) अखबारों में विज्ञापन छपवा रही है। इस संस्था के सदस्य संदीप गुप्त जैसे लोग उन्हीं बातों को लेख और विशेष संपादकीय की शक्ल में छाप रहे हैं (पढ़ने के लिए क्लिक करें- सूप तो सूप बोले, अब संदीप गुप्त भी बोलें) । पहले विज्ञापन की बात कर लें। आईएनएस का विज्ञापन लाल रंग में छप रहा है। मुझे ध्यान नहीं है कि इन अखबारों में किसी ब्लड बैंक का या रक्त दान करने की अपील भी लाल रंग में छापी हो। पर अपनी बात कहनी है (चाहे वह व्यर्थ ही हो) तो लाल रंग ही मिला! शायद कर्मचारियों का खून आंसू के रूप में निकल रहा है और वह अब भी लाल है।

विज्ञापन में पाठकों से सवाल किया गया है कि अगर किसी चपरासी को 45,000 रुपए प्रति माह और ड्राइवर को 50,000 रुपए प्रति माह देने के लिए मजबूर किया जाए तो क्या आपका अखबार बचा रह सकता है। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा है कि यह उन समाचार पत्र प्रतिष्ठानों के लिए है जिनका वार्षिक कारोबार 1000 करोड़ रुपए है। अब 1000 करोड़ रुपए का वार्षिक कारोबार करने वाले कितने अखबार हैं और उनमें कितने ड्राइवर व चपरासी - यह विज्ञापन में नहीं लिखा है।

बच्चा-बच्चा जानता है कि कंपनियों के लिए अपनी गाड़ी रखना (आधी रात के बाद ड्यूटी खत्म करने वाले गिनती के कर्मचारियों को घर छोड़ने और भिन्न केंद्रों पर अखबार पहुंचाने जैसे साधारण काम के लिए) महंगा पड़ता है और इस काम के लिए किराए की गाड़ियां लगी हुई हैं। आए दिन अखबारों में इसके लिए टेंडर छपता रहता है। यह तनख्वाह ऐसे ड्राइवरों के लिए नहीं है। मालिकों की मर्सिडीज तथा बीएमडब्ल्यू चलाने के लिए अगर इतने पैसे दिए जाते हैं (या देने पड़ते हैं) तो यह न पाठकों पर एहसान है और न कर्मचारियों पर। चपरासी के मामले में भी यही स्थिति है। मोटी तनख्वाह पाने वाले अफसरों को अब चपरासी कहां मिलते हैं (छोटे कर्मचारियों को न पहले मिलते थे और न अब)।

सारी दुनिया जानती है कि मोटी तनख्वाह में ड्राइवर और चपरासी का खर्च शामिल होता है। और ऐसा अखबारों में ही नहीं, पूरे उद्योग जगत में हो रहा है। लालाजी घर के नौकर को कंपनी के चपरासी की तनख्वाह दिलाएं तो ये रोना क्यों? उसपर भी अगर वाकई सरकार तनख्वाह इतना बढ़ा देगी तो आपके पास ये सारी सेवाएं आउटसोर्स करने का विकल्प है ही।

रोना ही था तो अच्छा लगता अखबार मालिक अखबारों के लिए खासतौर से आवश्यक पत्रकारों की तनख्वाह के बारे में बताते और उसका रोना रोते। यह भी कि एक अखबार का एक संस्करण निकालने के लिए कितने पत्रकारों / संपादकों की आवश्यकता होती है। दिहाड़ी मजदूरों से भी कम तनख्वाह पर, वर्षों अस्थायी और तरह-तरह से शोषित पीड़ित पत्रकारों की तनख्वाह की चर्चा न करके कुछेक ड्राइवर और चपरासी को मिल सकने वाले अधिकतम वेतन की चर्चा करके आईएनएस का विज्ञापन यह भी पूछ रहा है कि सरकार अपने कर्मचारियों को इतने पैसे क्यों नहीं देती।

अव्वल तो सरकारी कर्मचारियों से अखबार कर्मचारियों की तुलना ही बेमतलब है और अगर करनी भी है तो इन लालाओं को कौन बताए कि सरकारी कर्मचारी की तनख्वाह आपकी हमारी जेब से ही जाती है और वहां तनख्वाह बढ़ेगी तो टैक्स बढ़ाने पड़ेंगे। जबकि आप तनख्वाह ज्यादा देंगे तो ज्यादा कमाई में से देंगे, कमाने के लिए मजबूर होंगे। अखबार मालिकों के घाटे और कम कमाई की बात का कोई मतलब नहीं है क्योंकि विज्ञापनों से भरे अखबारों को मालिकान तो मुफ्त बांटने के लिए भी तैयार थे। यह अलग बात है कि हॉकरों की मांग पर उनका कमीशन कम नहीं किया गया है और मुफ्त बांटने की कोशिश हॉकरों के विरोध के कारण सफल नहीं हो पाई है - यह सब पुरानी बातें हैं और अलग विषय भी। लेकिन इसका जिक्र यहां जरूरी था।

अब संदीप गुप्त की बातों पर आते हैं। यह हास्यास्पद है कि "सत्ता तंत्र अखबारों की आजादी नहीं पचा पा रहा (है)।" जागरण जैसे अखबार कितने स्वतंत्र हैं और अपनी आजादी का कितना उपयोग दुरुपयोग करते हैं इसकी चर्चा करने की जरूरत मैं नहीं समझता। वेतन आयोग के जरिए सरकार की मंशा अगर अखबारों की गर्दन कसने की है तो अखबारों को मिलने वाली सुविधाओं और फिर अखबारों को प्रोडक्ट बनाने और मेड इन न्यू दिल्ली जैसे दावों के बारे में संदीप जी क्या कहेंगे? संदीप गुप्त का यह कहना ठीक है, "यह नहीं माना जा सकता कि बाजार का सीधा-सा अर्थशास्त्र सत्ता प्रतिष्ठान नहीं समझता।"  समझता है, बखूबी समझता है। तभी तो पिछले वेजबोर्ड को लागू करने वाले समाचार प्रतिष्ठान भी चल रहे हैं और नहीं लागू करने वाले भी बेशर्मी से खून चूसना जारी रखे हुए हैं और अब फिर बंद होने का रोना रो रहे हैं।

संदीप गुप्त जी ने राष्ट्रीय श्रम आयोग के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री रवींद्र वर्मा की 2002 की रिपोर्ट का भी हवाला दिया है। उनके मुताबिक इसमें किसी भी उद्योग में किसी भी प्रकार के वेतन आयोग की जरूरत नहीं मानी गई थी। आगे वही बताते हैं देश में चीनी उद्योग को छोड़ दें तो किसी भी उद्योग में 1966 के बाद वेतन आयोग का गठन ही नहीं हुआ। चीनी उद्योग में क्यों हुआ? ऐसा नहीं है कि संदीप जी नहीं जानते हैं और पाठक नहीं समझते। मैं तो इसका कारण यही समझता हूं कि चीनी उद्योग और उद्योग से अलग है इसीलिए वहां वेतन आयोग बनते रहे हैं। अखबार उद्योग भी क्या आम उद्योग से अलग नहीं है। इसके अलावा, सरकार न्यूनतम मजदूरी तो तय करती ही है। अखबार कर्मचारियों के लिए बनने वाले वेजबोर्ड भी तो उनके लिए न्यूनतम मजदूरी ही तय करते हैं।

नए शुरू हुए कॉल सेंटर को छोड़कर किस उद्योग में आधी रात के बाद भी पालियां समाप्त होती है और कर्मचारियों को बगैर किसी सुविधा के घर जाने के लिए कह दिया जाता है। मजबूरन कर्मचारी ड्यूटी खत्म होने के बाद किसी तरह रात काटते हैं और सार्वजनिक परिवहन शुरू होने के बाद घर रवाना हो पाते हैं। किसी फौजी या किसी महानगरीय मजिस्ट्रेट - जिसका हवाला आईएनएस के विज्ञापन में दिया गया है, को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ता है? नही न? तो फिर अखबारी कर्मचारियों की तनख्वाह अलग क्यों न हो?

संदीप जी ने पूछा है, क्या सरकारी प्राइमरी स्कूलों के शिक्षकों को इतना वेतन मिलता है? उन्होंने सिपाहियों, दरोगाओं और सैनिकों की भी बात की है। पर मैं यहां शिक्षकों की ही बात करूंगा। देश में शिक्षकों को पर्याप्त पैसे नहीं मिलते हैं। यह सत्य है। इसपर भिन्न मंचों पर चिन्ता जताई जाती रही है और इसे ठीक किए जाने की जरूरत है। न कि इसकी आड़ में अखबार कर्मचारियों को भी कम पैसे देना सही हो जाता है। शिक्षकों को पैसे कम मिलते हैं क्योंकि स्कूल उद्योग नहीं हैं। आप कहेंगे हो गए हैं। मैं कहूंगा ऐसे स्कूलों में पैसे ठीक मिलते हैं। वैसे भी, बहुत पुरानी कहावत है और संदीप जी ने सुन ही रखा होगा, एक गलती से दूसरी गलती सही नहीं हो जाती।

संदीप जी आगे लिखते हैं, न्यायमूर्ति मजीठिया की सिफारिशों के खिलाफ समाचार पत्र उद्योग अदालत का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हुआ है। अगर अदालत का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला ही है तो सरकार कहां जबरदस्ती कर रही है। अदालत जाइए। फैसला हो जाएगा। पर जो फैसला होगा उसे मानिएगा न? तब कोई और रोना तो नहीं रोइएगा? संदीप जी ने अपने आलेख के आखिर में सरकारी विज्ञापनों की चर्चा करते हुए कहा है, "… सरकारों ने अपने विज्ञापनों का भी राजनीतिकरण कर दिया है। एक ओर मजीठिया वेज बोर्ड की अनाप-शनाप सिफारिशों के जरिये अखबारों की अर्थव्यवस्था पर चोट की जा रही है और दूसरी ओर डीएवीपी विज्ञापन की दरें इतनी कम रखी गई हैं कि अखबार आर्थिक रूप से कमजोर बने रहें।"

एक तरफ तो आप कह रहे हैं कि डीएवीपी की विज्ञापन दरें कम हैं दूसरी ओर इन्हीं विज्ञापनों के लिए ज्यादातर अखबार लार टपकाते नजर आते हैं। बिहार में नीतिश सरकार के बारे में कहा जाता है कि वह सरकारी विज्ञापनों का दुरुपयोग अखबारों को नियंत्रित करने के लिए कर रही है। पर वहां तो आप लार टपकाते नजर आते हैं और जो कहा जाता है करने के लिए तैयार रहते हैं। इसके बाद भी कहते हैं कि सरकार को अखबारों को कुछ देना नहीं होता है फिर भी वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए दबाव डाल रही है। दोनो बातें तो आप ही कह रहे हैं। अपने फायदे से अलग न देख पाने की आपकी मजबूरी आपके इस बयान से भी दिखती है कि विज्ञापनों की दर बाजार के बराबर क्यों नहीं है और शिक्षकों का वेतन कम है तो अखबार कर्मचारियों का ज्यादा क्यों। सवाल यह भी है कि, स्कूलों को सरकार कहां विज्ञापन देती है?

संदीप गुप्त ने लिखा है, "यह भी किसी से छिपा नहीं (है) कि सत्ता में बैठे लोग किस तरह पाठकों को नजर न आने वाले उन अखबारों को भी अपने यहां से विज्ञापन जारी कराते हैं, जिनकी प्रसार संख्या मात्र उनके कार्यालयों तक ही सीमित रहती है। ऐसे गुमनाम से अखबार निकालने वालों और उन्हें प्रश्रय देने वालों में सबसे आगे ये राजनीतिज्ञ हैं। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सत्ता में बैठे लोग एक ओर प्रेस की आजादी का दम भरते हैं और दूसरी ओर पत्रकारों के जेबी संगठनों को बढ़ावा भी देते हैं। यही नहीं वे ऐसे संगठनों के पत्रकारों को तरह-तरह से उपकृत भी करते हैं ताकि उनके काले कारनामों पर पर्दा पड़ा रहे।

अब तो सत्ता प्रतिष्ठान के स्वार्थ की पूर्ति में सहायक बनने वाले पत्रकारों को सरकारी स्तर पर भी उपकृत करने का सिलसिला चल निकला है। (बहुत पुराने हो गए ये आरोप) खतरनाक यह है कि इस सिलसिले को वैधानिकता भी प्रदान की जा रही है। इस सबको देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय रह ही नहीं जाता कि सरकार वेतन आयोग की मनमानी और अव्यावहारिक सिफारिशों के जरिये चौथे स्तंभ को कमजोर करने का प्रयास कर रही है?" इसके जवाब में यही कहा जा सकता है कि स्वतंत्र प्रेस को इसका खुलासा करने, इसके खिलाफ अभियान चलाने, जनमत बनाने और नेताओं की पोल खोलने से किसने रोका है?

लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता अखबार में कार्यरत रहे हैं. कई वर्षों से आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. पैसे कमाने के लिए अनुवाद की खुद की कंपनी चलाते हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इनके अन्य लिखे बेबाक लेखों-विश्लेषणों को पढ़ने के लिए क्लिक करें-- भड़ास पर संजय कुमार सिंह


AddThis
Comments (6)Add Comment
...
written by K G Matale, Nagpur, July 16, 2013
SANJAY KUMAR SINHAJI NE ASLIYAT SAMNE RAKHI HAI. NEWSPAPER EMPLOYERS GHADIYALI AANSU BAHA RAHE HAI.
13 SALONSE WAGE REVISION NAHI HO RAHA HAI. ADVERTIEMT KI RATE BAHOT BADHI HAI. S C NE JALDI FINAL FAISLA DENA CHAHIYE.
SATYA MEVA JAYATE!
...
written by shiva shanker pandey, July 12, 2011
sandeep jaise beimanon ke khilaf awaz uthana jaroori hai. chup baithna kayarta hogi.
...
written by manish , June 24, 2011
aacha likha,samjhne wala hai
...
written by AKS, June 22, 2011
main bhi ek naami akhbar ke editorial me kaam karta hun. mera basic & DA milakar approx Rs. 9500 hai. Justice Majithia commission ki sifarish ke anusar 80 to 100 percent wage me badhotari hogi. Plz. Jankari denge ki Majithia commission ki sifarish lagoo hone ke baad mera salary un Driver ya chaprasi ke barabar 45,000 ho jayega.
...
written by kapila, June 22, 2011
aadhi-adhoori jankari dekar sandeep sabko bhramit karana chahta hai. isase poocha jana chahiye ki agar akhbar ghate ke sauda hai to yeh ise band kyon nahin kar deta ? apni baat to wah chhap raha hai, karmchariyon ki baat kyon nahin chhapta ? ise yeh bhi batana chahiye ki khud aur uske bhai-bhateje khud kitna vetan lete hain ? bharat ke president ka vetan sava lakh hai, kisi bhi aadmi ka isse jyada vetan nahin milana chahiye . ye log khud 20-25 lakh vetan lete hain.
jagran ek edition se pachas edition kaise ho gaya ? karmcharyon ka khoon peekar. sandeep ke pita bjp ms mp the, chacha so se. har jagau apni goti fit rahe. jagran to vaise bhi kabhi wage-board lagoo nahin karta, fir kyon fadfada raha hai. ye wahi jagran hai jo vinad shukla aur ck tripath jaise ginde aur dalal managero ke dam loota hai aur dosaron ko vaseehat deta hai. kapila, delhi
...
written by aaaa, June 22, 2011
good coment ......

Write comment

busy