मीडिया पर असली हमला तो पत्रकारों का भयंकर आर्थिक शोषण है

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विष्णु राजगढ़िया: ((जवाब- पार्ट दो)) : यकीन मानिये, वेज बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा : सबका दर्द सुनने-सुनाने वाले पत्रकारों के बड़े हिस्से को श्रमजीवी पत्रकारों के वेतनमान पर रिपोर्ट देने वाले जस्टिस मजीठिया आयोग की वेज बोर्ड रिपोर्ट के बारे में कुछ मालूम नहीं होता, इसका लाभ मिलना तो दूर की बात है.

इसके बावजूद अखबार प्रबंधकों ने वेज बोर्ड को मीडिया पर हमला बताकर हल्ला मचाना शुरू कर दिया है. जबकि मीडिया पर असली हमला तो पत्रकारों का भयंकर आर्थिक शोषण है. आखिर इतनी कठिन परिस्थितियों में लगातार काम करके भी एक पत्रकार किसी प्रोफेसर, सीए, इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस या कंप्यूटर इंजीनियर से आधे या चौथाई वेतन पर क्यों काम करे? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए तो यह सवाल हर नागरिक और हर मीडियाकर्मी को पूछना चाहिए. कोयलाकर्मियों और शिक्षक-कर्मचारियों की तरह मीडियाकर्मियों को भी अपने वेज बोर्ड के बारे में जागरूक होना चाहिए. वरना अखबार प्रबंधकों की लॉबी तरह-तरह से टेसुए बहाकर एक बार फिर पत्रकारों को अल्प-वेतनभोगी और बेचारा बनाकर रखने में सफल होगी.

आज जो अखबार प्रबंधक नये वेज बोर्ड पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि उनके प्रोडक्ट यानी अखबार में जो चीज बिकती है- वह समाचार और विचार है. अन्य किस्म के उत्पादों में कई तरह का कच्चा माल लगता है. लेकिन अखबार का असली कच्चा माल यानी समाचार और विचार वस्तुतः संवाददाताओं और संपादनकर्मियों की कड़ी मेहनत, दिमागी कसरत और कौशल से ही आता है. इस रूप में पत्रकार न सिर्फ स्वयं कच्चा माल जुटाते या उपलब्ध कराते हैं, बल्कि उसे तराश कर बेचने योग्य भी बनाते हैं.

इस तरह देखें तो अन्य उद्योगों की अपेक्षा अखबार जगत के कर्मियों का काम ज्यादा जटिल होता है और उनके मानसिक-शारीरिक श्रम से कच्चा माल और उत्पाद तैयार होता है. तब उन्हें दूसरे उद्योगों में काम करने वाले उनके स्तर के लोगों के समान वेतन व अन्य सुविधाएं पाने का पूरा हक है. दुखद है कि मीडियाकर्मियों के बड़े हिस्से में इस विषय पर भयंकर उदासीनता का लाभ उठाकर अखबार प्रबंधकों ने भयंकर आर्थिक शोषण का सिलसिला चला रखा है.

जो अखबार 20 साल से महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे वरीय उपसंपादक को 20-25 हजार से ज्यादा के लायक नहीं समझते, उन्हीं अखबारों में किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट, ब्रांड मैनेजर या विज्ञापन प्रबंधक की शुरूआती सैलरी 50 हजार से भी ज्यादा फिक्स हो जाती है. सर्कुलेशन की अंधी होड़ में एजेंटों, हॉकरों और पाठकों के लिए खुले या गुप्त उपहारों और प्रलोभनों के समय इन अखबार प्रबंधकों को आर्थिक बोझ का भय नहीं सताता. चार रुपये के अखबार की कीमत गिराकर दो रुपये कर देने या महज एक रुपये में किलो भर रद्दी छापने या अंग्रेजी के साथ कूड़े की दर पर हिंदी का अखबार पाठकों के घर पहुंचाने में भी अखबार प्रबंधकों को गर्व का ही अनुभव होता है. लेकिन जब कभी पत्रकारों को वाजिब दाम देने की बात आती है, तब इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर हमले जैसे हास्यास्पद तर्क से दबाने की कोशिश की जाती है.

आज इन मुद्दों पर एक सर्वेक्षण हो तो दिलचस्प आंकड़े सामने आयेंगे-

  • 1. किस-किस मीडिया संस्थान में वर्किंग जर्नलिस्ट वेज बोर्ड लागू है?

  • 2. जहां लागू है, उनमें कितने प्रतिशत मीडियाकर्मियों को वेज बोर्ड का लाभ सचमुच मिल रहा है?

  • 3. मीडिया संस्थानों में प्रबंधन, प्रसार, विज्ञापन जैसे कामों से जुड़े लोगों की तुलना में समाचार या संपादन से जुड़े लोगों के वेतन व काम के घंटों में कितना फर्क है?

  • 4. मजीठिया वेतन आयोग के बारे में कितने मीडियाकर्मी जागरूक हैं और इसे असफल करने की प्रबंधन की कोशिशों का उनके पास क्या जवाब है?

  • 5. जो अखबार मजीठिया वेतन आयोग पर चिल्लपों मचा रहे हैं, वे फालतू की फुटानी में कितना पैसा झोंक देते हैं?

जो लोग यह कह रहे हैं कि पत्रकारों को वाजिब वेतन देने से अखबार बंद हो जायेंगे, वे देश की आखों में धूल झोंककर सस्ती सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. जब कागज-स्याही या पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो अखबार बंद नहीं होते. दाम चार रुपये से घटाकर दो रुपये करने से भी अखबार चलते रहते हैं. हाकरों को टीवी-मोटरसाइकिल बांटने और पाठकों के घरों में मिठाई के डिब्बे, रंग-अबीर-पटाखे पहुंचाने से भी अखबार बंद नहीं होते. प्रतिभा सम्मान कार्यक्रमों और महंगे कलाकारों के रंगारंग नाइट शो से भी कोई अखबार बंद नहीं हुआ. शहर भर में महंगे होर्डिंग लगाने और क्रिकेटरों को खरीदने वाले अखबार भी मजे में चल रहे हैं. तब भला पत्रकारों को वाजिब मजूरी मिलने से अखबार बंद क्यों हों? इससे तो पत्रकारिता के पेशे की चमक बढ़ेगी और अच्छे, प्रतिभावान युवाओं में इसमें आने की ललक बढ़ेगी, जो आ चुके हैं, उन्हें पछताना नहीं होगा. इसलिए यकीन मानिये, मजीठिया वेतन बोर्ड के कारण कोई अखबार बंद नहीं होने जा रहा. वक्त है पत्रकारिता को वाजिब वेतन वाला पेशा बनाने का. सबको वाजिब हक मिलना चाहिए तो मीडियाकर्मियों को क्यों नहीं?

एक बात और. पत्रकारों की इस दुर्दशा के लिए मुख्यतः ऐसे संपादक जिम्मेवार हैं, जो कभी खखसकर अपने प्रबंधन के सामने यह नहीं बोल पाते कि अखबार वस्तुतः समाचार और विचार से ही चलते हैं, अन्य तिकड़मों या फिड़केबाजी से नहीं. प्रबंधन से जुड़े लोग एक बड़ी साजिश के तहत यह माहौल बनाते हैं कि उन्होंने अपने सर्वेक्षणों, उपहारों, मार्केटिंग हथकंडों, ब्रांड कार्यक्रमों वगैरह-वगैरह के जरिये अखबार को बढ़ाया है. संपादक भी बेचारे कृतज्ञ भाव से इस झूठ को स्वीकार करते हुए अपने अधीनस्थों की दुर्दशा पर चुप्पी साध लेते हैं. पत्रकारिता का भला इससे नहीं होने वाला. समय है सच को स्वीकारने और पत्रकारिता को गरिमामय पेशा बनाने का, ताकि इसमें उम्र गुजारने वालों को आखिरकार उस दिन को कोसना न पड़े, जिस दिन उन्होंने इसमें कदम रखा था.

लेखक डा. विष्णु राजगढ़िया पटना और दिल्ली में ''समकालीन जनमत'' मैग्जीन के लिए काम कर चुके हैं. उसके बाद भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में व्याख्याता के बतौर काम किया. फिर प्रभात खबर के धनबाद संस्करण में स्थानीय संपादक और प्रभात खबर इंस्टीट्यूट के निदेशक रहे. नई दुनिया के झारखंड संस्करण के ब्यूरो चीफ के रूप में रांची में कार्यरत.


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Comments (12)Add Comment
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written by mini sharma, June 25, 2011
Bade dukh kee baat hai ke Saree duniya ko hilane wale reportero kee koe union nahee hai....Aaj chahe woo dinik majdoor ho yaa ghar per kam karne walee bai ho sab kee apne apne union hain. per itne bade media mai koe bhee union nahee hai jo kee sabke haq ke liye lad sake.
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written by Sanjeev Kumar, June 24, 2011
@PARITOSH - Dear brother, I do not have idea how much you know about the progressive thinker like Harivanshji. He has such image in Delhi and even in a large section of society in Bihar and Jharkhand. But if you come to Patna and ask to any journalist worked in Prabhat Khabar, you will be surprised to know that a lot of journalists are still working in a salary lower then the NREGA labors. Sub-editors and reporters working for a long for this news paper are not getting even the minimum wages. Nobody in PRABHAT KHABAR is getting any kind of Wage Board scale, most of them are working as daily wage labors and they may kicked out any moment. Harivansh ji will be remembered for the leader of exploitation of his sub-ordinates.
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written by arun kumar mahasachiv bihar shramjivi patrakar union, June 24, 2011
hats off to vishnu rajgarhiya for this free and frank talk.
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written by JAY, June 23, 2011
SAHI HAI BHAI AUR STRINGARO KE BARE ME KYA KAHENGE....KAM LETE HAI 10,12 GANTE SE JYADA AUR SALORY DETE HAI......KUCH NAHI ......JAB SALARY BADANE KE BARE ME PUNCHNE JAO TO OFFICE SE NIKAL DENE KI DHAMKI DETE HAI...AUR AGAR BHUL SE CHUTTI KE BARE ME PUCH DO TO AESA LAGTA HAI KI CHUTTI NAHI KIDNEY MANG DI HO....AKHIR KAM KARNE KA KOI NIYAM, KAYDA KANOON HONA CHAHIYE KI NAHI.......
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written by paritosh, June 23, 2011
Rajgadiaji, half of what you have written is correct but it is surprising that your thoughts have not been affected even by working with a progressive thinker like Harivanshji.
You are correct in stating that the raw material in a news paper is "news" but what you have conveniently forgotton is that the circulation dept is the corner stone in making what you write COUNT.
It is the circulation dept which deals with those hawkers with whom you cannot stand to share common stand for even a minute while the advertisement dept is the one which makes your salary POSSIBLE.
Journalists benefit from largesse provided by the Govts (House / medical . travel / phone and in terms of financial crisis even funds the journalists - you do not ene mention these benefits.
While those working in the circulation and advertisement dept solely depend on the salaries given by the management.
If you are a thinker then please take a broad based view of the enitre dept's and not be biased.
I am not against journos getting better and better salaries - I am against malafied thought processes which try ang negate the contribution of other departmenst in the making of a news paper.
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written by ved kumar maurya, June 22, 2011
aaj patrakarita ke maayne badal gaye hai saahab...jo unchi post par hai unse mil kar baat karo to aandhi aa jati hai....lekin kaam maagne jaao to khoon choose lete hai.......kya bolu in samaaj ke pahredaaro ko.....
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written by vijay singh, June 22, 2011
महवपूर्ण बात तो यह है की अब अखबारों में बेज बोर्ड वाल़े कितने पत्रकार बचे ही है. मुश्किल से २५ से ३० प्रतिशत, बाकि सब ठेका मजदुर.

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written by ganesh rawat1, June 22, 2011
सचमुच सही लिखा है---- वेज बोर्ड लागु होना बहुत जरुरी है .. पत्रकारों को भी सम्मानजनक सेलरी मिलनी चाहिए .. आखिर एक अखबार को लोग ख़बरों और विचार के लिए ही खरीदते और पढ़ते हैं , जो विशुद्ध रूप से उसमे काम करने वाले पत्रकारों की देन होता है. समझ नहीं आता कि नए वेज बोर्ड को लागू करने में क्या हर्ज़ है ...
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written by kumar kalpit, June 22, 2011
vishnoo jii apne halat ke liye patrakar kafee had tak khud jimmedar hai. patrkar ne apnee behtree ke liye kabhi aawaj uthaee! sarkar se bhikh magne ke alawa malk ke khilaf kabhi koee aandolan kiya! shavida karmcharee bhi apne hak ke liye aawaj uthate hai lekin patrakar hamesha malik ke aage dum hii hiilata hai
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written by pramod kumar.muz.bihar, June 22, 2011
patrakaron ke sosan par aapaki chinta vajib hai.ek lambe arse ke bad aisa lekha pdhane ko mila bhala ho bhadas4 media.com ka.kash yah bat print media me bhi chpati.chaliye bat nikali hai to door talak jayegi.
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written by amitvirat, June 22, 2011
sach likha aapne agar yahi halaat rahe to alhbar khud band honge kyonki aajkal ek chaprasi bhi 10 se 15 hazar rupye paata hai. din raat reporter ka khoon choosne wale akhbaar malik market assistent ko to 15 se 20 hazar dete hain aur mansik aur sharirik parishram karke akhbar ki pehchan aur saakh banaane wale editorial vibhag ke karmchariyon ko ek dainik vetanbhogi se bhi kam ki saleru dete hai. aise mein aane wale samay achhe reporte subeditors ki kami hogi aur ye khud apni karni par royeinge. aaj ke samay mein hi achchhe person ka abhav ho gaya hai aane waale samay ka bhagwan hi malik hai.
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written by Sadashiv Tripathi, June 22, 2011
राजगढिया जी,

आप ने तो सचमुच कमाल कर दिया
धमाकेदार जवाब के लिए

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