अखबारों की आजादी पर आघात या लूटने की आजादी पर आघात

E-mail Print PDF

: ये झुट्ठे सरकार को नहीं, अपने पत्रकारों को डराना चाहते हैं : कुतर्कों के महान राजा और दैनिक जागरण के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप की भाषा किसी पत्रकार की खून चूसने वाले उद्योगपति की ही है। वह आंगन की मुर्गी हैं, कलेजा चूजे का है, उड़ना बाज की तरह चाहते हैं..... सो, दौड़-दौड़ कर आंगम में ही धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। संदीप भी जानते हैं कि लोकमान्य तिलक व गांधी जी धन्ना सेठ नहीं थे।

वह अपने कर्मचारियों के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे, उन्होंने अपने कर्मचारियों का खून चूस कर रूपये नहीं बटोरे। उनके अखबार निकालने का मिशन व ल़क्ष्य साफ सुथरा था। वह बता सकते है कि आज के समय में कितने अखबार मिशन पर चल रहे हैं। समाचार पत्र को उद्योग का दर्जा देने वाले मालिक पत्रकारों को दिहाड़ी मजदूर समझेंगे है। यह देखिए, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार और पार्टियों का तलुए चाटने वाले कुत्ते अब सरकार को ही भौंकने लगे हैं। ये झुट्ठे सरकार को नहीं, अपने पत्रकारों को डराना चाहते हैं। असलियत तो यह भी जानते हैं, जब सरकार चाहेगी तो उनके मुंह से निवाला छीन लेगी। बाबा रामदेव न बनें,  नहीं तो लात खाएंगे। विज्ञापनों से खबर तय करने वाले प्रेस तो पहले ही नियंत्रित है। मैं संदीप से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूं....

-वेतन बढाने के बाद कौन सा उद्योग नष्ट हुआ, लगे हाथ यह भी बता देते तो अच्छा होगा। सरकार तो समय - समय पर वेतन आयोग के माध्यम से अपने कर्मचारियों के वेतन में कई - कई गुना वृद्धि करती है, तो मात्र अस्सी प्रतिशत वेतन बढाने से इतना डर क्यों।

-तुम्हें क्षे़त्रीय अखबारों की क्या फ्रिक है, तुम तो पहले ही गलाकाट प्रतियोगिता को अपना कर उन्हें बाहर कर चुके हो।

-वेतन बढ़ाने से सरकार का प्रेस पर किस प्रकार नियंत्रण होगा, लगे हाथ यह भी समझा दें।

-तुम तो खून चूसने वाले हो, अपने गिरेबान में झांकना कब शुरू करोगे, क्या पत्रकार का ओहदा शिक्षक, सिपाही, दरोगा से कम है। जेडे तुम्हारा ही आदमी था, तो उसे तुम क्या मानते हो, भाड़े का मजदूर या इंसाफ का सिपाही।

-तुम्हे दिक्कत सिर्फ अपनी अंटी ढीली करने में है। आर्थिक मंदी में राहत पैकेज तुम्हारा बाप ले गया। कागज का कोटा और सरकारी विज्ञापनों के लिए कौन मरता है। और आर्थिक मंदी के समय छीनी हुई सुविधाओं के लिए आज तक पत्रकार तरस रहे हैं।

-क्षे़त्रीय अखबारों की फिक्र है आपको। कुछ देर पहले गाली दे रहे थे। हमारा संगठन जेबी, तुम्हारा संगठन महान।

-चलते चलते यह कि अगर तुम्हारा वेतन पांच सौ रुपये महीने कर दिया जाए तो बाप बाप चिल्लाओगे या नहीं, बताओ...।

उम्मीद है दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर तुम जरूर इन सवालों के जवाब बिंदुवार लिखोगे..

इस पोस्ट के लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने अपना नाम और पहचान उजागर न करने का अनुरोध किया है.


AddThis