जनसंदेश टाइम्स अब सुल्तानपुर में भी

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: पत्रकार वर्तमान में रहना सीखें -सुभाष राय : महाकवि त्रिलोचन, अजमल सुलतानपुरी, अखिलेश, शिवमूर्ति, संजीव और इस तरह के अनेक मेधावी और दृष्टिसंपन्न  रचनाकारों की जमीन से अब जनसंदेश टाइम्स भी जुड़ गया। अपने समय में बिल्कुल अलग इस अखबार ने विचार, संस्कार, साहित्य और जनपक्षधरता को अपना अस्त्र बनाया है। पाठकों की, जनता की समस्या तो सर्वोपरि है ही, उसके लिए तो संघर्ष पहली वरीयता पर होना ही चाहिए।

लेकिन समाचारपत्र की जिम्मेदारी समाज को संस्कारित करने, उसे विचारसंपन्न करने और जीवन में घटने वाली सकातात्मक घटनाओं को उभार कर प्रस्तुत करना भी है। यद्यपि ज्यादातर समाचारपत्र इस धारा को छोड़कर अपनी व्यावसायिक जमीन को ही उर्वर करने में लगे हुए हैं और इस तरह वे भारतीय जीवन की मौलिकताओं और रचना की संभावनाओं की न केवल उपेक्षा कर रहे हैं बल्कि देश की साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति आम भारतीयों के लगाव को भी खत्म कर रहे हैं। जनसंदेश टाइम्स ने इस धारा को पलटने की कोशिश की है। उसका व्यापक स्वागत भी हो रहा है। 25 जून को इस समाचारपत्र के रायबरेली संस्करण में सुलतानपुर भी जुड़ गया। बहुत कम समय में जनसंदेश टाइम्स लखनऊ से चलकर सीतापुर, लखीमपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, सीएसएम नगर, कानपुर, फतेहपुर, महोबा, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा और सुलतानपुर तक पहुंच गया है। आगे इसके फैजाबाद और गोंडा संस्करण भी जल्द ही सामने आ जायेंगे।

सुलतानपुर में जनसंदेश टाइम्स के लोकार्पण के अवसर पर वहां के साहित्यकार, पत्रकार और चिंतक बड़ी संख्या में जुटे थे। इस मौके पर विद्वान वक्ताओं ने पत्रकारिता के  दायित्व, उसकी चुनौतियों और उसके विचलन पर गंभीर चर्चा की। जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय ने पत्रकारिता की दृष्टि और शब्दों के चरित्र पर बात की। पत्रकारों की महत्वाकांक्षाओं और व्यावसायिकता के दबाव ने इसके समक्ष विश्वसनीयता का संकट खड़ा किया है। आजादी के पहले जो स्वतंत्रता थी वह आज नहीं है। कुछ तो पत्रकारों ने ही अपनी स्वतंत्रता खो दी है। सकारात्मक गतिविधियों और जीवन को संस्कारित करने में जुटे लोगों की निरन्तर उपेक्षा हो रही है। अंग्रेजी हमारी संस्कृति एवं सभ्यता को लीलती जा रही है। आज जरूरत उन चीजों की है जो बिकती नहीं क्योंकि जो बिकती नहीं, वही समाज बनाती हैं। पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए श्री राय ने कहा कि जो लोग केवल भविष्य के बारे में सोचते हैं उनका वर्तमान उनके हाथ से छूट जाता है।

लोग गैरजरूरी महत्वाकांक्षाओं के सहारे ऊंचाई पर पहुंचना चाह रहे हैं। यही सारे संघर्ष का कारण है। इसी कारण पत्रकार भी अपने दायित्व निर्वहन से च्युत हो रहे हैं। कला और संस्कृति समाचार पत्रों से विलुप्त होती जा रही है। समाचार बेचने का सिलसिला तेजी से चल पड़ा है। उन्होंने कहा, यह संक्रमण का समय है और जब संक्रमण का समय होता है तभी प्रतिभाएं जन्म लेती हैं। जो लोग मिशन का दिया लेकर पत्रकारिता में आये हैं उनके सामने संकट है कि वह अपना दीप जलायें कैसे रखें। संकट यही है कि ऐसे लोगों की तादात काफी बढ़ गयी है, जिनको रोशनी पसंद नहीं है, वे नहीं चाहते कि कोई दीप जले। ऐसे में उन लोगों का संकट और बड़ जाता है, जो कुछ नया करना चाहता है। कुरुक्षेत्र में अपने सगे-सम्बन्धियों को देख अर्जुन ने युद्ध से इनकार कर दिया था लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया और कहा कि जो भविष्य के बारे में सोचते हैं उनका वर्तमान हाथ से निकल जाता है। वर्तमान अतीत का संश्लेष होता है और वर्तमान में ही भविष्य के सपने समाहित होते हैं। जब हम भविष्य के बारे में सोचने लगते हैं, वर्तमान की चुनौतियों से छूट जाते हैं।

उन्होंने कहा, जनसंदेश टाइम्स समाज के ऐसे लोगों पर पूरी नजर रखेगा जो किसी कोने में बैठकर अच्छा काम कर रहे हैं। श्री राय ने लोगों को विश्वास दिलाते हुए कहा कि जनसंदेश टाइम्स समाज के दबे, कुचले वर्गों की आवाज तो बनेगा ही, साथ ही यहां के लोगों के साथ खड़े होकर यहां की मिट्टी की महक वापस लाएगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मशहूर शायर अजमल सुलतानपुरी ने कहा कि पत्रकार का दायित्व है कि वह जो खबरें प्रकाशित करें वह सच्ची होने के साथ-साथ विश्वसनीयता से पूर्ण भी होनी चाहिए। उन्होंने गजल के कुछ शेरों के माध्यम से अपना संदेश दिया।

अपने सम्बोधन में सांसद डा. संजय सिंह ने कहा कि जैसा समाज होता है वैसा नेता होता है और वैसी जनता होती है। जैसी जनता होती है वैसी पत्रकारिता होती है। पत्रकारिता में जिन चीजों को प्रकाशित करना चाहिए, वह नहीं हो रही है। पत्रकारिता के माध्यम से जो संदेश जनता तक जाना चाहिए वह नहीं जा पा रहा है। विश्वसनीयता पत्रकारिता का सबसे बड़ा अस्त्र है। जनपद के वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के प्रतिनिधि राज खन्ना, प्रसिद्ध साहित्यकार कमल नयन, जिला पंचायत अध्यक्ष सीताराम वर्मा और विधान परिषद सदस्य ओपी त्रिपाठी ने भी जनसंदेश टाइम्स से अपनी उम्मीदें जाहिर कीं। इस मौके पर आठवें दशक में चल रहे अजमल सुलतानपुरी ने एक नजम सुनायी.....

ये मेरा वतन है ये मेरा वतन है,
मैं बुलबुल हूं इसका ये मेरा चमन है।
वतन मेरी इज्जत वतन मेरी अजमत,
वतन मेरा तन मेरा मन मेरा धन है।।
वतन को बदलता हुआ कैसे देखूं,
चमन को मैं जलता हुआ कैसे देखूं।
है सुलतानपुर है कुशभवनपुर जैसा,
इसे गम में ढलता हुआ कैसे देखूं।।
ये मेरा वतन है ये मेरा वतन है,
करैं रात दिन रहमतै इसपे साये,
नजर बद से अल्लाह इसको बचायें।
न देखो इसे घूरकर चांद तारो,
वतन को तुम्हारी नजर न लग जाये।।
ये मेरा वतन है ये मेरा वतन है,
अदीबो कलमकारों शोरा का दर्पण,
कमल नयनों मजरूह अजमल का मसकन,
ये हिजरी हबीब और जाहिल की नगरी
ये अंग्रेजी हिन्दी व उर्दू का मधुबन
ये मेरा वतन है ये मेरा वतन है...


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