भास्‍कर का यह संपादक चाटुकारों और चापलूसों का पोषक है

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सुधीर अग्रवाल के बारे में एक बात विख्यात है और वह यह कि वे कोई भी निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेते है लेकिन अवनीश जैन के मामले में उन्होंने बहुत देर कर दी और इसका खामियाजा अखबार को इंदौर में अपनी प्रतिष्ठा खोने के साथ ही एक अच्छी टीम से वंचित होने के रूप में भी चुकाना पड़ा। इसके पीछे कई कारण है पर सुधीरजी के प्रति आज भी वैसा ही सम्मान होने के कारण मैं उन तक नहीं जाना चाहूंगा।

साल भर पहले जब मैंने भास्‍कर छोड़ने का फैसला लिया था तब सुधीरजी के साथ ही भास्‍कर ग्रुप एडीटर, नेशनल एडीटर, स्टेट हेड तथा सभी संपादकों को एक पत्र लिखकर यह खुलासा किया था कि मैं आखिर क्यों भास्‍कर छोड़ रहा हूं। मेरा यह पत्र ताबूत में पहली कील ठोंकने जैसा था। जो बातें मैंने इस पत्र में उल्लेखित की थी वे एक एक करके सही साबित हो रही है और अब प्रबंधन ने भले ही देर से सही पर अवनीश को इंदौर से रूखसत करने का निर्णय तो ले ही लिया। यहां रहते हुए इस आदमी ने अखबार का भट्टा बैठाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।

12 साल भास्‍कर में सेवाएं देने के बाद आज भी मेरा खुला आरोप है कि यह शख्स संपादक नहीं चापलूसों व चाटुकारों का पोषक है। इसकी रूचि अखबार में कम इससे इतर कामों में ज्यादा रहती है। यह अपने आसपास हमेशा कमजोर लोगों की टीम रखना चाहता है ताकि वे इसकी हां में हां मिलाते रहे, फटकार सुनते रहे, इसे महान बताते रहे और ये अपना उल्लू सीधा करता रहे। इंदौर भास्‍कर में इसने सबसे पहले उन लोगों को कमजोर करना शुरू किया जो कलम से मजबूत थे, जिनका मजबूत नेटवर्क था, जो इससे सामने तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का माद्दा रखते थे। इसके बाद इसने चापलूसों व धंधेबाजों का एक नेटवर्क तैयार किया और चंद ही दिनों में इन लोगों की भास्‍कर इंदौर में तूती बोलने लगी। इनमें से कई ऐसे है जो एक पैरा की खबर भी ठीक से नहीं लिख सकते, किसी खबर की सही हेडिंग नहीं दे सकते, किसी कार्यक्रम को कवर करने भेजो तो कॉपी डेडलाईन समाप्त होते होते ही लिख पाते, सुबह की मीटिंग से रात को घर रवाना होने तक रिपोर्टर को हरास ही करते रहते और ऐसे ऐसे आइडिया बताते ही खबर कभी तैयार ही न हो पाए।

इसके दो साल के कार्यकाल में भास्‍कर छोडऩे वाले करीब 25 लोगों की फेहरिश्त पर यदि आप गौर करें उन साथियों से इसका कारण पूछे तो 90 प्रतिशत लोग इसका कारण सिर्फ और सिर्फ अवनीश जैन को ही बतायेंगे। क्यों विनोद पुरोहित ने पहले जयपुर तबादला लिया और फिर भास्‍कर छोड़ा? क्यों विनोद शर्मा, शैलेश दीक्षित,  के.पी.सिंह, सूचेंद्र मिश्रा, शैलेंद्र जोशी और कपिल भटनागर ने पत्रिका ज्वाईन किया? क्यों विजय पाठक व मनसुख परमार ने भास्‍कर के बजाय दबंग दुनिया जैसा नये अखबार में काम करना पसंद किया? क्यों सुधीर चीखलीकर दो महीने में ही भास्‍कर छोड़ गए? ये तमाम ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर प्रबंधन को जरूर खोजना चाहिए। अनेक दिग्गजों के अखबार छोडऩे के बाद भी भास्‍कर की जिस टीम ने जागरण तथा राज एक्सप्रेस की लांचिग के दौर में अखबार को मजबूत बनाये रखा उसे इस शख्स ने तार तार कर दिया।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा करीब दो साल स्थानीय संपादक रहते हुए इसने तीन या चार मौकों पर अपनी कलम चलायी। इसकी रूचि अखबार में रात नौ बजे के बाद जाग्रत होती है। खबरों की इसके पास कोई प्लानिंग नहीं। इसका वैल्यू एडीशन खबर की हत्या जैसा होता है और जिस खबर की यह एडिटिंग कर दे उसका सत्यानाश होना तय है। ये जिस खबर में रिपोर्टर को बदलाव बताये उस में आप दो चार शब्द आगे पीछे कर वापस इसे दिखायें तो खबर हाथों हाथ अनुमोदित हो जाती है?

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस शख्स ने इंदौर भास्‍कर में यतींद्र भटनागर, श्रवण गर्ग और कल्पेश याज्ञनिक जैसे धुरंधर संपादकों की परंपरा को कलंकित किया है। इसके रहते संपादक कक्ष षडयंत्रों का अड्डा बन गया। रोज संपादक को चार-पांच घंटे यह जानने में बीतने लगे की कौन किससे मिल रहा, किसने किससे बात की,  फलां लड़की फलां रिपोर्टर से क्यों बात करती है, फलां का फलां से क्या चक्कर है? फंला के खिलाफ कोई मुद्दा तो ढूंढो? फंला को कैसे निपटाया जाए। इसे उम्दा किस्म का अखबार निकालने से ज्यादा आनंद चैयरमेन की कार का दरवाजा खोलने, उन्हें कार्यक्रमों में अतिथि बनवाने तथा उनके चहेते लोगों को उपकृत करने में आता है। अवनीश जा रहे है पर अपने पीछे धंधेबाज विज्ञप्तिबाजों की एक लंबी फौज भास्‍कर को देकर। इसकी पुष्टि विजय पाठक से की जा सकती है।

इस सबसे आगे इस शख्स का जो सबसे खराब पहलू है वह यह कि यह किसी रिपोर्टर से मतभिन्नता होने पर उसका कैरियर चौपट करने में जुट जाता है। यह खबरों के साथ खिलवाड़ करने लगता है और इस हद तक जाता है कि वह व्यक्ति भास्‍कर छोडऩे के बारे में सोचने को मजबूर हो जाए। यह स्टेट हेड से सांठगांठ कर अखबार से जुड़ी बातें सुधीरजी, श्रवणजी तथा कल्पेशजी तक पहुंचने ही नहीं देता है। इंदौर में जब अखबारों में भूमाफिया के खिलाफ अभियान चल रहा था तब इसने क्या क्या गुल नहीं खिलाये? एक बड़े भूमाफिया को इसने पहले उपकृत कर बाद में क्यों निपटाया? एबी रोड़ स्थित एक बड़ी टाउनशिप के घपले की खबर सारे सबूत होने के बाद इसने क्यों रोकी?

कहने को बहुत कुछ है.. पर अभी इतना ही। बधाई भास्‍कर इंदौर के साथियों को एक काले अध्याय की समाप्ति के लिए। अब वे अखबार के दफ्तर में खुली हवा में सांस ले सकेंगे.. उम्मीद है की रघुरमनजी के नेतृत्व में उन्हें एक साफ सुथरे वातावरण में काम करने का मौका मिलेगा। जो काबिल है उसकी योग्यता की क्रद होगी और जो कमजोर होते हुए भी पनपा दिये गए उनकी तूती अब नहीं बोल पाएगी।

अरविंद तिवारी

पूर्व रिपोर्टर

दैनिक भास्‍कर, इंदौर


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