नवभारत टाइम्‍स की चालाकी

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डा. महरअखबारी संस्थान पाठकों को कोई रियायत, उपहार या अन्य कोई सुविधा देता है तो उस की घोषणा अखबार के माध्यम से करता है,  मगर नवभारत टाइम्स ने पाठकों के लिए लगभग मुफ्त अखबार देने की योजना पिछले कई मास से लागू कर रखी है, मगर किसी अन्य अखबार को इसकी कानों कान खबर तक नही है। यही नहीं नवभारत टाइम्स में काम कर रहे अधिकांश लोगों को भी इस योजना का पता नहीं है।

इस योजना के चलते नभाटा अपने को एनसीआर का शेर बता कर इस क्षेत्र में अपनी सब से अधिक सर्कुलेशन होने का दावा भी कर रहा है। नभाटा का यह दावा खोखला भी नहीं है बल्कि इस दावे में दम भी है क्योंकि नभाटा की योजना ही लाजवाब है। अपनी इस योजना के अनुसार संस्थान पाठक को लगभग मुफ्त अखबार दे रहा है। योजना के अनुसार हॉ्कर पाठक को बताता है कि तीन सौ रूपए एक मुश्‍त जमा करने पर एक साल तक अखबार मिलेगा। अब पाठक के लिए इस से सस्ता सौदा और क्या हो सकता है क्योंकि अखबार का घोषित मूल्य ढाई रुपए है। जिस के हिसाब से एक साल के नौ सौ रुपए होते हैं।

पाठक तीन सौ रुपए देकर साल भर के लिए बेफिक्र हो जाता है। तीन सौ रुपए साल का मतलब 25 रुपए महीना हो गया। अब अगर 75 रुपए महीने का अखबार 25  रुपए में मिले तो कौन नहीं लेना चाहेगा। इस प्रकार पुराने पाठकों के अलावा नए पाठक भी नभाटा लेने लगे हैं। कई पाठक एक अतिरिक्त अखबार के रूप में भी नभाटा के लिए तीन सौ जमा कर अखबार लेने लगे हैं। क्योंकि उन्हें तो अखबार मुफ्त में ही मिल रहा है। 16 पेज का अखबार और आठ पेज का पुल आउट मिला कर 25 रुपए की रद्दी एक महीने में हो ही जाती हैं।

चाय की दुकान, ढाबा या कटिंग सैलून वाले अपने लिए अखबार न ले कर अपने ग्राहकों के लिए लेते हैं। अब ये लोग भी तीन सौ जमा कर साल भर के लिए निश्चिंत हो गए हैं। दुकानदारों और मिस्त्री लोगों को भी हॉकर्स ने पटा लिया है अब ये लोग भी नभाटा लेने लगे हैं। इस प्रकार नभाटा के पाठकों की संख्या में रोज इजाफा हो रहा है,  जिसे संस्थान यह कह कर प्रचारित कर रहा है कि नभाटा यंग लोगों की पहली पसंद बन रहा हैं,  जबकि असलियत कुछ और ही बयान कर रही है।

एक हॉकर से जब इस बारे में पूछा तो उस का कहना था कि उसे एक अखबार पर एजेंट पचास पैसे देता है जितने अधिक अखबार होंगे उस की आमदनी उतनी ही अधिक होगी। अब दूसरे अखबारों के पाठक तो बढ़ नही रहे। तीन सौ रुपए में एक साल तक अखबार मिलेगा, इस प्रलोभन के चलते पाठक खूब बढ़ रहे हैं। तीन सौ रुपए वह अखबार के लिए देते हैं बदले में उन्हें इतने की रद्दी मिल जाती है। हम भी पाठक को यही बता कर तैयार कर लेते हैं।

इस योजना का पता नभाटा में कार्यरत पत्रकारों को भी नही है, इस का पता यूं चला कि नभाटा के एक पत्रकार इस बात से बहुत गदगद थे कि एनसीआर की टीम की मेहनत के चलते अखबार की प्रसार संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। जब उन्हें बताया गया कि अगर पाठकों अखबार मुफ्त मिलेगा तो प्रसार संख्या तो बढे़गी ही। जब उन्हें बताया गया कि अखबार की प्रसार संख्या तो हॉकर्स की मेहनत से बढ़ रही है। पहले तो उन्हें इस पर विश्‍वास ही नहीं हुआ, मगर जब उन्होंने संस्थान से पता किया तो वह भी मान गए कि यह बात किसी हद तक ठीक है कि अखबार की प्रसार संख्या बढ़ने का मूल कारण हॉकर्स का प्रचार ही है।

चूंकि यह योजना कानों कान चल रही है इस लिए अन्य अखबारी संस्थानों को भी इस बारे में पता नहीं है। अपने समाज में बहती गंगा में हाथ धोने वाले भी होते हैं। एक जानकार ने कहा कि चार सौ रुपए में नवभारत वाले एक साल तक अखबार दे रहे हैं। जब उन्हें बताया गया कि चार सौ नहीं तीन सौ में दे रहे हैं। अगले दिन हॉकर से पूछा तो वह अपनी गलती मान गया। उस की सोच थी कि एक सौ उसे बच जाएंगे। वैसे इस संस्थान के मैनेजरों की सोच यह लगती है कि एक साल तक नवभारत टाइम्स पढ़ने के बाद पाठक को हो सकता है नवभारत टाइम्स ही पढ़ने की आदत पड़ जाए। क्षेत्रीय अखबारों अमर उजाला और जागरण के बढ़ते प्रभाव के चलते दिल्ली के अखबारों की हालत पतली हो गई है। अमर उजाला और जागरण ने इन्हें धकेल कर यमुना के तट पर खड़ा कर दिया है। हिन्दुस्तान की समझ में चार-पांच साल पहले यह बात आ गई थी,  सो उस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखबार पर ताकत लगानी आरंभ कर दी थी। अब नवभारत टाइम्स भी योजना बना रहा है जिसका एक प्रयोग एनसीआर में किया जा रहा है।

लेखक डा. महर उद्दीन खान वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. नवभारत टाइम्‍स समेत कई पत्र पत्रिकाओं नौकरी एवं लेखन कर चुके हैं. टीवी से भी समान रूप से जुड़ाव है. इनकी कई उपन्‍यास एवं व्‍यग्‍यं संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं. शाह टाइम्‍स के कार्यकारी संपादक भी रह चुके हैं. अध्‍यापन का कार्य भी किया है. फिलहाल स्‍वतंत्र लेखन में सक्रिय.


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