'न्यूज आफ द वर्ल्ड' के 'इंड आफ द वर्ल्ड' बनने की कहानी, कुछ तस्वीरों की जुबानी

E-mail Print PDF

कोई अखबार जब बंद होता है तो उसके मालिक को जितना कष्ट नहीं होता, उससे ज्यादा कष्ट उसमें काम करने वालों को होता है. इसलिए कि वो अखबार उनके मां, बेटे, पत्नी, घर, परिवार की तरह हो जाता है. वे अपनी जिंदगी के कीमती घंटे उस अखबार को दे रहे होते हैं. उन्हें उस अखबार के आफिस की एक एक चीज से अपनापा होता है. न्यूज आफ द वर्ल्ड अखबार बंद हुआ तो पूरी दुनिया में पत्रकारिता जगत के लिए एक बड़ी खबर बन गया.

इस अखबार के बंद होने पर तरह तरह की बहसें शुरू हो चुकी हैं. पत्रकारिता के तौर तरीकों पर बात हो रही है. एकेडमिक से लेकर जर्नलिस्ट और पोलिटिशयन तक इसकी विवेचना अपने अपने तरीके से कर रहे हैं. यहां हम न्यूज आफ द वर्ल्ड के द इंड होने के समय की कुछ तस्वीरें दे रहे हैं. ये ऐतिहासिक तस्वीरें हैं. पत्रकारिता के शोधार्थी इसे सहेज कर रख सकते हैं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

ये है न्यूज आफ द वर्ल्ड अखबार के आखिरी अंक का पहला पन्ना

ये है न्यूज आफ द वर्ल्ड अखबार के आखिरी अंक का पेज नंबर दो

आखिरी अंक निकालने के लिए न्यूज आफ द वर्ल्ड आफिस में पत्रकारों व कर्मियों की सक्रियता का एक दृश्य. इस तस्वीर को एक कर्मचारी ने अपने मोबाइल से लिया.

आखिरी अंक के एक पेज को अंतिम रूप देता पेज आपरेटर

आखिरी अंक निकालने के बाद मीडियाकर्मी जब आफिस से बाहर निकले तो दूसरे अखबारों के मीडियाकर्मियों के लिए वे खबर बन गए. उनकी तस्वीर खींचने के लिए सैकड़ों कैमरे चमक पड़े.

आखिरी अंक के फ्रंट पेज को दूसरे अखबारों के मीडियाकर्मियों को दिखाते न्यूज आफ द वर्ल्ड के आखिरी संपादक.

आखिरी अंक के फ्रंट पेज को सजाता, संवारता पेज आपरेटर

आखिरी अंक का फ्रंट पेज अब दुनिया भर के अखबार म्यूजियमों, शोधार्थियों के लिए संजोकर रखने की चीज बन गया है. पेज का एक क्लोजअप.

लंदन के दूसरे अखबारों ने न्यूज आफ द वर्ल्ड अखबार बंद होने की खबरें प्रकाशित कीं. द गार्जियन में प्रकाशित खबर यूं है.

न्यूज आफ द वर्ल्ड सनसनीखेज और ब्रेकिंग न्यूज के लिए दुनिया भर में चर्चित हुआ. इस अखबार का एक पुराना फ्रंट पेज.

 


AddThis
Comments (2)Add Comment
...
written by Aliya Khan, July 11, 2011
Aik atihasik aur sarvadhik prasar sankhya vale akhbar ki sabhi sadhan hote hue maut ho jana achcha nahin laga. meida jagat se judhav hone ke karan laga jaise apna khas sambandhi kho diya hai. News of the world ne pathakaon ki mansikta aur test ko pahchana, patrkaron ne bhi risk lekar akhbar mein khabren paroseen. Bhale hi akhbar par kitne hi aarop lage hon par 168 saal tak aik akhbar ka zinda rahna apne aap mein aik itihas hai. akhbaar se judhe rahe saare staff ke sath hi News of the World ko mera salaam.
...
written by Abhishek sharma, July 10, 2011
dukhad....lekin uchit.

Write comment

busy