''सत्‍तापरस्‍त हो गए हैं बिहार के अखबार''

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बिहार मीडिया वाच ने राज्‍य के फारबिसगंज में हुए गोलीकांड की घटना में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. बिहार मीडिया वाच की तरफ से प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष को भेजे गए पत्र में आरोप लगाया गया है कि हिंदुस्‍तान, जागरण और अन्‍य कई अखबारों ने जन पक्षधर होने की बजाय सत्‍तापरस्‍त की भूमिका निभाई. घटना में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी को सही ठहराने की भी कोशिशें की गई.

मीडिया वाच ने अपने दो पेज के पत्र में कहा है कि राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग के अध्‍यक्ष हबीबुल्‍लाह वजाहत के दौरों को भी किसी भी अखबार ने महत्‍व नहीं दिया, जिससे अल्‍पसंख्‍यकों के मन में इन अखबारों में होने वाली पत्रकारिता को लेकर संदेह उत्‍पन्‍न हो गया है.

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Comments (11)Add Comment
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written by pushpraj, July 20, 2011
यसवंत जी और भड़ास परिवार को धन्यवाद कि आप जनहित में सत्य को प्रस्तुत करना चाहते हें .उन सब को धन्यवाद जिन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है . प्रेस कोंसिल के माननीय चेयरमेन महोदय के हवाले से अब तक बिहार मीडिया वाच के आवेदन का जवाब प्राप्त नहीं हुआ है .लेकिन इंडियन आवाज़ डोट कॉम नामक एक अंग्रेजी वेब की खबर है क़ि प्रेस कोंसिल ने बिहार से प्रकाशित कुछ अख़बारों से जवाब -तलब का फैसला लिया है .भड़ास के द्वारा बिहार मीडिया वाच के आवेदन को सार्वजनिक करने के बाद आप पाठको ने जो प्रतिक्रिया दी है ,उनमे एक अज्ञात और दूसरा कालचिंतन जी का जवाब है .कालचिंतन का मेल हमारे आवेदन के आरोपित किसी अभियुक्त की भाषा प्रतीत हो रही है .जब माननीय प्रेस कोंसिल चेयरमेन को पत्रा में यह स्पष्ट लिखा गया है कि बिहार मीडिया वाच कुछ पत्रकार -लेखको का मोर्चा है तो इस मोर्चे की विश्वसनीयता पर सवाल उठानेवाले ये साब कितने विश्वशनीय हें ,उनकी पड़ताल भी होनी चाहिए .आप पहले अपराध करिए और फिर अपराध पर आपत्ति करनेवाले के विरुद्ध अनाप -शनाप बोलिए ,यह आपका अपना अधिकार है .इस मोर्चा में किस -किस अख़बार के कौन -कौन पत्रकार शामिल हें ,यह सार्वजनिक करना जरुरी नहीं है .लेकिन जिन दो मनुष्यों के हस्ताक्षर इस आवेदन पर किये गए हें ,उन्हें अनाड़ी बतानेवाले क्या अपने मौलिक अस्तित्व के साथ सामने आने के लिए तैयार हें .विष्णुकांत शुक्ला जी ,अरविन्द जी ,श्रीकांत सौरभ जी आप सबको धन्यवाद .
शालिनी जी ,आपने फारबिसगंज के जिन संवाददाता की चर्चा की है ,उनका नाम मैंने उनकी इजाजत के बिना सार्वजनिक करना अनुचित समझा था .हम जन उनके सम्मान की योजना पर विचार कर रहें हें .
सादर -पुष्पराज -९४३१८६२०८०.
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written by vidrohi, July 15, 2011
bihar k akhbaron ka sampadak chahe jo ho, lekin sabhi akhbaron ke pradhan sampadak nitish kumar hi hain.
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written by arvind Kumar, July 14, 2011
Vishnu Kant Shukla ji.....Aap ko shayad pata naheen ki LOHA hi LOHE ko katata hai......agar nada nautanki baaj naheen hote Nitish babu to shayad hi apane dusare karya-kaal tak jaa pate.....Naheen Mama se kana mama achha ....aap laloo se inaki tulna kar rahe hain.... ye aapki samajh ka fer hai.....har aadmi main Achhai aur Burai dono hoti hai....koyee glaas pura khali ya pura bhara huaa naheen hota......bach gayee baat hindustan ke reporter ki ya binod bandhu ya srikant ki.....to ye log jahan per hain apani kabliyat per hi hain......chahe wo kabliyat buttering ki hi kyun na ho.....ye alag mudda hai......samaj main agar kisi news se nafrat failati hai to kya ye dayitwa patrakarita ka naheen hai....ki is nafrat ko roken......aap ne jo likha hai ye aisi reporting hai joaapake ander ki irssya ,dwesh....aapaki mansik apangata ka bakhan karti hai......
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written by श्रीकांत सौरभ, July 13, 2011
बिल्कुल सही रिपोर्ट है.
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written by shalinee kumaree, July 12, 2011
me forbesganj k reporter amrendra jee ko jantee hu.we hindustan aur aajtak k reporter hae.unke dwara liya gaya footes par itna bada babal macha hai.hindustan k sbhee electronic chenlon ne use khela magar pushpraj sir batawe ki aajtak kisi ne unhe dhanyawad tak bhi diya kya?jaha tak akhwar k sawal hae to is daur me akhwar aur sarkar me koi fark nahi hae.footes lene k dauran amendraji ko chote bhee aai magar bhagalpur k chatukar reportero ne unse halchal tak nahi puchha .jis tarah hindustan me amrendra ka pratibha khatm o raha hae unhe turant aese akhwar ko laat mar dena chahiye ..............sorrydont take it otherwise..........|
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written by Sushant samdershi, July 12, 2011
bihar ki patrkarita me tathyon ko dabaane or sarkaar ki chatukarita krne ka yeh koi pahla mamla nahi hai. nitish ki sarkaar k satta me ate hi patrakrita mano sarkaar k yahan girwi rakh di gaee hai. pahle jahan patrakrita k kendr bindu me lalu virodh tha wahi ab nitish chaleesa rah gaya gai. nitish ki ghosnaaon, rashan ki dukan ka licecne radd or aayojan wa baithak k alawa ab patrakro ko ab kuchh likhne k liye nahi hai. pura akhbaar in petty khabron sa bhara rahta hai. waah re patrakka or aap ki patrkarita........! chor ho gaaen hain adhiktar patrkaar aor jo chor nahi bane wo ghut ghut ker mer rahe hai. apni zameer ki aawaaz suno, chori band karo pesha ko kalankit mat kro.
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written by kaalchintan, July 12, 2011
बिहार मीडिया वाच से जुड़े लोगों के विषय में अधिक जानकारी नहीं है. मगर यह स्पष्ट दिख रहा है कि ये लोग पत्रकारिता के मामले में अनाड़ी हैं. वरना इस बात पर गौर फरमाते कि हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण जैसे अखबार, जिनके देश भर में कई संस्करण छपते हैं, उनके सम्पादकीय कोई पटना में बैठकर नहीं लिखे जाते. इसलिए इसमें संस्करण विशेष के विरुद्ध कार्रवाई की बात समझ से परे है. दूसरे, महेश भट्ट के मामले को यों पेश किया गया है मानो वही अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हों या, कम-से-कम, कोई दिग्गज नेता हों जिनके विरुद्ध टिप्पणी कर देने से लोग आहत हो जायेंगे. वे महज एक फिल्मकार हैं जो अन्य फिल्मकारों की ही तरह पैसों के लिए फिल्म बनाते हैं. बयान तब आया था जब उनकी फिल्म मर्डर - 2 प्रदर्शित होने में महीना भर शेष था और ऐसे समय में हर फ़िल्मी हस्ती कुछ ज्यादा ही सामाजिक सरोकार दिखाने लगती हैं. यह एक बिजनेस ट्रिक हो चला है. अब इस गैर-ज़रूरी वकालत को देखते हुए अगर यह इलज़ाम कोई लगा बैठे कि भट्ट साहब, या उनके करीबी रहे एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री, बिहार मीडिया वाच द्वारा यह सब प्रायोजित करवा रहे हैं तो कैसे बचाव करेंगे अपना?
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written by anonymous, July 12, 2011
वास्तविक घटना.....लेकिन उसको लेकर फर्जी संस्था द्वारा की गयी फर्जी शिकायतें और उस पर फर्जी टिप्पणियाँ. बहुत खूब
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written by vishnu kant shukla, July 11, 2011
आदरणीय पुष्पराज भाई,
आपने जो कुछ भी लिखा है, ठीक ही लिखा है। मैं सहमत हूं। यह सौ फीसद सच है कि बिहार की पत्रकारिता सत्ता की चाटुकारिता तक सीमित होकर रह गयी है। इसके पीछे बड़ा कारण क्या है, आपको पता है। यह है विज्ञापन। तोपची टाइप के सारे पत्रकार भीतरे लग गए हैं। फंडा एकदम साफ-साफ है कि सरकारी विज्ञापन बंद नहीं होना चाहिए। फारबिसगंज कांड में क्या हुआ, यह भग्न सचाई मीडिया नहीं लिख सकता। लिख भी दिया तो छपेगा नहीं। जो लिखेगा, वह नपेगा। आप मानें या न मानें, गत 7 सालों से बिहार में पत्रकारिता बंद है। पाठकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है, उट-पटांग खबरें देकर।
आपने विनोद बंधु का जिक्र किया है। ये आदमी पत्रकारिता कब कर रहा था। यह तो नीतीश सरकार को अपनी लेखनी से बचाने का हरसंभव जतन करता रहा है। रोम जलता रहा, नीरो बांसुरी बजाता रहा की तर्ज पर पटना में घटने वाली हर घटना से अनजान यह पोतांबरी में बिजी रहता है। मजेदार बात यह है कि इस आदमी को आज तक उसका प्रारब्ध नहीं मिला और न ही मिलने वाला है। पत्रकारिता में इस किस्म के चोरों के आ जाने से बिहारी ही नहीं, पूरी पत्रकारिता कलंकित हुई है।
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written by vishnu kant shukla, July 11, 2011
प्रिय पुष्पराज भाई,
अच्छा लगा जो आपने अपनी आपत्ति जताई। आपकी आपत्ति में लेश मात्र भी गड़बड़ी नहीं है। फारबिसगंज कांड की अखबारों में रिपोर्टिंग देख कर मैं खुद भी सन्न हूं। जहां तक सवाल बिनोद बंधु का है तो वह चूके हुए कलमघिस्सू हैं जो अक्कू श्रीवास्तव का नहीं, नीतीश कुमार को खुश करना चाहते हैं। यह दीगर है कि आज तक वह उन्हें खुश नहीं कर सके। उस आदमी की रिपोर्टिंग के बारे में कुछ भी लिखना रिपोर्टिंग का अपमान होगा।
आप एक बात समझें। नीतीश कुमार से बिहार के सभी अखबारों की फटती है। कारण क्या है। कारण है विज्ञापन। हिंदुस्तान का विज्ञापन रोका गया था, प्रतिकूल खबर छापने पर। बड़े संपादक को आना पड़ा था उन्हें (नीतीश को) मनाने के लिए। बड़े संपादक को नीतीश कुमार ने मिलने का वक्त नहीं दिया। तो सच यह है कि सरकार के खिलाफ बड़ी खबर छापने का खम अब बिहार के पत्रकारों में नहीं है। लालू को गरियाने वाले भाई लोग अब गए तेल लेने। प्रबंधन ने सबको निकाल दिया है। कहां चलती है अब श्रीकांत की कलम। या, जितने बड़े-बड़े क्रांतिकारी पत्रकार थे, किस बिल में छुप गए।
एक काम और करें। किसी बंदे से हाईकोर्ट में एक पीआईएल दाखिल करवा कर फारबिसगंज कांड की किसी सिटिंग जज से जांच करवाइए। नीतीश कुमार का सच सामने आ जाएगा। याद रखिएगा, यह लालू से बड़ा नौटंकीबाज मुख्यमंत्री है। समझते-समझते समझिएगा।
विष्णु कांत शुक्ला
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written by arvind Kumar, July 11, 2011
to kya ise chatpati khabar banate aur samajik dwesh failate ..fir pratikriya swarop kuch aur jaane jaati.......kuch naya mamla banta ..sarkar aasthir hoti......neta logo ki bheed jama hoti......jaise RAHUL gandhi ne baki jagahon per gandh failai hai ...yaha bhi failana chaha ....samaj banta nahee....kis baat ki takleef hai aapako............

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