वैचारिक चोरी या टेलीपैथी!

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ऐसा दुर्लभ संयोग कभी देखने को नहीं मिला कि दो पत्रकारों के विचार एकदम शब्दशः एक जैसे हों. लेकिन दिल्ली और भोपाल के बीच सात सौ किलोमीटर की दूरी पर बैठे दो वरिष्ठ पत्रकारों को एक समय में एक ही आइडिया आया. दोनों ने अपनी कलम चलाई, नतीजा ऐसा निकला कि पूरा पत्रकार जगत हैरान हो सकता है. इन दोनों पत्रकारों ने जो लेख लिखे वे शब्द-दर-शब्द एक जैसे हैं.

एक पत्रकार है भोपाल के प्रदेश टुडे के प्रभात दिवाकर जिनके नाम के साथ स्वतंत्र पत्रकार लिखा हुआ है, तो दूसरे हैं राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक रणविजय सिंह. हालांकि सहारा में यह लेख 'निधि में सांसदों का ख़याल'  रविवार के अंक में ही छप चुका है,  और प्रदेश टुडे ने आज सोमवार को सम्पादकीय पेज पर 'स्थानीय विकास में सांसद निधि की भूमिका'  शीर्षक से छापा है. विचारों की इतनी लंबी टेलीपैथी... वाह-वाह करने को दिल करता है.

उपदेश सक्सेना

नई दिल्ली


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Comments (2)Add Comment
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written by pankaj piyush, July 12, 2011
updesh jee. khyal hee to hai aapas me takra gaye to kaya..bade-bade logon ke sath aksar ho jata hai. sahara grup ke samooh sampadak ranvijay singh ne yah kamal pahlee bar nahee kiya hai. jab lucknow unit ke naee - naee rejedent editor hooye to inhen kalam lekhne ka shawkh charraya.. inka kalam sooroo hoowa. kai log usame soodhar karte to yek saptah me yek lekh aataa..isee bich bhartii (poora naam dena uchit nahi hoga) lekhk ke lekh ke kai pera inke lekh se mil gaye the. usne patra likhkar dhamkii di. uskee dhamkee ke dabaw me in mahoday ko uske kai lekh chapane pade.. ush wakt vah chota lekhk.. rashtriya sahara me uske kai lekh chape aaj vah bada lekhk ho gaya hai. smilies/smiley.gifsmilies/wink.gifsmilies/grin.gif
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written by सोनू उपाध्‍याय , July 12, 2011
हुआ क्‍या है पढकर ही पता चलेगा..

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