वैचारिक चोरी या टेलीपैथी!

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ऐसा दुर्लभ संयोग कभी देखने को नहीं मिला कि दो पत्रकारों के विचार एकदम शब्दशः एक जैसे हों. लेकिन दिल्ली और भोपाल के बीच सात सौ किलोमीटर की दूरी पर बैठे दो वरिष्ठ पत्रकारों को एक समय में एक ही आइडिया आया. दोनों ने अपनी कलम चलाई, नतीजा ऐसा निकला कि पूरा पत्रकार जगत हैरान हो सकता है. इन दोनों पत्रकारों ने जो लेख लिखे वे शब्द-दर-शब्द एक जैसे हैं.

एक पत्रकार है भोपाल के प्रदेश टुडे के प्रभात दिवाकर जिनके नाम के साथ स्वतंत्र पत्रकार लिखा हुआ है, तो दूसरे हैं राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक रणविजय सिंह. हालांकि सहारा में यह लेख 'निधि में सांसदों का ख़याल'  रविवार के अंक में ही छप चुका है,  और प्रदेश टुडे ने आज सोमवार को सम्पादकीय पेज पर 'स्थानीय विकास में सांसद निधि की भूमिका'  शीर्षक से छापा है. विचारों की इतनी लंबी टेलीपैथी... वाह-वाह करने को दिल करता है.

उपदेश सक्सेना

नई दिल्ली


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