पत्रकार पूछेंगे राहुल गांधी से- वेज बोर्ड के सवाल पर केंद्र क्यों कर रहा टालमटोल?

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: कांग्रेस पर दबाव बढ़ाएंगे पत्रकार : लखनऊ : उत्तर प्रदेश के पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को जल्द लागू करने के लिए कांग्रेस पर दबाव बढ़ाएंगे। शुरुआत पूर्वांचल में राहुल गाँधी के दौरे से होगी। पश्चिम के बाद पूर्वांचल में राहुल गांधी का दौरा शुरू होने जा रहा है। संसद के मानसून सत्र में सौ सांसदों से यह सवाल उठाने की तैयारी की जा रही है।

पत्रकार संगठनों और विभिन्न प्रेस क्लब से जुड़े पत्रकार राहुल गांधी से यह सवाल पूछेंगे कि केंद्र सरकार पत्रकारों के वेज बोर्ड के सवाल पर टालमटोल क्यों कर रही है। जिलों के पत्रकारों की सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने अभी तक कोई ठोस पहल क्यों नही की। केंद्र सरकार का वकील देश की सबसे बड़ी अदालत में पत्रकारों के हितों की अनदेखी करते हुए मालिकों का अप्रत्यक्ष साथ कैसे दे रहा है। जबकि पत्रकारों के हितों के खिलाफ अख़बारों से लेकर वेब साईट तक अभियान चलाया जा रहा है। इस तरह के कई सवाल उठाने की तैयारी है। लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार संघ की आज यहाँ हुई बैठक में यह आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। काशी पत्रकार संघ, गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन, इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट, श्रमजीवी पत्रकार संघ और कई जिलों के प्रेस क्लब आदि इस अभियान में शामिल होंगे।

लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष सिद्धार्थ कलहंस ने कहा - राहुल गांधी के पूर्वांचल दौरे के समय गोरखपुर से लेकर वाराणसी तक जहाँ भी पत्रकारों को मौका मिलेगा उनसे पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेज बोर्ड को लटकाए जाने को लेकर सवाल किया जाएगा। और यह सब चुनाव तक चलेगा। ताकि मीडिया के प्रति कांग्रेस सरकार का रुख साफ़ हो। इस बीच पत्रकार संगठनों की अपील पर समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने कहा - हमारी पार्टी पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए बने वेज बोर्ड की सिफारिसों को लागू किए जाने के पक्ष में है और सांसद के मानसून सत्र में हम यह सवाल उठाएंगे। समाजवादी पार्टी के साथ ही कई और दलों के सांसदों से भी संपर्क किया जा रहा है।

उम्मीद है सांसद के मानसून सत्र में सौ से ज्यादा सांसद पत्रकारों के वेज बोर्ड का सवाल उठाएंगे। उधर काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष योगेश गुप्त ने कहा - काशी पत्रकार संगठन तो पिछले दस साल सेअख़बारों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। कई अखबार जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम अखबार निकाल कर सरकारों से हर तरह का फायदा उठाते है वे ही पत्रकारों का सबसे ज्यादा शोषण कर रहे है। इस समय ये अखबार वेज बोर्ड की सिफारिशों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला रहे है। इन अखबारों ने अपने यहाँ काम करने वाले पत्रकारों पर किसी भी पत्रकार संगठन में शामिल होने पर रोक भी लगा रखी है। ऐसे में इन अख़बारों के पत्रकार खुल कर सामने नहीं आ सकते पर दूसरे पत्रकार राहुल गांधी से यह सवाल जरुर पूछेंगे। एक तरफ अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट में नरीमन जैसे दिग्गज वकील को खड़ा कर देते है तो दूसरी तरफ पत्रकार संगठनों की तरफ से कोई वरिष्ठ वकील तक सामने नहीं आ पता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

इस बीच मजीठिया वेज बोर्ड के सदस्य और इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के विक्रम राव ने कहा - मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कानूनन एक महीने के भीतर नोटिफाई हो जाना चाहिए। हैरानी की बात है कि छह महीने बाद भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इससे ज्यादा गंभीर बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार के वकील ने मालिकों को और समय दिए जाने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे केंद्र सरकार की नियत पर सवाल तो उठता ही है। ऐसे में सरकार को इस बारे में अपना पक्ष जरुर साफ़ करना चाहिए।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में वेज बोर्ड के दायरे में अब बहुत कम पत्रकार बचे है और उनपर भी ठेके पर आने का दबाव बना हुआ है। दूसरी तरफ जो पत्रकार ठेके पर है उनकी स्थिति दिहाड़ी मजदूरों से भी ज्यादा गई गुजरी है। जिले के पत्रकारों की स्थिति और ज्यादा खराब है। कई पत्रकारों की ख़बरों की वजह से हत्या हो चुकी है और इसके बावजूद कुछ के अपने अख़बारों में भी वे खबर नही बन पाए क्योकि मुआवजा देना पड़ता। करीब दर्जन भर पत्रकार गंभीर बिमारियों की वजह से आज बदहाली के शिकार है तो कुछ की जान जा चुकी है। जिलों के पत्रकारों की न तो कोई सामाजिक सुरक्षा है और न ही आर्थिक सुरक्षा। आए दिन जिन नेताओं का ये सवाल उठाते है वे इनका सवाल देश की सबसे बड़ी पंचायत में उठाएंगे या नही यह देखना होगा। साभार : जनसत्ता


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Comments (2)Add Comment
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written by rafat faridi, July 27, 2011
stringaron ke liye bhi kuch ho
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written by faizan musanna, July 21, 2011
बातें हैं बातों का क्या

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