प्रेस काउन्सिल ने दैनिक जागरण, लखनऊ के संपादक को नोटिस भेजा

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डा. नूतन ठाकुर कुछ दिनों पहले दैनिक जागरण में मुझसे जुडी एक खबर प्रकाशित हुई थी, 'असली राज'  शीर्षक से. इस सम्बन्ध में भड़ास पर एक खबर भी छपी थी- नाम से 'ठाकुर' शब्द हटाना जागरण वालों को नहीं पचा. बात यह हुई थी मेरे पति अमिताभ जी द्वारा अपना उपनाम हटाये जाने पर दैनिक जागरण के 10 अप्रैल 2011 के लखनऊ संस्करण के पृष्ठ संख्या 13 पर 'सत्ता के गलियारे से'  शीर्षक अंतर्गत छपे एक खबर 'असली राज' छपी थी.

इस में अमिताभ जी द्वारा अपने नाम के साथ जुड़े जातिसूचक उपनाम को हटाने के पीछे कई सारे कारण बताए गए, जिन्हें पढ़ कर ऐसा आभास होता था कि अमिताभ जी द्वारा यह कार्य किसी अच्छे उद्देश्य से नहीं कर के तमाम मजबूरियों और छिपे कारणों से किया गया हो. उस में भी खास बात यह थी कि संवाददाता महोदय ने इस खबर में अपनी कही गयी बातों के लिए कोई कारण अथवा आधार नहीं दिया था जैसा कि पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों और नियमों के अनुसार आवश्यक है. उनकी बातें तथ्यपरक नहीं हो कर एक प्रकार से उनकी कपोलकल्पना ही दिख पड़ती थी.

अपनी इस खबर में संवाददाता महोदय ने मेरे पति के साथ मेरे विषय में भी ऐसी बातें लिखीं जो मेरे लिए हानिपरक, मिथ्या और सार्वजनिक रूप से अनुचित थीं. उन्होंने लिखा -''मेम साहब एक गैरसरकारी संस्थान से जुडी हैं. इस संस्था ने उस आईपीएस अधिकारी को पुरस्कार दिया तो अखबार में ख़बरें छप गयीं कि 'मेम साहब'  ने घर का इनाम घर में ही रख लिया. मेम साहब को सफाई छपवाने में मेहनत करनी पड़ी.''  सत्यता यह थी कि ऐसी खबर दैनिक हिंदुस्तान के लखनऊ संस्करण में छपने के बाद मैंने जैसे ही उनके संपादक नवीन जोशी को पत्र प्रेषित कर सूचित किया, उनके द्वारा तत्काल इस सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट कर दी गयी थी.

इस पर हमारे द्वारा दैनिक जागरण के नोयडा स्थित संपादक को 13 अप्रैल 2011 को पत्र लिख कर उचित कार्रवाई किये जाने का निवेदन किया गया था,  लेकिन चूँकि इस सम्बन्ध में उस स्तर पर उचित कार्रवाई नहीं हो सकी, अतः हम लोगों द्वारा आगे चल कर प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को पत्र प्रेषित किया गया.

हम लोगों ने अपने पत्र में दैनिक जागरण के संपादक से निवेदन किया था कि इस अखबार के लखनऊ संस्करण में कैसे सम्बंधित पत्रकार द्वारा पूर्णतया गलत और भ्रामक ढंग से बिना किसी आधार के, संभवतः अपनी स्वयं की कल्पनाओं और अपनी निजी धारणा के वशीभूत हो कर यह खबर छापी गयी है. हमने यह कहा था कि जिस तरह से पत्रकार महोदय बिना आधार के, बगैर साक्ष्यों के अपनी कल्पनाओं के आधार पर या पुलिस महकमे के किन्हीं कथित चर्चाओं के आधार पर हमारे कार्यों का गलत स्वरुप प्रकट कर रहे हैं, यह वाजिब नहीं दिख पड़ता और प्रेस के लिए स्थापित मानदंडों के सर्वथा विपरीत है. हमने इस सम्बन्ध में न्यायोचित कार्रवाई करते हुए इस खबर से गलत ढंग से पहुंचे नुकसान के विषय में उचित कार्रवाई करने का निवेदन किया था.

इस पर जब हमें किसी प्रकार से किसी कार्रवाई की जानकारी नहीं हुई तो हमने 09 मई 2011 को प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को प्रेस काउन्सिल एक्ट 1978 की धारा 14(3) तथा प्रेस काउन्सिल (प्रोसीजर ऑफ इन्क्वायरी) रेगुलेशन 1979 के नियम 3(2) के अंतर्गत यह सूचित किया कि किस तरह से इस मामले में सम्बंधित समाचार के प्रकाशन में प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के 'नोर्म्स ऑफ जर्नलिस्टिक कंडक्ट'  (पत्रकारों के लिए आचार संहिता) 2010 संस्करण के बिंदु संख्या 1, 2 तथा 3(x) का विशेष रूप से उल्लंघन हुआ है.

हमारे पत्र के प्रेषण के पश्चात प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया की अनुभाग अधिकारी (शिकायत) सुश्री रीता पाल का पत्र दिनांक 23 जून 2011 अब हमें प्राप्त हुआ है जिसमे हमें यह अवगत कराया गया है कि हमारे प्रेषित पत्रों के आधार पर प्रतिवादी संपादक, दैनिक जागरण, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) को टिप्पणियों हेतु नोटिस जारी किया जा रहा है. यह भी बताया गया है कि जैसे ही प्रतिवादी से कोई टिप्पणी प्राप्त होगी उसकी प्रति मुझे प्रत्युत्तर टिप्पणी हेतु प्रेषित की जायेगी. अब मैं इस टिप्पणी की प्रतीक्षा कर रही हूँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्री


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Comments (2)Add Comment
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written by shailesh asthana , July 26, 2011
अच्छी बात है। अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है तो विरोध तो होना ही चाहिए। अगर जागरण के पत्रकार ठीक थे तो उन्हें सामने आ कर जवाब देना चाहिए था।
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written by अरविन्द त्रिपाठी, July 26, 2011
नूतन जी,
धुंध के उस पार देखा कीजिए,
रौशनी की धार देखा कीजिए.

हाथ दीखते है सभी के एक से,
हाथ के हथियार देखा कीजिए.

आज की पत्रकारिता और समाचार पत्रों पर किसी गजल का ये टुकड़ा काफी है.

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