पत्रिका स्‍वागत कक्ष : सदव्‍यवहार की शुरुआत अपने दफ्तर से करें गुलाब कोठारी

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rajendra hadaनियमित पत्रकारिता से किनारा करने के पौने तीन साल बाद परसों यानी 29 जुलाई को एक अखबार के दफ्तर जाने का संयोग बना। स्वागत कक्ष पर ही जो माहौल था और जिस अनुभव से गुजरा उसके बाद भीतर जाने की इच्छा नहीं रही और बाहर से ही लौट आया। समयानुकूल परिवर्तन, नवीनतम बदलावों और कॉर्पोरेट कलचर के नाम पर अखबार के दफ्तरों का जो हाल हो गया है, उससे लगा क्या वास्तव में अखबारों की पहुंच अब आम आदमी तक है।

अजमेर की एक बहुत महत्वपूर्ण जमीन है। शहर की हद में यह 36 बीघा जमीन नगर सुधार न्यास की है जहां बाजार विकसित करने की नीलामी सोमवार 1 अगस्त 2011 से होने वाली थी। अजमेर का सवा सौ साल पुराना अदालत परिसर अब काफी छोटा पड़ने लगा है। यह सरकारी जमीन ठीक अदालत के सामने है। व्यावसायिक की जगह इसे अदालत परिसर के लिए आबंटित किए जाने की एक रिट याचिका अपने और अपने एक वकील मित्र देवकीनंदन शर्मा के नाम से राजस्थान हाईकोर्ट में दायर करवाई थी। इसकी सुनवाई जयपुर हाईकोर्ट में जारी थी।

अपन को किसी काम से वैशाली नगर के उस क्षेत्र में जाना हुआ जहां राजस्थान पत्रिका का दफ्तर है। इस नए दफ्तर में अपना कभी जाना नहीं हुआ था। समय भी था, सोचा पुराने परिचित कोई तो मिलेंगे उन्हें मिल लेते हैं। उन्हें अभी खबर भी बता देते हैं और शाम को अदालती आदेश की जानकारी दे देंगे। शाम को वैसे भी इस महत्वपूर्ण खबर का प्रेस नोट जारी करना ही था। पता लगा एक-दो पुराने पत्रकार साथी इस समय दफ्तर में हैं। उन्हें पहुंचने की जानकारी हो गई और वे इतने भले थे कि खुद दफ्तर के बाहर मुझे लेने पहुंच गए, मैं उस समय तक वहां नहीं पहुंचा था, लिहाजा देख दाखकर फिर भीतर अपना काम करने लौट गए।

कार्पोरेट कलचर की नकल पर आजकल छोटे और मध्यम श्रेणी के शहरों के अखबार के दफ्तरों में भी फ्रंट ऑफिस या रिसेप्शन होने लगे हैं। रिसेप्शन काउंटर पर बैठे युवक ने देखा और कुछ कहूं उससे पहले ही बोल पड़ा। उधर बैठ जाओ, उधर। रिसेप्शन पर लगे दो छोटी सोफानुमा बेंचों पर पहले ही छह लोग धंसे पडे़ थे। लिहाजा खडे़ रहना मजबूरी थी। भीतर जिन पत्रकार साथी के होने की जानकारी थी उनका नाम लेकर कहा कि उनसे मिलना है। हां, हां बैठो अभी। फिर वही स्थिति बैठें कहां? कुछ क्षणों बाद फिर कहा उन्हें इंटरकॉम पर बता तो दो। वो तो है ही नहीं बाहर है। उसे बताया कि भइया वे मुझे लेने ही बाहर आए थे वापस भीतर लौट गए हैं। उसने कोई जवाब नहीं दिया।

एक परिचित मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के लिए पूछा। वो भी बाहर गया है। इतने में पास के किसी केबिन में मौजूद मार्केटिंग वाले साथी की बात करने की आवाज बाहर आ गई। उसे बताया कि आप उनके बाहर जाने का कह रहे हैं जबकि भीतर से आवाज आ रही है। हां तो आ गया होगा। लगा यह एक प्रतिष्ठित अखबार का दफ्तर का स्वागत काउंटर है या गलती से किसी और जगह आ गया हूं। पत्रकारों जैसे सम्मानित साथियों और मार्केटिंग जैसी अखबार की रीढ़ ही हड्डी जैसे विभाग के साथियों के लिए रिसेप्शन जिन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था और मुझ अपरिचित का जो 'स्वागत'  कर रहा था वह अपने लिए अखबार के दफ्तर के लिहाज से बिल्कुल नया था।

बहुत तो नहीं परंतु कभी-कभार नई दिल्ली के नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और पीटीआई के दफ्तरों में जाना हुआ था। ऐसा रिसेप्शन तो कहीं नजर नहीं आया। जयपुर में राजस्थान पत्रिका के झालाना संस्थानिक क्षेत्र कार्यालय में भी ऐसा नहीं है। अजमेर के भास्कर और नवज्योति में भी ऐसा तो कभी नहीं देखा। तब तक मार्केटिंग वाले साथी से मुलाकात हो गई परंतु अपना मन खिन्न हो चला था। उन्होंने अंदर चलने के लिए बहुत कहा। पत्रकार साथियों को भी जानकारी देने की बात कही परंतु अपनी इच्छा भीतर जाने की नहीं हुई। बाद में पता लगा कि वह राजस्थान पत्रिका का चपरासी है जो रिसेप्शन भी संभाल लेता है और बदतमीज इस हद तक है कि पत्रकारों द्वारा चाय-पानी पिलाने के लिए कहने पर उलटे-सीधे जवाब दे देता है।

राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी लगभग सप्ताह में एक दो बार लेख लिखते हैं जिनमें ज्यादातर सदाचरण, सद्व्यवहार, नैतिकता, सद्कर्म आदि विषयों के इर्द-गिर्द होते हैं। लगा लेखन के साथ इसकी प्रायोगिक शुरुआत वे अपने दफ्तर से ही क्यों नहीं करते? ऐसे रिसेप्शन, फ्रंट ऑफिस या स्वागत कक्ष से तो उसका ना होना ठीक है। सरकारी दफतरों की भले ही लाख बुराइयां की जाती हैं,  परंतु वहां की हर टेबिल तक आम आदमी की सीधी पहुंच तो है। कभी किसी सरकारी दफ्तर में मिलने-जुलने या प्रवेश को लेकर कोई पाबंदी या समय सीमा तय की जाती है तो सबसे पहले अखबार ही उसे जनता के अधिकार से जोड़ते हुए एक गलत निर्णय बताते हैं। अखबार से बड़ा तो जनता का कोई दफ्तर नहीं होता। राजनेताओं को छोड़ दें तो वहां तो पहुंचते ही ज्यादातर जरूरतमंद हैं। ऐसे स्वागत कक्ष से भला उन पर क्या गुजरती होगी।

अखबार के दफतरों में शाम का समय काफी व्यस्तता भरा होता है परंतु दिन के एक बजे जब कोई आपाधापी नहीं हो तब भी फ्रंट ऑफिस का ऐसा माहौल सोचने के लिए मजबूर करता है। आफिस की मर्यादा के लिहाज से स्वागत कक्ष द्वारा रजिस्टर में जरूरी जानकारी दर्ज करवाने और भीतर इंटरकॉम पर जानकारी देने तक की स्थिति तो समझ में आती है,  परंतु ये दोनों ही काम नहीं कर उल्टा पद एवं जिम्मेदारी के लिहाज से अपने से काफी वरिष्ठों के लिए भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर सामने वाले को क्या संदेश दिया जा रहा था, समझ से परे था।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160 के जरिए किया जा सकता है


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