पहले पर्ची काटो फिर खबर खोजो, हिन्दुस्तान प्रबंधन का नया फरमान

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हल्द्वानी।  देश में तेजी से बढ़ने का दावा करने वाले हिन्दुस्तान अखबार में इन दिनों पर्ची काटो सिस्टम लागू किया गया है। उत्तराखंड में अखबार के कुमाऊं संस्करण के तहसील व जिला स्टिंगरों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं की रसीद बुक थमाई जा रही है। हर स्टिंगर को 25-25 रसीदों की बुक थमाकर पर्चियां काटने को कहा गया है। प्रत्येक पर्ची की कीमत 700 रुपये रखी गई है।

प्रबंधन के इस नए फरमान से स्टिंगरों में कड़ा रोष है। इस मामले को लेकर एक स्टिंगर व विज्ञापन प्रभारी के बीच तकरार इतनी बढ़ गई थी कि मारपीट की नौबत तक आ गई। हुआ यूं कि गुरुवार को संस्करण के स्टिंगरों की बैठक हल्द्वानी कार्यालय में बुलाई गई थी। बैठक में देहरादून से जीएम साहब भी पहुंचे थे। लेकिन समय से सूचना नही मिलने के कारण कई तहसीलों के स्टिंगर समय से वहां नही पहुंचे। बैठक में काफी कम स्टिंगर को देखकर जीएम साहब गुस्से में लालपीले होकर चले गए। बाद में वहां पहुंचे स्टिंगरों को रसीद बुकें थमा दी गई। पहले तो स्टिंगर मामले को समझ नहीं पाए, लेकिन कुछ ही पलों में तस्वीर साफ हो गई।

दरअसल रसीद बुक विज्ञापन उगाहने का एक तरीका था, जो कभी अमर उजाला ने अपनाया था। पूरी बैठक में सूचना देने से लेकर रसीद बुक देने में कुमाऊं विज्ञापन प्रभारी का अहम योगदान रहा। गाहे बगाहे यह जनाब स्टिंगरों को विज्ञापन न करने पर धमकाते भी रहते हैं। अमर उजाला से हिन्दुस्तान में आने के कारण वह पर्ची सिस्टम से भली भांति परिचित हैं। लेकिन मामला तब गर्मा गया जब विज्ञापन प्रभारी महोदय ने एक स्टिंगर पर रौब झाड़कर रसीद बुकें थमा दी। स्टिंगर के पर्ची काटने के विरोध के बाद दोनों में तीखी नोंकझोंक हो गई। बात इतनी बिगड़ी कि हाथापाई की नौबत आ गई।

प्रभारी ने किसी तरह बीच में पड़कर मामला शांत कराया। विज्ञापन प्रभारी को समझ आ गया होगा कि स्टिंगर उनका एजेंट नहीं,  अखबार की रीढ़ होता है। अगर रीढ़ ही ठीक नहीं होगी तो विज्ञापन व अन्य चीजें कैसे टिकी रह जाएंगी। शायद प्रबंधन को भी समझने की जरूरत है। वैसे अब स्टिंगरों को समझ नही आ रहा है कि वह उगाही का विरोध कैसे करें। आखिर खबर लिखने वालों पर हिन्दुतान जैसे अखबार में भी विज्ञापन का दबाव। शायद अखबार का नया नजरिया यही कुछ बयां करता है। अब अखबार के पत्रकार पहले पर्ची काटेंगे, फिर खबर खोजेंगे।


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