टीओआई कर्मियों के धरने का २६वां दिन - याचना नहीं अब रण होगा

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आज टाइम्स ऑफ़ इंडिया कर्मियों के शांतिपूर्ण धरने का २६वां दिन है.  अभी तक हमलोग शांतिपूर्ण धरना चला रहे हैं. इसलिए क्योंकि ट्रेड यूनियन को मालिकों ने बदनाम कर रखा है कि ट्रेड यूनियन वाले अपनी हरकतों से उद्योगों को बंद करवाते रहते हैं. मगर हमने पिछले नौ सालों से शांतिपूर्ण और कानूनी लड़ाई लड़ कर उनकी इस मान्यता को टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लड़ाई चला कर ध्वस्त कर दिया है.

आज अगर टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रबंधन प्रेस बंद करता है तो इसलिए नहीं कि यहाँ मिलिटेंट ट्रेड यूनियन हो रहा था. पिछले नौ सालों में यहाँ काम के समय कभी गेट मीटिंग भी नहीं हुई. आज अगर प्रेस बंद किया गया है तो सिर्फ इसलिए कि प्रबंधन अपने ही मजदूरों का मनीसाना वेतन का बकाया खाने की नीयत रखता है और साथ ही साथ मजीठिया वेतन आयोग का वेतनमान नहीं देना चाहता है.

आपको मालूम है कि १५ जुलाई का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना संस्करण टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अपने कुम्हरार स्थित प्रिंटिंग प्रेस से ही छपा था. मगर १६ जुलाई से यह प्रभात खबर के प्रेस से छपने लगा. मालूम हो कि हमारी यूनियन अपने कामगारों को जस्टिस मनीसाना सिंह वेज बोर्ड के मुताबिक वेतन देने की लड़ाई कर रही थी. हम इसके लिए डी.एल.सी से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं. यह लड़ाई पिछले नौ सालों से चल रही है.

प्रबंधन मजदूरों को यह कह कर मनीसाना वेतन नहीं दे रही थी कि हमारी चार अलग-अलग कम्पनियाँ हैं - बेनेट कोलमेन एंड कंपनी लिमिटेड, टाइम्स पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड, एक्सेल पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड और पर्ल प्रिंट वेल लिमिटेड और बेनेट को छोड़ कर अन्य किसी कंपनी पर मनीसाना वेज बोर्ड लागू नहीं होता है. कहानी को संक्षिप्त करते हुए हम इस सन्दर्भ में चारों कंपनियों द्वारा अलग अलग दायर क्रिमिनल मिस्लेनिअस मुकदमों ( १२८७६/२००४, १४०४६/२००४, १४३४४/२००४ और १४६२४/२००४) जिन सारे मुकदमों को एक साथ क्लब करते हुए पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अखिलेश चन्द्र द्वारा दिए गए न्याय-निर्णय के मुताबिक प्रबंधन का दावा पूरी तरह गलत है.

न्याय-निर्णय यह स्पष्ट करता है कि टाइम्स प्रबंधन गैर क़ानूनी हरकत कर रहा था. इस क़ानूनी लड़ाई में यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो न्याय के मान्य सिद्धांतों के मुताबिक कानून कामगारों के हक़ में ही फैसला देगा क्योंकि कंपनी प्रबंधन द्वारा गैर कानूनी हरकत के दस्तावेजी सबूत हैं. और इसी बीच जस्टिस मजीठिया वेतन आयोग की बात आ गई और प्रबंधन को लगा कि यदि मजीठिया वेतन आयोग देने की बात आयी तो मामला गंभीर हो जायेगा तो फिर क्यों ना सारे मामले को जड़ से ही ख़त्‍म कर दिया जाये. ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी. सिर्फ और सिर्फ इसी सोच के तहत प्रबंधन ने प्रिंटिंग प्रेस बंद करने का निर्णय हठात लिया. और वह भी तब जब कि कई एस.एल.पी मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े हैं.

ये मुक़दमे हैं - एस. एल.पी. (क्रिमिनल) - १०१३४/२०१०, १८८४/२०११, १९५६/२०११ और १९५७/२०११ तथा इन सभी मुकदमों को एक साथ सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट क़ी डबल बेंच ने विगत पांच जनवरी को यथास्थति बनाये रखने का आदेश पारित कर रखा है. आदेश कहता है "Issue notice. Status quo, as of today, shall be maintained." यह आदेश चारो कंपनियों द्वारा पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अखिलेशचन्द्रा के न्याय निर्णय के खिलाफ फाइल क़ी गई एस.एल.पीज को एक साथ क्लब करते हुए सुनते हुए जारी क़ी गई है. मगर देश की सबसे बड़ी अदालत के इस आदेश क़ी अवमानना करते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रबंधन ने प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया.

उधर यूनियन क़ी ओर से बकाये वेतनमान की वसूली के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में एक एस.एल.पी (सिविल) संख्या ३४०४५/२००९ दायर किया हुआ है. जिस में कोर्ट का अंतिम आदेश है - "Post for final disposal." इस केस को विगत २१ फरवरी को ही अंतिम डिस्पोसल के लिए सुना जाना था. मगर इसकी तारीख अब बढ़ कर ३१ अक्‍टूबर हो गई है. ऐसी स्थिति में जब क़ी क्रिमिनल एस.एल.पीज में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश है, सिविल एस.एल.पी.फ़ाइनल डिस्पोसल के लिए तय है और साथ ही साथ इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट का स्पष्ट प्रावधान है कि विवाद के चलते हुए सेवा शर्तों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है टाइम्स प्रबंधन ने सभी कानूनों और सुप्रीम कोर्ट आदेशों को ताख पर रखते हुए प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया.

महज इसलिए कि प्रबंधन उन मजदूरों का - जिन्होंने अपनी जवानी देकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बिहार क़ी धरती पर जमाया और एक जगह दिलाई उनके मनीसाना वेतन के साथ जस्टिस मजीठिया वेतन के बकाये को भी पचाया जा सके. मगर हालत यह है कि पिछले १६ जुलाई से लगातार हमारे वर्कर शांतिपूर्ण धरना चला रहे हैं. उनकी मांगें भी न्याय संगत हैं. प्रेस रिलीज


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Comments (2)Add Comment
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written by Rahi, September 23, 2013
Dear Rajiv Azad ji, you are 100% right. The employers; who were in court, are teling lie that they are not in a position to afford the Majithia wage bord. While our hon.court can see their whole NAVRATRA & DIWALI Issues, where many-2 advts. are lying in all pages! Court can demand their AUDIT REPORTS of Income. Only around 5 percent wageboard emplyee are left in all media. Apart this, 95% are Contractual Staff and they are getting 5 to 15 thousand per year salary hike by the grace of Employers!! How it can be possible? Why Court is sitting in our Notification? While Rajeev Gandhi is our Mentor. In his reign, he has changed the life of Media Employee & now this Congress do not want to impliment the Dream of Rajeev Gandhi, while Sonia (wife) is the head of Congress this time. It should be implimented as soon as possible upto March '11. This is very sad and regretful for Congress. Why they r doing late, in which or whom pressur, we don't know. We the wageboard employee sufferring much trouble. Say "SATYA-MAYVA-JAYATE".
Also Salute to Bhadas4Media & its Editor for giving space/coverage of Majithia Wageboard's News. Rahi.
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written by rajeev azad, August 11, 2011
ye malik log sale marenge to sab kuchh sath le ke upar jayenge...

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