ये संपादक पैसाखोर नहीं, जबर्दस्त भोजनखोर है

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दिल्ली में एक हिंदी मंथली मैग्जीन के संपादक जी इन दिनों अपने भोजनखोरी के लिए खासे चर्चा में हैं. हालांकि वे कहते रहते हैं कि उन पर नमक का कोई असर नहीं पड़ता यानि वे जिसका खाना खाते हैं उसके प्रति भी वे उतना ही तटस्थ रहते हैं जितना दूसरों के प्रति. लेकिन उनकी बात से उनके सहकर्मी इत्तफाक नहीं रखते. आखिर कई कई घंटे जब आप किसी के साथ बैठकर खाना खाएंगे, उसकी बात सुनेंगे तो जाहिर है कहीं न कहीं अवचेतन में आप प्रभावित होना तो शुरू ही हो जाएंगे.

जो हो, पर संपादक जी का भोजन प्रेम कम होने का नाम नहीं ले रहा है. उन्हें इन दिनों कुछ महीने पहले ज्वाइन करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार जमकर भोजन करा रहे हैं. इन नए ज्वाइन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार महोदय भोजनखोर संपादक को खुश करने और उनकी भोजन कुंठा को पूरा करने के लिए अपने घर का अच्छा खासा वक्त और पैसा जाया कर रहे हैं. वे खुद भी घंटों भोजन पर मेहनत करते हैं. विविधता का पूरा ध्यान रखते हैं. तरह तरह के आइटमों को घिस कूट पीस कर तैयार करते हैं. भांति भांति साइजों के डिब्बों में नाना प्रकार के शाही व्यंजन भर-ठूंस कर ले जाते हैं.

और, संपादक महोदय दिल्ली में चाहें जहां हों, लंच टाइम में अपने आफिस जरूर पहुंच जाते हैं क्योंकि लंच टाइम आते आते तरह तरह के व्यंजनों की कल्पना करके उनके मुंह में कई तरह के रसों का स्राव होने लगता है. इन भोजनखोर संपादक के भोजनखोरी की कहानी काफी पुरानी है. नए ज्वाइन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार से पहले संपादक को भारी मात्रा में भोजन कराने का ठेका एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने ले रखा था जो इन दिनों एक नए लांच हुए न्यूज चैनल में अपनी सेवा दे रहे हैं. कहने वाले तो कहते हैं कि संपादक भले भोजन के दबाव में आकर कोई फैसला न लेने की बात करते हों लेकिन नमक चीज ऐसी है कि उदारता बरतने को बाध्य कर देती है.

और कुछ हो न हो, कम से कम संपादक के प्रति अन्य सहकर्मियों के मन में गलत भावना तो पैदा हो ही जाती है कि जो भोजन कराए, संपादक उसे नजदीक बिठाए और जो न कराए, उसे संपादक तक पहुंचने का रास्ता न सुहाए. इस मंथली मैग्जीन में काम तो न के बराबर रहता है, इसलिए कई बाहरी पत्रकार लोग पूछते रहते हैं कि संपादक करता क्या है. ऐसे में अंदरुनी लोग यह बताने से नहीं चूकते कि हमारा संपादक दो फार्मूलों पर काम करता है, वह है इटिंग एंड सिटिंग. या तो वे खाना खाते रहते हैं या फिर लोगों को बिठाकर लगाते बुझाते रहते हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by pratap, September 03, 2011
bhukho ko roti do bhai...........
bahut bada bada bhukho ko roti dooooooooooo
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written by पंकज पाठक, August 20, 2011
लेकिन जिस सज्जन ने ये जानकारी दी है..वे भी पहले उसी भोजनखोर की सेवा करते थे...अब एक नई जगह पर एक पुराने संपादक जी की चाकरी कर रहे हैं...कुछ करते - धरते नहीं...हां विचारधारा जरूर पेलते हैं...धन्य हो विचारपेलू संपादक जी ...हालांकि अब तक कभी कुछ उखाड़ नहीं पाए...
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written by kumar akhilesh, August 19, 2011
भोजन का आनंद ही कुछ और होता है. कलकत्ता के एक संपादक को उसका जूनियर घर से भाभी के हाथों खीर बनवाकर लाता था, खूब खिलाता था. खाते-खाते भाभी के संबंध में रसदार चर्चा भी होती थी. आखिर में वह संपादक जाते-जाते वरिष्ठों को नजरअंदाज कर अपने चेले को संपादकीय प्रभारी बना गया.
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written by Pradeep Rawat, August 19, 2011
gajab sir kaya khoob likha hai aapne sampadak ji ko ham bhi apne ghar par khana khiayege.
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written by rajkumar, August 19, 2011
stanley ka dabba zarur dikhao inhen

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