अन्ना हजारे को अरिंदम चौधरी ने ये क्या-क्या कह डाला!

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अरिंदम चौधरी को तो जानते ही होंगे आप लोग. आईआईपीएम के फर्जीवाड़े का जनक और इसके जरिए पैदा हुआ शिक्षा माफिया. प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया जैसी कंपनियों का सर्वेसर्वा. ये महोदय कई भाषाओं में मैग्जीन भी निकालते हैं. मीडिया का अच्छा खासा कारोबार शुरू किया हुआ है. और, ये महोदय दूसरे मीडिया हाउसों को जमकर विज्ञापन भी देते हैं ताकि इनके व्यक्तित्व की चकाचौंध बनी रहे और युवा छात्र-छात्राएं लाखों-करोड़ों रुपये लुटाकर उनके आईआईपीएम में पढ़ने जाएं.

आईआईपीएम के फर्जीवाड़े और इनके मीडिया कारोबार के असली हकीकत को हम बाद में बताएंगे. पहले बता रहे हैं कि यह शिक्षा माफिया किस तरह अन्ना हजारो को बदनाम करने पर तुला हुआ है. अपने एक लेख में अरिंदम चौधरी ने अन्ना हजारे को जिद्दी, गैरजिम्मेदार, घमंडी, असंवेदनशील और अदूरदर्शी जैसी उपाधियों से नवाजा है. अरिंदम चौधरी अपने लेख में किंतु परंतु लेकिन करते-करते आखिर में अन्ना को बुरा आदमी साबित करते हुए दिख जाते हैं. आखिर यह शिक्षा माफिया क्यों ऐसा कर रहा है? जानकारों का कहना है कि अरिंदम का अन्ना विरोध सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.

बहुत पहले की बात है जब एक बार अरिंदम ने अन्ना के गुणगान करते हुए उन्हें लाखों रुपये के एक पुरस्कार से नवाजने की घोषणा की थी लेकिन जब अन्ना को अरिंदम की सच्चाई समझ में आई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से मना कर दिया. अन्ना को उनके साथियों ने बताया कि अरिंदम का कामधंधा ट्रांसपैरेंट नहीं है और इन पर कई तरह की गड़बड़ियों के जरिए छात्र-छात्राओं और सरकार को छलने का आरोप है. अन्ना को यह भी बताया गया है कि अरिंदम चौधरी शिक्षा माफिया है. तब अन्ना ने पुरस्कार लेना स्वीकार नहीं किया. इससे अरिंदम चौधरी के मन में अन्ना के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया.

दूसरे, केंद्र की सरकार के पास अरिंदम और आईआईपीएम की गड़बड़ियों की लंबी चौड़ी फाइल पड़ी है. इनके खिलाफ कई आदेश भी जारी हुए हैं. पर जिस तरह इस दौर में सारे सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचारी मजे ले रहे हैं, उसी तरह अरिंदम भी सरकार के लोगों को पटाकर अपना धंधापानी करने में सफल हो पा रहा है और अपनी मीडिया कंपनी के जरिए अपने को बौद्धिक दिखाने का स्वांग रच पा रहा है. इसी कारण कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ा होना और अन्ना को बुरा कहकर सरकार का बचाव करना उसकी फितरत में शामिल हो गया है. अरिंदम के लेख के कुछ पैरे को नीचे दिया जा रहा है, जिसे आप पढ़ें...

''सारे देश में युवा और बुजुर्ग सरकार के अभिमानी और अडिय़ल रुख की निंदा कर रहे हैं. वे अकसर सरकार पर यह इल्जाम सही ही लगाते रहे हैं कि वह उनकी बात सुनने तक को तैयार नहीं. इसमें कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ वरिष्ठ नेताओं के कुछ बेहद गैर-जिम्मेदाराना और बेवजह के बयानों ने लोगों की इस सोच को बल दिया है और भ्रष्टाचार के कारण सरकार से पहले से ही बहुत खिन्न जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया है. फिर भी अगर सरकार जिद्दी और अभिमानी होने की दोषी है तो क्या अन्ना हजारे भी वैसा ही रवैया नहीं दिखा रहे? अन्ना हजारे और उनके समर्थक सरकार पर असहिष्णु और असंवेदनशील होने का आरोप लगा रहे हैं क्योंकि वह अन्ना के बनाए लोकपाल बिल के प्रारूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. लेकिन अन्ना के लोकपाल बिल पर आशंका जताने वाले हर व्यक्ति को सरकार का पिट्ठू और देशद्रोही बताकर क्या वे अपनी असहिष्णुता और असंवेदनशीलता नहीं दिखा रहे? आखिर अन्ना और उनकी टीम पूरे विश्वास के साथ यह दावा कैसे कर सकती है कि लोकपाल बिल का केवल उनका ही प्रारूप सही है और कोई उसकी आलोचना नहीं कर सकता? अगर सरकार खुद को सही साबित करने के लिए लोकप्रिय जनादेश और संसद के सर्वोच्च आधिकारों की आड़ ले रही है तो क्या अन्ना की टीम दिखावटी नैतिकता की आड़ में छुपने की कोशिश की दोषी नहीं है?''

''अगर साफ-साफ कहूं तो, पिछले कुछ महीनों से, सरकार और अन्ना की टीम दोनों ही असहिष्णु, अडिय़ल और असंवेदनशील होने की दोषी हैं.  देश के लाखों भारतीय कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर अन्ना को कोसने और उनकी टीम को भ्रष्टाचार में शामिल बताने की वजह से खासे नाराज हैं, और यह जायज भी है. लेकिन अन्ना की टीम भी अप्रैल से ही प्रधानमंत्री, भारत की संसद, भारतीय चुनाव और यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र को सार्वजनिक तौर पर कोसने के अलावा और क्या कर रही थी?  और हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि सरकार में कई ऐसे लोग भी हैं, जो इसी चीज के हकदार हैं, लेकिन आखिरकार हर चीज का एक लोकतांत्रिक तरीका तो होना ही चाहिए. एक समूह की तानाशाही को सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकार किया जा सकता, क्योंकि वह लोगों के उन्माद को हवा देने में कामयाब हो रहा है. आखिर एक संविधान है, अदालत है और एक निर्वाचित संसद है, जिसके नियमानुसार ही सबकुछ होना होता है.''

''जब अन्ना तिहाड़ में थे और वहीं रहने की जिद पर अड़े थे तो बहुत सारे भारतीय इसे उनके संघर्ष के अदम्य साहस के तौर पर देख रहे थे. लेकिन छोडिए भी. सरकार ने उनके अनशन को रोकने के लिए मूर्खतापूर्ण शर्तें लगाकर और उन्हें गिरफ्तार कर एक बड़ी भूल की. लेकिन भारी जनविरोध ने सरकार को झुकने और समर्पण के लिए विवश किया. बाद में खुद सरकार ने कहा कि अन्ना की टीम और उनके समर्थक अनशन कर सकते हैं. उसने अनशन पर थोपी सभी मूर्खतापूर्ण शर्तों को वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा भी की. तो क्या अन्ना हजारे इस शानदार जीत के बाद कुछ उदार हुए? नहीं, अब वह इस बात पर अड़े हैं कि उन्हें वह सब कुछ हासिल करने दिया जाए, जो वह चाहते हैं. सरकार पूरी तरह से नतमस्तक होकर उनकी सभी मांगें मानती रहे. इस बीच भावनाओं से भरे उनके लाखों समर्थक खुद को जोखिम में डालकर देशभर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. क्या इसे जिद्दी, घमंडी और असंवेदनशील होना नहीं माना जाएगा?''

''अन्ना जरूर विरोध करें, लेकिन वह इसको थोपने की जिद पर अड़े नहीं रह सकते. विरोध प्रदर्शनों का अपना प्रभाव होता है और इससे बदलाव भी होते हैं. लेकिन यह हमारे संविधान और लोकतांत्रिक मशीनरी के समर्थन के बिना संभव नहीं हो सकता. भावनात्मक उन्माद से भरी भीड़ अगर उत्पात मचाने पर आमादा हो तो हिंसा और त्रासदी की स्थिति के बीच एक बारीक फर्क ही रह जाता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब क्रोध से भरी लोगों की उग्र भीड़ आवेश और उत्तेजना में थी तो 1984 में दिल्ली में और 2002 में गुजरात में क्या हुआ था. जैसा कि मैने शुरू में ही कहा था कि मैं तब बहुत छोटा था, इसलिए 1970 के दशक की शुरुआत के उन घटनाक्रमों को ठीक से याद नहीं कर सकता जिनकी वजह से आपातकाल लगा था. लेकिन मैं यह अवश्य जानता हूं कि लोकनायक जय प्रकाश नारायण आज भी एक पूजनीय गांधीवादी नेता हैं, जो एक स्वच्छ और बेहतर भारत के लिए जीवनपर्यंत लड़ते रहे. अन्ना हजारे को भी दूसरा जेपी बताया जा रहा है. लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि बहुत से निष्पक्ष इतिहासकार, जो व्यक्तिगत तौर पर तो जेपी के घोर प्रशंसक हैं, अब खुलेआम कहते और लिखते हैं कि जेपी का अडिय़ल रवैया और प्रदर्शनों के जरिए भारत को पंगु बना देने का उनका आह्वान गैर-जिम्मेदराना और अदूरदर्शी था. क्या इतिहास अन्ना हजारे को भी ऐसे ही देखेगा?''

तो ये थे अरिंदम चौधरी के आलेख के कुछ अंश. इसे पढ़ने के बाद आपको साफ समझ में आ गया होगा कि यह शख्स किस तरह शब्दों की जलेबी छानकर सरकार के पक्ष में और अन्ना व उनकी टीम के विरोध में खड़ा हो गया है. जरूरत है अब अरिंदम चौधरी के आईआईपीएम, प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया की सच्चाई का खुलासा करने की. भड़ास4मीडिया पर जल्द ही अरिंदम चौधरी की असलियत को सीरिज में प्रकाशित किया जाएगा ताकि लोग जान सकें कि अन्ना का विरोध करने वाला यह शख्स और इसकी कंपनियां खुद कितनी इमानदार हैं. अगर आपके पास भी अरिंदम चौधरी और इसकी कंपनियों के बारे में जानकारियां हों तो भड़ास4मीडिया को This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए मुहैया कराएं ताकि उसे प्रकाशित कराया जा सके.

यशवंत

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Comments (12)Add Comment
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written by manish gupta , August 29, 2011
यशवंत जी अरिंदम के आई.आई.पी.एम. के बारे में एक खास खबर ये भी है कि इसके इस्टीट्यूट की डिग्री यूजीसी से ग्रांटेड नहीं है जो छात्र इसके संसस्थान में पढ रहे हैं वो एमबीए की डिग्री लेकर किसी प्राईवेट संस्थआ में तो नौकरी पा सकते हैं लेकिन किसी सरकारी संस्था में नौकरी कभी भी नहीं पा सकते हैं , साथ ही साथ छतरपुर के जिस इलाके में इसने अपना इंस्टीट्यूट खोला है वो इमारत भी बिल्डिंग बायलॉज के खिलाफ है । आप चाहें तो उसके कागज़ भी निकलवा सकते हैं । यहां पर इस्टीट्यूट खोलने के लिए इसने एम.सी.डी. के बिल्डिंग विभाग में उच्चाधिकारियों को रिश्वत के रूप में मोटी रकम दी है ।
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written by Mohan Gautam, August 27, 2011
Kya bhai lagta hai Arindam ji ko dar lag raha hai ki "JANLOKPAL" aane se wo bhi lapete me aa sakte hain.......
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written by Anirudh Mahato, August 26, 2011
Loktantra me sabko apne vichar rakhne ka Adhikar hai. kisi ke bhi liya galat sabd ka upyog kar na galat bat hai.
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written by Nalini Sharma, Rajnandgaon, August 26, 2011
Yashwant ji, Apne sahi mudda uthaya hai. IIPM ko lekar kai bhrantiyan hain. Lekin yah bhi sahi hai unke vichar bhi krantikari hain. Chhattisgarh sarkar ne unhe 'Rajkiya Atithi' banaya tha. Akhir unke vicharon me kuch to dam hoga ?

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written by media , August 25, 2011
arindam chaudhary ko sarkar ka gu khana acchha lagta hai kyunki ye neta kaju-badam jo khate hain isliye ve unhin ki tarafdaari karega
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written by कमल शर्मा, August 25, 2011
अरिंदम चौधरी को अपनी बकवास करने दो। देश और सरकार इससे सहमत नहीं है।
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written by Pankaj Mohan, August 25, 2011
ए. दुबे
इस लोकतंत्र में सभी को अपने विचार रखने की आज़ादी है. किसी के विचार पर असहमति दर्शाना अलग बात है लेकिन उसके लिए गाली जैसे शब्दों का उपयोग गन्दी सोच का परिचायक है जैसा कुछ महानुभावों ने अपने विचारों में दिखाया है. आईआईपीएम को लेकर मै कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन कभी इस संस्थान में होकर आइयेगा. कहीं पर आईआईएम भी फ़ैल होता दिखेगा. अरिंदम ने कुछ अच्छी शुरुआत भी की. जैसे 14 भाषाओँ में पत्रिका निकालना , नोबेल पुरस्कार की तर्ज़ पर 07 करोड़ का पुरस्कार प्रारंभ करना . क्या किसी भारतीय, मीडिया मालिक, उद्योग घरानों ने ऐसी पहल की है..?
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written by Editor EJ , August 25, 2011
सर, आपकी वेबसाइट से अन्ना हजारे को अरिंदम चौधरी ने ये क्या-क्या कह डाला! खबर को एजुकेशन जंगल में साभार के साथ लगाया गया है। आशा है की इसे लेकर आपको कोई आपत्ति न होगी।
visit link----
http://educationjungal.com/?p=8324
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written by veer chauhan, August 25, 2011
एक नंबर का चूतिया देश का सबसे बड़ा दलाल है ये अरिंदम चौधरी... दावे के साथ कहता हूं आज इसके घर विजीलैंस छापा मार दे तो करोड़ो की काली कमाई का पर्दाफाश हो सकता है
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written by rohit , August 25, 2011
Eh to Pakka MC hai.hai..aap log es harami ke pille ki bate hi ku samne late hoo...
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written by Anil Dubey, August 25, 2011
lagta hai aridham chaudhary ko bolne ke pehle sochne ki jarurat mahsus nahi hoti. agar wo sarkar ke raviye ko sahi batate hai to unki budhi par mujhe taras aata hai. unhe apne kahe par fami magni chaiye
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written by Dr Maharaj singh Parihar, August 25, 2011
यशवंतजी, आपने बिल्‍कुल सच लिखा है। एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने के कारण किसी भी विषय पर हमारी असहमति हो सकती है लेकिन किसी को बुरा भरा कहना तथा अपने कुतर्कों से उसे साबित करने का असफल प्रयास करना निर्धन बौद्धिकता का प्रतीक है। हकीकत में इस देश में बहुत से गुरु बन गये हैं परंतु जब उनकी सच्‍चाई सामने आती है तो अधिकांश गुरु घंटाल निकलते हैं

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