हिंदुस्‍तान के अवैध प्रकाशन मामले में सूचना आयोग के आदेश को प्रेस रजिस्‍ट्रार ने कूड़ेदान में डाला

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मुंगेर। देश में मजबूत लोकपाल कानून क्यों जरूरी है और समाजवादी नेता अन्ना हजारे का आंदोलन देश की आजादी की दूसरी लड़ाई कैसे है, साक्ष्यों पर आधारित प्रस्तुत घटनाएं प्रमाणित करती हैं। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय। वेस्ट ब्लाक-8, विंग नं-2, आरकेपुरम, नई दिल्ली ने केस नं.- सीआईसी/ओके/ए/2008/885/एडी में केन्द्रीय सूचना आयोग की सूचना आयुक्त माननीया अन्नपूर्णा दीक्षित के 8 दिसंबर, 2008 के आदेश को विगत दो वर्ष सात माह से कूड़दान में डाल रखा है।

न्यायपालिका के आदेश को कूड़ादान में डालनेवाले विभाग के अधिकारी की ईमानदारी का अंदाजा यूं ही लगाया जा सकता है। सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित ने वर्णित मुकदमे में 8 दिसंबर, 2008 को आदेश के पैरा- 8 में प्रेस रजिस्‍ट्रार, नई दिल्ली को स्पष्ट आदेश दिया कि -'' प्रेस रजिस्‍ट्रार जांच करे कि क्या बिहार के 38 जिलों और झारखंड के 12 जिलों में भिन्न-भिन्न बदले हुए समाचारों के साथ भिन्न-भिन्न जिलों में पदस्थापित संपादकों की मदद से भिन्न-भिन्न अखबार एक ही नाम 'हिन्दुस्तान'  के शीर्षक से अवैध ढंग से प्रकाशित हो रहे हैं?''

आयुक्त ने आदेश में स्पष्ट लिखा है कि -'' आयोग सीपीआईओ प्रेस रजिस्‍ट्रार कार्यालय को इस मामले में जिला पदाधिकारियों की सहमति से तुरंत जांच कराने का आदेश देता है और जांच रिपोर्ट इस आदेश की प्राप्ति की तिथि से एक माह के अन्दर अपीलकर्ता श्रीकृष्ण प्रसाद, मुंगेर,बिहार और आयोग को उपलब्ध कराने का आदेश देता है ।''

आयोग आदेश के पैरा-8 में यह भी स्पष्ट मंतव्य देता है कि -''यह प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय की जिम्मेदारी है कि कार्यालय बिना घोषणा-पत्र के हो रहे अखबारों के प्रकाशनों की गैरकानूनी गतिविधियों पर नजर रखे ।''

पर हुआ क्या आयोग के इस महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश का? आदेश की तिथि से एक माह की बात अब कौन कहे, पूरे दो वर्ष और सात माह बीत चुके हैं प्रेस रजिस्‍ट्रार ने अबतक न तो जांच पूरी की है और न हीं जांच रिपोर्ट अपीलकर्त्ता श्रीकृष्ण प्रसादको ही भेजा है। जांच ठंडे बस्ते में पड़ी है।

इस बीच, अपीलकर्त्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित, नई दिल्ली को 22 मार्च, 2009 को स्पीड -पोस्ट से पत्र लिखकर आयोग के आदेश को ठेंगा दिखाने वाले प्रेस रजिस्‍ट्रार कार्यालय के दोषी पदाधिकारियों के विरूद्ध सूचना के अधिकर कानून के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

अपीलकर्त्ता ने सूचना आयुक्त से यह भी शिकायत की है कि सूचना आयुक्त के आदेश को गलत तरीके से मनमाने ढंग से तोड़-मरोड़ कर जांच की कार्रवाई प्रेस रजिस्ट्रार ने शुरू की है। आयोग ने कहा था कि -''जिला पदाधिकारियों के परामर्श से प्रेस रजिस्ट्रार जांच की कार्रवाई करे,  चूंकि मामला बिहार के 38 जिलों और झारखंड के 12 जिलों से हिन्दुस्तान के अवैध प्रकाशन से जुड़ा था। प्रेस रजिस्ट्रार को सभी 50 जिलों के जिला पदाधिकारियों को जांच का आदेश देना था। परन्तु प्रेस रजिस्ट्रार ने मात्र पटना, भागलपुर और मुजफफरपुर जिलों के जिला पदाधिकरियों को इस मामले में जांच करने और जांच रिपोर्ट देनेका आदेश दिया।

श्री प्रसाद ने अपने पत्र में आगे आरोप लगाया कि प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय ने मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड को बचाने के लिए 50 जिलों के जिला पदाधिकारियों को अवैध हिन्दुस्तान के प्रकाशन की जांच का आदेश नहीं दिया। श्रीप्रसाद ने आयोग से लिखित शिकायत की है कि प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय ने न्यायालय के आदेश की अवहेलना कर अपराध किया है और मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड के अवैध और गैर-कानूनी कार्यों पर पर्दा डालनेका प्रयास किया है। प्रेस रजिस्ट्रार कार्यालय ने उंचे शिखर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और केन्द्र और राज्य सरकारों को व्यापक वित्तीय नुकसान पहुंचाने का काम किया है।

काशी प्रसाद

अधिवक्‍ता व पत्रकार

मुंगेर


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