पत्रिका प्रबंधन से राधेश्‍याम धामू ने पूछे पांच सवाल

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पत्रिका, इंदौर से एक टिप्‍पणी लिखने के बाद हटाए गए वरिष्‍ठ पत्रकार राधेश्‍याम धामू ने पत्रिका प्रबंधन से पांच सवाल पूछे हैं. धामू ने पत्रिका से पूछा है कि सारा दोष उनका कैसे हो गया, किन कारणों के चलते उन्‍हें बिना नोटिस के हटा दिया गया. इसके लिए अकेले वे ही कैसे जिम्‍मेदार हुए. उन्‍होंने पत्रिका प्रबंधन से यह भी सवाल किया है कि क्‍या वो मेरे सच को छापने का साहस दिखाएगा.

उल्‍लेखनीय है कि इंदौर में संपादकीय पेज देखने वाले राधेश्‍याम धामू ने 27 अगस्‍त के अंक में प्रसंगवश कॉलम में 'सर्वाधिक भ्रष्‍टाचार' नाम से एक टिप्‍पणी लिखी थी, जिसके बाद पत्रिका प्रबंधन ने 31 अगस्‍त के अंक में प्रथम पेज पर सूचना प्रकाशित कर राधेश्‍याम की सेवाएं समाप्‍त करने की सूचना प्रकाशित की थी. इसमें अखबार ने लिखा था कि धामू ने पत्रिका की रीति नीति से परे जाकर लेखन किया. धामू ने इस खबर में अपने व्‍यक्तिगत विचार लिख दिए हैं, जो पत्रिका के स्‍वभाव से मेल नहीं खाता है. इसमें लिखे गए शब्‍द मर्यादित नहीं हैं, पत्रिका हमेशा अपनी राय निष्‍पक्ष और निर्भीक तरीके से रखती आई है, लेकिन इस तरह के भाषा के इस्‍तेमाल के पक्ष में कभी नहीं रही.


पत्रिका समूह प्रबंधन से धामू के पांच सवाल

1. क्या किसी अख़बार की सम्पादकीय टिपण्णी में किसी के निजी विचार हो सकते हैं? यदि हां, तो पत्रिका में इतने साल से मध्य प्रदेश में मेरे बेनामी निजी विचार क्यों छप रहे थे और वे क्यों अच्छे लग रहे थे? और जो विचार किसी को अच्छा नहीं लगा तो वह अचानक मेरा कैसे हो गया, पत्रिका का क्यों नहीं रहा?

2. क्या उच्च न्यायलय का फैसला मेरा निजी विचार था? यदि नहीं तो उस पर टिपण्णी लिखने पर बिना कोई नोटिस दिए मुझे क्यों हटाया? क्या यह उच्च न्यायलय और मेरी दोनों की तौहीन नहीं है?

3. क्या इस टिपण्णी के लिए मैं ही दोषी हूं? और यह कैसे तय किया? यदि हां, तो फिर पीआरबी एक्ट के तहत समाचार चयन के लिए जिम्मेदार मध्य प्रदेश के स्थानीय संपादक (इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन) क्या कर रहे थे? उन्होंने ठीक क्यों नहीं किया, जबकि आधिकारिक अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है.

4. वो कौन से पक्ष थे जिन्हें प्रसंगवश ''सर्वाधिक भ्रष्‍टाचार'' में छपे विचारों से ठेस पहुंची? और क्या वे मुझे हटाने से ही संतुष्‍ट हो गए?

5. यदि सत्ता पक्ष था तो पत्रिका झुक जाता, मुझे ही क्यों ईद के दिन बलि का बकरा बनाया? क्या पत्रिका मेरे इन सवालों का जवाब उसी जगह पर छाप कर वापस जन अदालत में जाने का साहस दिखायेगा, जहां मेरी सेवाएँ समाप्त करने की खबर छपी थी? क्योंकि मेरा अपना कोई अख़बार, जो नहीं है?

आपका ही

राधेश्याम धामू


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