पेजमेकर्स का टोटा : अजमेर में पत्रिका की हालत पतली

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राजस्थान पत्रिका का अजमेर कार्यालय पेजमेकर्स की कमी का शिकार हो चला है। रोजाना यहां 25-30 पृष्ठ तैयार या अल्टर किए जाते हैं और पेजमेकर सिर्फ दो हैं। हाल ही में तीन पेजमेकर इस्तीफा देकर जा चुके हैं। नए पेज मेकरों की तलाश हो रही है परंतु इनका मिलना आसान नहीं है। संपादकीय विभाग से जुडे़ साथी इन हालात के लिए पत्रिका प्रबंधन को जिम्मेदार मान रहे हैं।

राजस्थान में सबसे पहले भास्कर ने पत्रकारों को ऑनलाइन काम करना सिखाया था। बाद में पत्रिका, नवज्योति और अब लगभग हर छोटे-बडे़ अखबार में पत्रकार खुद अपनी खबरें कंप्यूटर पर टाइप करते हैं। अखबारों ने यह नीति भी बनाई कि पेज मेकिंग का काम भी पत्रकार खुद करेंगे ताकि कंप्यूटर ऑपरेटरों को पूरी तरह हटा दिया जाए। ज्यादातर पत्रकारों ने टाइपिंग तो सीख ली परंतु पेज मेकिंग नहीं सीखी। कंप्यूटर ऑपरेटरों में लगभग सभी ने, जिन्हें सिर्फ टाइपिंग के लिए रखा गया था, पेज बनाना भी सीख लिया। जब कुछ अखबारों ने ऑपरेटर्स को पेज बनाने की शर्त के साथ उप संपादक बनाने का प्रस्ताव दिया तो कई ने इसे स्वीकार कर लिया। अजमेर में हेमंत पारीक, बसंत भट्ट, मनीष थापा आदि अब बतौर उप संपादक काम कर रहे हैं। भास्कर से पत्रिका आए योगेंद्र मित्तल ने भी ऐसी शुरुआत की परंतु उनके जिम्मे पेज मेकिंग ज्यादा रही।

पत्रिका ने जब संपादकीय साथियों के लिए पेज मेकिंग अनिवार्य करने का फरमान निकाला तो उसका वही हश्र हुआ जो अन्य अखबारों में हो रहा है। संपादकीय साथी तो पेज मेकिंग सीख नहीं रहे परंतु भविष्य में नौकरी जाने की आशंका के चलते पेज मेकर्स ने अखबारों की नौकरी छोड़ना शुरू कर दिया। पत्रिका से पिछले दिनों ही नीरज मित्तल अपने भाई योगेंद्र मित्तल और हर्ष वर्द्धन के साथ इस्तीफा दे दिया। भास्कर से पत्रिका आए नीरज मित्तल ने अब अपना निजी काम शुरू कर दिया है। भास्कर से आए योगेंद्र मित्तल फिर भास्कर लौट गए और अपने साथ हर्ष वर्द्धन को भी ले गए। अजमेर पत्रिका अब देवेंद्र और राकेश सोनी के जिम्मे है।

ऑपरेटर्स का कहना है कि पत्रकारों पर पेज मेकिंग का दबाव बढ़ने से नौकरी जाने का खतरा तो था ही परंतु जब तक नौकरी है, तब तक प्रबंधन वेतन बढ़ाने की ओर भी ध्यान नहीं दे रहा था। आठ-दस हजार रुपए महीने में कब तक काम चलाएं। काम का बोझ है और प्रबंधन नई भर्ती भी नहीं करना चाहता है। साप्ताहिक अवकाश के भी लाले पड़े थे।

अजमेर से राजेंद्र हाड़ा की रिपोर्ट.


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Comments (4)Add Comment
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written by nk jain , November 28, 2011
bilaspur me to nam hi duba diya hai chutoyao ne ...
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written by journalist, September 05, 2011
koi jabalpur ka haal bhi dekho bhai.....
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written by Abbas, September 05, 2011
पत्रिका के साथ यही होने चाहिए, पत्रिका प्रबन्धन अपने सभी कर्मचारियों को सताता है इसलिए कई पत्रिका छोड़कर चले गये है और कई जाने की तेयारी में है. पत्रकारों से गधे की तरह काम करवाया जाता है जबकि उनके पेसे लम्बे समय से नहीं बढ़ाये गए है, उन्हें छपी हुई खबर के सेंटीमीटर के हिसाब से पैसा दिया जाता है, वो भी मुश्किल से 5 -6 हजार ही बन पाते है, जबकि पत्रकारों को कोई सुविधा नहीं दी जाती, इन्टरनेट, मोडेम, पेट्रोल, बिजली, कंप्यूटर, केमरा सहित सभी आवश्यक चीजो का खर्चा पत्रकारों को खुद उठाना पड़ रहा है, यही नहीं जो पत्रकार विज्ञापन का काम भी देखते है, उनकी हालत तो और भी ख़राब है, ज्यादा से ज्यादा एड लेन के लिए प्रेशर डाला जाता है, और हर 10 दिन में वसूली की जाती है, जब कमीशन देने का समय आता है तो 3 माह से कमीशन दिया जाता है, उसे भी एड के एवज में जमा कर लिया जाता है, पत्रकार कई बार प्रबंधन को बता चुके है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती
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written by sushil, September 05, 2011
salery theek denge nahi to yahi haal hoga...na to unko koi alag se suvidha. 3-4 hazar main kya 8 10 page banwaoge...to yahi haal hoga.

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