हिंदुस्तान के खिलाफ मुकदमा : जज ने कहा- अखबार की मर्जी पर नहीं चलता है न्यायालय

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भागलपुर : ''न्यायालय अखबार की इच्छा से नहीं चलता है। मुकदमे में स्थानीय स्तर पर अधिवक्ता की सेवा ले प्रबंधन। इस मुकदमे में यूं ही काफी समय बीत चुका है। मैं लंबी तिथि नहीं दे सकता हूं।'' इस मौखिक टिप्पणी के साथ श्रम न्यायालय के पीठासीन पदाधिकारी न्यायाधीश अशोक कुमार पांडेय ने 02 सितम्बर 2011 को एचटी मीडिया लिमिटेड के प्रतिनिधि की मुकदमे में लंबी तिथि देने की प्रार्थना को खारिज कर दिया।

मुकदमे में आगे की सुनवाई के लिए अगली तारीख 26 सितंबर तय कर दी। यह मुकदमा रेफरेन्स केस नं0-05 (2008) से जुड़ा है। यह मुकदमा बिहार सरकार ने मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड के विरूद्ध सुनवाई के लिए श्रम न्यायालय भागलपुर भेज दिया। इस मुकदमे में कामगार मुंगेर के श्रीकृष्ण प्रसाद हैं। कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद ने 02 सितम्बर, 2011 को न्यायाधीश के समक्ष गवाहों की गवाही शुरू करने की इजाजत देने की प्रार्थना की। न्यायाधीश ने इजाजत दे दी और गवाही की अगली तारीख 26 सितम्बर, 2011 तय कर दी है।

श्रम न्यायालय में कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद, जो मुंगेर के रहनेवाले हैं, ने लिखित वक्तव्य सुपुर्द कर दिया है। कामगार ने न्यायालय को बताया है कि मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड, जिसका प्रधान कार्यालय नई दिल्ली है, के दैनिक हिन्दुस्तान (पटना) के स्थानीय संपादक ने वर्ष 1986 में 9 जुलाई को कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद को स्ट्रिंगर के रूप में मुंगेर मुख्यालय में लिखित रूप में नियुक्त किया। नियुक्ति पत्र में स्थानीय संपादक ने कामगार को पत्र प्राप्ति की तिथि के दिन से नित्य नियम से खबरों का पैकेट संपादक, हिन्दुस्तान, बुद्ध मार्ग, पटना के पते पर भेजना शुरू करने का निर्देश दिया।

हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान में काम-काज से संतुष्ट होकर प्रबंधन ने कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद को कंपनी के अंग्रेजी अखबार ‘द हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के लिए भी मुंगेर से वर्ष 1991 में 5 जून से काम करने का आदेश दिया। जब कामगार हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान और अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए मुंगेर से समाचार भेजने लगे, तो कामगार ने प्रबंधन को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि उन्हें अंशकालिक संवाददाता के रूप में नियुक्ति पत्र जारी किया जाए। द हिन्दुस्तान टाइम्स के समाचार संपादक पीएन पांडेय ने कामगार को वर्ष 1991 में 17 जून को नियुक्ति पत्र भेज दिया और लिखा कि ‘‘हमलोग खुश हैं आपको सूचित करते हुए कि आप अंशकालिक संवाददाता के रूप में नियुक्त कर लिए गए हैं।''

तत्पश्चात कामगार ने जब प्रबंधन से पालेकर अवार्ड और मणिसाना वेज बोर्ड अवार्ड की सिफारिशों को लागू करने और अवार्ड की सिफारिशों के अनुरूप वेतन और अन्य सुविधाएं देने की मांग की, तो प्रबंधन ने चुप्पी साध ली। इसी बीच, प्रबंधन ने भागलपुर से दैनिक हिन्दुस्तान का नया संस्करण शुरू किया। कंपनी के उपाध्यक्ष वाईसी अग्रवाल ने कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद, कामगार की पत्नी और अन्य कर्मी स्वर्गीय सुश्री सीमा कुमारी (छायाकार) का शोषण करना शुरू कर दिया और तीनों को वार्षिक एक करोड़ रुपया के विज्ञापन संग्रह की जिम्मेदारी सौंप दी। कामगार यह जानते हुए कि संवाददाता का काम विज्ञापन संग्रह नहीं है, फिर भी नौकरी जाने के भय से 27 हजार रुपये का सरकारी विज्ञापन संग्रह कर प्रकाशन के लिए भागलपुर कार्यालय भेज दिया।

परन्तु, कंपनी के उपाध्यक्ष वाईसी अग्रवाल ने भागलपुर के हिन्दुस्तान अखबार के संपादक महेश खरे और प्रभारी यूनिट प्रबंधक बिमल सिन्हा को 27 हजार रुपये का विज्ञापन छापने से मना कर दिया यह कहकर कि कामगार ने विज्ञापन का लक्ष्य नहीं पूरा किया। न्यायालय में कामगार ने यह भी खुलासा किया कि मुंगेर कार्यालय में कार्यरत महिला छायाकार सुश्री सीमा कुमारी ने नौकरी से हटाए जाने के बाद अपने घर में गले में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। सुश्री सीमा कुमारी को हिन्दुस्तान से हटाने का आदेश उपाध्यक्ष वाईसी अग्रवाल के आदेश पर स्थानीय संपादक महेश खरे ने दिया था।

न्यायालय में कामगार श्रीकृष्ण प्रसाद ने अपने सेवाकाल के दौरान प्रबंधन और कामगार के बीच समाचार प्रेषण से संबंधित भेजे गए सभी कागजातों, चिठ्ठियों और नाम से प्रकाशित खबरों की प्रतियों को साक्ष्य के रूप में पेश किया। कामगार ने श्रम न्यायालय से प्रार्थना की है कि न्यायालय प्रबंधन के द्वारा काम से हटाने की कार्रवाई को अवैध करार दे और समुचित हर्जाना के साथ उन्हें पुनःसेवा बहाल करने का आदेश पारित करे। प्रबंधन ने न्यायालय में रिटन स्टेटमेंट में सरकार की अधिसूचना को गलत करार दिया है और कहा है कि प्रबंधन ने कामगार को किसी भी बिन्दु पर कंपनी में नहीं रखा है। अब श्रम न्यायालय को निर्णय देना है कि क्या दैनिक हिन्दुस्तान एवं दी हिन्दुस्तान टाइम्स द्वारा श्रीकृष्ण प्रसाद कामगार की सेवा समाप्ति न्यायोचित है? अगर नहीं, तो वे किस सहायता के हकदार हैं?


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