हर पत्रकार को पढ़ना चाहिए वीरेंद्र जैन का लिखा यह पत्र

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: नभाटा के संपादकीय स्टाफ को भेजा था : (आखिरी भाग) :  हिंदी की यह खूबी मानी जाती है कि यह जिस तरह बोली जाती है उसी तरह लिखी जाती है। इसमें मौन (साइलेंट) वर्णों के लिए कोई स्थान नहीं होता। होनेस्ट लिखा होगा तो होनेस्ट ही बोला जाएगा, ओनेस्ट नहीं। शब्द अस्तित्व में है तो वह ध्वनित भी होगा अन्यथा उसका लोप हो जाएगा। वीइकल में इ का पृथक उच्चारण असंभव तो है ही, व्याकरण का नियम इसके लोप हो जाने की वकालत करता है।

जैसे छात्रावास होता है छात्रों का आवास, यदि वह छात्राओं का भी है तो भी छात्रावास ही रहेगा न कि छात्राआवास। जिला अधिकारी और जिला अध्यक्ष को जब अलग-अलग दो शब्दों के रूप में लिखा जाता है तब इसी तरह लिखना होता है और जब इन दो शब्दों को एक कर दिया जाता है तब दोनों में दूसरे शब्द में से अ का लोप करते हुए जिलाधिकारी और जिलाध्यक्ष लिखा जाता है न कि जिलाअध्यक्ष और जिलाअधिकारी।

हिंदी व्याकरण का एक और नियम है - जिस वर्ग के अंतिम वर्ण के अर्धरूप के आगे उसी वर्ग का कोई पूर्ण वर्ण प्रयुक्त हुआ हो तो अर्धवर्ण के स्थान पर अर्धवर्ण से पहले प्रयुक्त हुए अक्षर पर अनुस्वार यानी बिंदु का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसा करने की बाध्यता नहीं है, यह प्रयोग करनेवाले की अपनी वर्णनीति पर निर्भर करता है। यदि वह अर्धवर्ण की जगह अनुस्वार के प्रयोग का पक्षधर है तो करे अन्यथा अर्धवर्ण ही लिखे। मसलन संबंध शब्द को सम्बन्ध भी लिखा जा सकता है, दोनों ही सही हैं। जो कोई अर्धवर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करना चाहे वह व्याकरण के नियम के तहत प वर्ग के अंतिम अक्षर म् के  स्थान पर स वर्ण पर बिंदु लगाकर उसे सं इसलिए कर सकता है चूंकि यहां प वर्ग के म् के बाद उसी वर्ग का ब शब्द प्रयुक्त हुआ है।

इसी तरह आगे चलकर त वर्ग के न् के स्थान पर उससे पहले वाले अक्षर पर अनुस्वार लगाकर बं लिख सकता है चूंकि न् के बाद त वर्ग का ही ध वर्ण प्रयुक्त हुआ है। यदि अर्ध वर्ण से आगे का वर्ण उसी वर्ग का नहीं है तो यह नहीं किया जा सकता। उस दशा में अर्धवर्ण ही लिखना होगा। मसलन अन्याय अन्याय ही रहेगा उसे अंयाय नहीं किया जा सकता, चूंकि यहां न् के बाद त वर्ग का कोई वर्ण नहीं है जबकि अनन्तर को अनंतर किया जा सकता है चूंकि यहां न् के बाद फिर त वर्ग का अक्षर त है।

नभाटा में छपा रॉन्ग शब्द हर दृष्टि से असंगत है। अंग्रेजी के इस शब्द में हिंदी के जिन तीन वर्ण की ध्वनि समाहित है वे हैं र ङ् और ग। चूंकि इस अक्षर में क वर्ग के अर्धवर्ण ङ् के बाद उसी वर्ग के ग अक्षर का प्रयोग है इसलिए ङ् के स्थान उससे पहले के रॉ शब्द में अनुस्वार राँ का प्रयोग करते हुए इसे राँग तो लिखा जा सकता है अन्यथा यहां रॉङ्ग ही लिखना होगा न कि रॉन्ग। ङ् का स्थानापन्न न् तो अज्ञान और भ्रष्ट भाषा प्रयोग के अतिरिक्त और किसी भी कारण से नहीं हो सकता। यहां अंग्रेजी शब्द की पहचान के लिए रा पर जो अर्धचंद्र ॅ का प्रयोग किया गया है उसका लोप भी किया जा सकता है और उसी में ँ अनुस्वार को विराजमान करते हुए उसका लोप न करने की स्वतंत्रता भी ली जा सकती है जैसी चाँद को चांद लिखने के दौरान लेने लगे हैं।

स्कूलों में जाने पर अध्यापक उलाहना देते हैं कि आप अपने अखबार में शब्दों के, वाक्यों के नियामक और मानक रूप के स्थान पर जो अशुद्ध प्रयोग करते हैं उससे हमारे शिक्षार्थियों का अक्षर ज्ञान गड़बड़ाने लगा है। जब हम वही प्रयोग उनके द्वारा किए जाने पर उसे अशुद्ध ठहराते हैं तो वे यह तर्क रखते हैं कि नवभारत टाइम्स में तो यही छपता है। अब आप ही बताइए कि ऐसे में हम शिक्षार्थियों को क्या कहें? क्या यह कि नभाटा भ्रष्ट प्रयोग करता है? या यह कि नभाटा वैसा प्रयोग इसलिए करता है चूंकि उस शब्द का वही प्रयोग आम चलन में है? यदि हम पहला उत्तर देते हैं तो उनकी नजर में नभाटा की छवि धूमिल होती है और यदि दूसरा उत्तर देते हैं तो वे प्रतिप्रश्न करते हैं कि हमें भी आम चलन वाला ही रूप क्यों नहीं सिखाया जाता? उनकी सामूहिक शिकायत एक ही होती है कि वे अपने शिक्षार्थियों को भाषा का जो सही प्रयोग सिखाना चाहते हैं, नभाटा की भाषा आए दिन उसे झुठलाने चली आती है। उनके शिक्षार्थियों के मन में अपने शिक्षकों की समझ के प्रति संदेह उत्पन्न कर देती है।

अब मैं नभाटा में छपे कतिपय उन शब्दों या वाक्य प्रयोगों का उल्लेख करने जा रहा हूं जिनसे मुझे स्कूली वर्कशॉप में दो-चार होना पड़ा और जो मुझे याद रहे। उस दिन तो गजब ही हो गया। एनसीआर के एक स्कूल में वहां की हिंदी अध्यापिका ने मेरे सामने नभाटा की प्रति लहराते हुए पूछा कि 'पाठकों को जन्माष्टमी के पर्व की बधाई' का क्या अर्थ हुआ? ऐसा आपके अखबार के मुख पृष्ठ पर छपा है।

जन्माष्टमी तो अपने आप में ही कृष्ण जन्मपर्व की अष्टमी, जो वर्ष में एक ही बार भाद्रपद मास में आती है, उसकी प्रतीक है, फिर 'के पर्व' का यहां क्या औचित्य है? जैसे राम के जन्म की नवमी रामनवमी उसी तरह कृष्ण के जन्म की अष्टमी जन्माष्टमी कही जाती है। इसे रामनवमी की तरह कृष्णाष्टमी इसलिए नहीं कहा जा सकता चूंकि कृष्णाष्टमी तो हर महीने के कृष्ण पक्ष में एक दिन आती ही आती है। यहां केवल पाठकों को जन्माष्टमी की बधाई लिखने से काम चल सकता था। यह दशहरे या गणेशोत्सव जैसा पर्व तो है नहीं जो अपनी शुरुआत के बाद कई दिनों तक चलता है। उस स्थिति में तो एक बार को यह कहा भी जा सकता है ताकि दशहरे की पणमा से दसवीं तक या गणेश चतुर्थी से गणेश विसर्जन की अनंत चतुर्दशी तक की शुभकामनाएं ध्वनित हों।

अध्यापक जानना चाहते है कि नभाटा की खबरों के शीर्षक में अमूमन जो स्टूडेंट्स शब्द प्रयुक्त किया जाता है उसका आधार और औचित्य क्या है? भले ही खबर यह क्यों न हो कि 40 स्टूडेंट घायल। यहां भी स्टूडेंट नहीं स्टूडेंट्स शब्द पढने को मिलता है जबकि यहां यह स्पष्ट है कि स्टूडेंट संख्यावाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुआ है। केवल एक ही संज्ञा का प्रयोग है न कि अनेक का, फिर स्टूडेंट्स लिखने का क्या औचित्य है? यदि इसे हिंदी में लिखा जाएगा तो 40 छात्र घायल लिखेंगे न। हां, 40 छात्रों को चोटें आई होतीं तो 40 स्टूडेंट्स को चोटें आईं लिखा जाता।

यदि स्टूडेंट्स शब्द अंग्रेजी ग्रामर को ध्यान में रखकर लिखा जाता है तो फिर 42 कैंडिडेटों ने परीक्षा दी क्यों लिखते हैं? वहां भी 42 कैंडिडेट्स ने परीक्षा दी क्यों नहीं लिखा जाता? एक ही पृष्ठ पर, एक खबर में डेंट्स और डेटों का प्रयोग किस तरह उचित  ठहराया जा सकता है? इसे तो भाषा प्रयोग की दृष्टि से ही नहीं अखबार की भाषा नीति के खाते में डालकर भी सही नहीं ठहराया जा सकता।

हिंदी में लिखे वाक्यों में किसी अन्य भाषा के शब्दों के प्रयोग की कतई मनाही नहीं है। हमारी भाषा तो इतनी उदार है कि इसमें शब्दों का वर्गीकरण ही उसकी उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर तत्सम, तदभव, देशज, आगत और संकर के रूप में किया जाता है। सबका प्रयोग न केवल स्वीकार्य है, मान्य भी है, मगर वह होना चाहिए व्याकरण सम्मत।

सोमवार 6 अगस्त के नभाटा के मस्तक पर वॉरेन बफेट को उद्धृत किया गया है। एक अध्यापक ने वह उद्धरण पढ़कर जानना चाहा कि इसमें 'को' और 'उसे' शब्द का प्रयोग किसलिए किया गया है, बताइए। आपकी सुविधा के लिए मैं पूरा उद्धरण दे रहा हूं -

''ट्रिपल ए रेटिंग से हटाने को कोई मतलब नहीं है। अगर चार ए की कोई रेटिंग होती तो हम उसे अमेरिका को दे देते।' अध्यापक का कहना था कि यह वाक्य-विन्यास सरासर गलत है। इसमें जहां को शब्द प्रयुक्त हुआ है वहां 'का' शब्द होना चाहिए था और जहां उसे शब्द प्रयुक्त हुआ है वहां 'वह' शब्द प्रयुक्त होना चाहिए था। मैंने उनके द्वारा बताए गए शब्द प्रयुक्त करके जब इस वाक्य को फिर से पढ़ा तो अपने को उनसे सहमत पाया और उनसे अपने सहयोगियों की ओर से क्षमायाचना की। मुझे नहीं पता आपकी प्रतिक्रिया भी यही होगी या नहीं। यदि इतर हो तो मेरा भी ज्ञानवर्धन कीजिएगा।

एक अध्यापिका किसी दिन के नभाटा के ग्रेटर दिल्ली वाले पृष्ठ का कुछ हिस्सा फाड़कर लाईं थीं। उन्होंने उस हिस्से पर छपी खबर 'चलती कार में 9वीं की छात्रा से गैंगरेप' पढ़ने के बाद शीषर्क के माथे पर छपा उपशीर्षक 'फरीदाबाद में नाबालिग लड़कों ने की वारदात, चढ़े हत्थे' पढ़ा। फिर उसका इंट्रो पढ़ा जिसमें बताया गया था कि युवक लड़की को कार में घुमाते रहे और उसे डराते रहे। चलती कार में दो युवकों ने उसके साथ रेप किया। फिर खबर के साथ छपे हाइलाइटर पढ़े जिनमें बताया गया था कि कार सवार किशोरों ने रोका रास्ता। फिर मूल खबर पढ़ी जिसमें बताया गया था कि बुधवार की शाम युवकों ने एक स्टूडेंट को जबरन रोका। चलती कार में रेप किया और फरार हो गए। पुलिस ने आरोपियों को जुवेनाइल कोर्ट में पेश किया।

इन अध्यापिका का कहना था कि वे सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं में विद्यार्थियों को अखबार के लिए समाचार लिखना भी सिखाती हैं। इस समाचार को पढ़ने के बाद से वे इस उलझन में हैं कि वे अपने शिक्षार्थियों को अब यह कैसे बताएंगी कि लड़के, किशोर और युवक पुरुषों की तीन अलग-अलग अवस्थाओं के नाम हैं। जो किशोर होते हैं उन्हें युवक नहीं ठहराया जा सकता। यदि उन्हें युवक  ठहरा दिया जाए तो उन्हें जुबेनाइल कोर्ट में पेश नहीं किया जा सकता। आखिर खबर लिखनेवाला या उसे संपादित करने वाला आरोपियों की किसी एक अवस्था पर ही अडिग क्यों नहीं रहना चाहता? पुरुषों के लिए प्रयुक्त होने वाले सभी शब्द एक ही खबर में क्यों उजागर करने को उतावला है? इसे अस्पष्ट और भ्रामक तथ्यों पर आधारित खबर का नमूना कहा जाए या खबर्चियों की बेध्यानी का?

मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि हमारे अखबार में किसी भी खबर को छपने से पहले एक नहीं अनके जिम्मेदार लोग जांचते-परखते हैं, ऐसे में कोई चूक रह जाना असंभव होता है। इस पर उन्होंने मुझे जो अगली खबर याद दिलाई उसके बाद नभाटा की भाषा में कहूं तो कहना होगा मेरी तो बोलती ही बंद हो गई।

इन अध्यापिका का कहना है कि नभाटा ऐसी मिसालें अक्सर कायम करता रहता है। कभी हरियाणा के कई जिलों में पशुओं की 'जनगणना' करवाता है, कभी हरियाणा की युवती को 'एवरेस्ट पर साठ हजार मीटर तक की चढवाकर' भी उसी युवती (संतोष यादव) की मुंहजुबानी यह घोषणा करवाता है कि उसने अभी एवरेस्ट की अंतिम चोटी फतह नहीं की है। एक बार नहीं, खबर के शीर्षक, इंट्रो, हाइलाइटर और मूल खबर में यानी चार-चार बार साठ हजार मीटर एवरेस्ट फतह करने की घोषणा करता है फिर भी उसकी आंखें नहीं खुलतीं और उसे यह याद नहीं आता कि एवरेस्ट की तो कुल हाइट ही आठ हजार आठ सौ अढ़तालीस मीटर है, फिर भला साठ हजार मीटर तक पहुंचने के बाद भी युवती किस चोटी तक नहीं पहुंच पाई?

अध्यापिका जानती और मानती हैं कि दरअसल उक्त खबर में सात हजार को बार-बार साठ हजार लिखा गया है, फिर भी उन्हें शिकायत है कि इतनी आंखों के आगे से गुजरने के बाद भी खबर में इतनी बड़ी भूल कैसे रह गई। भूल भी ऐसी जो पाठकों को तो गुमराह करती ही है, जिसकी उपलब्धि का वर्णन करने के लिए प्रकाशित की गई, स्वयं उसे ही झूठा सिद्ध करती है। वे इसे अक्षम्य भूल की श्रेणी में रखने को बाध्य हैं, चूंकि अखबार ने अगले दिन इस भूल के लिए खेदप्रकाश भी नहीं किया।

एक वर्कशॉप के दौरान एक अध्यापक ने कहा कि इन दिनों आपका अखबार कुछ ज्यादा ही जौली मूड में आ गया है। लगता है एडिटोरियल स्टाफ के अकाउंट में हर महीने उनकी अपेक्षाओं और क्षमताओं से कहीं अधिक रकम ट्रांसफर होने लगी है। इसीलिए पूरा स्टाफ ही हर क्षण आनंद की मुद्रा में रहता है, हर खबर का आनंद उठाना चाहता है। इसी का नतीजा है कि जब दसवीं बोर्ड में अव्वल रहे शिक्षार्थियों की खबर छापता है तब शीर्षक देता है सीटी बजा के बोल।

ऐसा शीर्षक देते समय वह यह भूल जाता है कि हर सुना हुआ शब्द फिर से सुनने के दौरान अपने साथ वह दृश्यबंध भी हमारी स्मृति में ताजा कर देता है जिसमें उसे उससे पहले सुना गया हो। सीटी बजा के बोल शब्द के साथ याद आता है थ्री ईडिएट फिल्म का वह दृश्य जिसमें अधिकांश वे शिक्षार्थी नाच-गा रहे होते हैं जो परीक्षा में निचले सिरे से अव्वल रहते हैं न कि ऊपरी से, जबकि यहां खबर पूरी तरह ऊपरी सिरे पर रहे स्टूडेंट्स पर फोकस थी।

वह अध्यापक यहीं मौन नहीं हो गए बल्कि उन्होंने पूरी संजीदगी के साथ मुझसे अगला सवाल किया कि उन क्रिकेट खिलाड़ियों के नाम बताइए जिन्होंने हत्याएं की हों? मैं एक भी नाम नहीं बता सका। मुझे ले-देकर एक ही नाम याद आया नवजोत सिंह सिद्धू का जिन पर किसी हत्या में शामिल होने का आरोप लगा था लेकिन अंतत: वह भी साबित नहीं हो सका था,  सो मैं मौन ही रहा।

तब सही उत्तर भी स्वयं देते हुए वे बोले कि उन्हें के इस जौली मूड की घृणित पराकाष्ठा दिखाई दी बुधवार 3 अगस्त के ग्रेटर दिल्ली पेज पर छपी उस खबर में जिसका उप और मुख्य शीर्षक कुछ इस प्रकार का है - 'गाजियाबाद में मर्डर की सेंचुरी बनाने वाला कॉन्ट्रैक्ट किलर रनआउट'। उनका कहना है कि किसी की हत्या या मौत की खबर पर दो ही स्थितियों में कोई आनंद का अनुभव कर सकता है। पहली स्थिति तो यह कि उस अनुभव से गुजरने वाला असंवेदनशील यानी विक्षिप्त हो और दूसरी स्थिति ऐसी हो कि मरनेवालों की सूची में जिसका अपना कोई सगा न हो।

इसी जौली शीर्षक के संदर्भ में उन्होंने मुझसे यह जानना चाहा था कि मैं ऐसे कितने क्रिकेटरों को जानता हूं जो हत्यारे हों? स्वयं उनका यह दावा था कि वे आज की तारीख में भी ऐसे किसी क्रिकेटर को तो नहीं जानते मगर ऐसे पत्रकारों को अवश्य जानते हैं जो पाठकों की भावनाओं के, शब्दों के हत्यारे हैं। बहुत संभव है नभाटा का एक सहकर्मी होने के चलते उन्होंने मुझे भी उसी सूची में दर्ज कर छोड़ा हो।

हमसे यह अपेक्षा तो की जाती है कि हम अपने काम को खेलभावना से लें, काम का कितना भी दबाव क्यों न हो, हम में वह स्प्रिट बनी रहनी चाहिए, फिर भी इसका यह मतलब नहीं है कि हम सौ लोगों को अकारण ही मौत के घाट उतार देनेवाले के बारे में एक खबर तैयार करते समय भी खेल भावना का विस्मरण न करें। इस हत्यारे ने किसी फिरोजशाह कोटला, बानखेड़े या चेपक के मैदान में किसी बॉलर की गेंद पर ठोकर मारकर रनों का शतक नहीं बनाया है, जो हम उसे शतक बनाने के बाद रनआउट घोषित करें, बल्कि उसने सौ निर्दोष लोगों की जान ली है। उन्हें किसी गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज कराने के लिए मौत की नींद नहीं सुलाया है, न ही अपने किसी आत्मीय की मौत का बदला ही लिया है कि उसे भावनाओं में बह जाने का लाभ दिया जा सके, बल्कि धन कमाने के लिए वैसा किया है। हत्या करने जैसे घृणित, अमानवीय और नृशंस कर्म को ही अपना पेशा बनाया है। यह खबर पुलिस की नाकामी को उजागर करने के मकसद से भी नहीं लिखी गई है, यदि वह एंगल भी होता तो भी इस मजाकिया लहजे को झूठा ही सही, कुछ तो जस्टीफाई करने का बहाना हमारे पास रहा होता। यहां तो जिन सौ लोगों को मौत के घाट उतार दिए जाने की चर्चा है उनमें से भले ही एक भी हमारा अपना न रहा हो, मगर अधिकांश थे तो अमनपसंद लोग ही न।

किसी की शोक सभा में दो मिनट के मौन के दौरान शांत बने रहने की जगह किसी का ठहाका लगाना मृतात्मा की शांति में खलल भले ही न डालता हो, डाल भी नहीं सकता चूंकि कहते हैं नश्वर शरीर का त्याग करते ही वह तो फिर से राग-द्वेष और तमाम सांसारिक लोक व्यवहारों, अपेक्षाओं से परे चली जाती है, मगर उस ठहाके से उस सभाभवन में निर्मित हो चुका संवेदना का वातावरण तो व्याधित होता ही होता है। हमारे अखबार के पन्नों पर इस खबर का इस तरह छपना पाठक वर्ग के मानस-भवन में वही खलबली उत्पन्न कर रहा है।

इसी खबर के अंतिम पैराग्राफ को पढ़कर उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या ऐसा लिखना पत्रकारीय आचार संहिता के खिलाफ जाना नहीं है? क्या किसी भी अखबार को किसी हत्यारे के बयान को महिमामंडित करने की छूट दी जा सकती है? क्या केवल इस एक पैराग्राफ के लिए अखबार को प्रेस काउंसिल में जवाबदेही के लिए तलब नहीं करवाया जा सकता? इस पर तुर्रा यह कि आपके ही संस्थान के अंग्रेजी अखबार में छपी इस खबर में उस हत्यारे के इस बड़बोलेपन का उल्लेख तक नहीं है।

वह पूरा वाक्य कुछ इस प्रकार है : ''जग्गू ने पुलिस को बताया कि जब भी वह जेल से छूटेगा तभी वह उन 10 लोगों को जरूर मारेगा जिन्हें मारने की एवज में वह सुपारी ले चुका है। उसका कहना है कि वह अपने धंधे में ईमानदार है।'' याद रहे यह सिनेस्क्रीन पर किसी जयंत, केएन सिंह, अजीत, प्राण, प्रेम चोपडीश पुरी या गुलशन ग्रोबर के मुंह से किसी सलीम या जावेद द्वारा लिखा संवाद नहीं बुलवाया गया है, यह एक हत्यारे के आत्मस्वीकार के रूप में बोला गया बताया गया है।

यहां हमारा खबर्ची बता रहा है कि एक पेशेवर अपराधी अपने धंधे में इतना ईमानदार है, और एक हम हैं जो अपने पेशे या भाषा के प्रति ईमानदारी तो दूर की बात सावधानी भी नहीं बरत रहे। इस पैराग्राफ को पढ उन अध्यापक महोदय से सहमत होना ही इकलौता विकल्प शेष रहा। हम जो इलैक्ट्रानिक मीडिया की तुलना में अपनी श्रेष्ठïता और विश्वसनीयता के प्रमाणस्वरूप यह दावा करते हैं कि प्रिंट मीडिया असंपादित समाचार प्रचारित नहीं करता, जिसके जो मुंह में आया, वही पाठकों तक नहीं पहुंचाता बल्कि उसे मर्यादित भाषा में पहुंचाता है, अपने अखबार में छपी खबर की इन तीन आपत्तिजनक, निंदनीय पंक्तियों ने मुझे कोई माकूल दलील देने लायक ही नहीं छोड़ा।

नोएडा के जिस बड़े पब्लिक स्कूल में मेरा जाना हुआ, वहां कक्षा छह से आठ तक भी वही किताब पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है जो मैंने तैयार की है। सो नौवी-दसवीं के अलावा छठवी, सातवीं और आठवीं के भी अध्यापकों की मौजूदगी के चलते यहां अध्यापकों की संख्या और अधिक थी। सभी अध्यापकों को यह जानकारी थी कि मैं नवभारत टाइम्स में काम करता हूं सो उनमें से अधिकांश नभाटा के ताजा अंक की प्रति लेकर आए थे और प्रश्नोत्तर काल आरंभ होते ही उसे लहराते हुए मुझसे बर्र की तरह चेंट गए। फिर तो सवालों की वह झड़ी लगी कि गिनना मुहाल, जवाब देते-देते हुआ मैं बेहाल।

अध्यापकों ने भाषा के जिन प्रयोगों को अनुचित और अशुद्ध बताया उनमें से कुछ यहां संक्षेप में बताने जा रहा हूं। पहले ही पन्ने पर छपे चव्हाण के लिए उनका कहना था कि सही शब्द चह्वाण है, चव्हाण नहीं। यहां ह आधा और व पूरा ही नहीं बल्कि वा होना चाहिए था। तीसरे पृष्ठ पर 'स्कूल बस ने अपने ही बच्चे को कुचला' लिखा जाना अनुचित है चूंकि स्कूल बस का कोई बच्चा नहीं होता। यहां 'अपनी ही सवारी या छात्र को कुचला' होना चाहिए था। स्कूली बस में छात्र होने के नाते सवारी गांठने का अवसर मिलता है न कि केवल बच्चा होने के चलते। चौथे पन्ने पर 'वैधानिक नियम नहीं बदल सकता है हाई कोर्ट' में है का प्रयोग अनुचित है, इससे अर्थ स्पष्ट होने की जगह भ्रमित होता है। कोर्ट या तो नियम बदल सकता है या नहीं बदल सकता। इसे पढ़कर यह उलझन जन्म लेती है कि बदलना संभव है या असंभव? इसलिए होना यह चाहिए था 'वैधानिक नियम नहीं बदल सकता हाई कोर्ट'।

आठवें पेज पर 'अब जमीन की खरीद-बेच के लिए आईडी प्रूफ जरूरी' में बेच शब्द का प्रयोग भ्रष्ट प्रयोग का नमूना है। यह अपने आगे बिना 'ने' लगाए लूला है। यदि स्थानाभाव आड़े आ रहा था तो यहां 'खरीद-फरोख्त में' लिखकर काम चलाया जा सकता था। पेज 12 पर एक खबर में स्टूडेंट्स शब्द का प्रयोग किया ही गया है तो फिर दूसरी खबर में टीचरों शब्द की जगह टीचर्स क्यों नहीं लिखा गया? एक के साथ अंग्रेजी और दूसरी के साथ हिंदी का बहुवचनीकरण क्यो? यह अखबार है या किसी की खाला जी का घर? पेज 15 पर 'कमाई के मामले में हैरी ने बना डाली हिस्ट्री' में काश यह भी बता दिया होता कि उसने बनाकर 'कहां डाली' तो हम भी उसे देख आते। उसने डाली, तोड़ी, या भ्रष्ट की, इस पचड़े में पड़ने की जरूरत की कहां थी, केवल 'बनाई' लिखने से भी तो काम चल सकता था न?

अब अंतिम पेज पर आइए। यहां एक खबर है 'विदेशों में और चमकेंगी अब भारतीय फिल्में' इस शीर्षक में यदि अब का प्रयोग और से पहले होता तो किसी अध्यापक को कोई आपत्ति न होती, चूंकि तब यह शीर्षक यह अर्थ देता कि भारतीय फिल्में पहले की अपेक्षा और अधिक चमकेंगी। मगर 'चमकेंगी' के बाद 'अब' का प्रयोग करने से उनके चेहरे पर जो चमक मुझे दिखाई दी वह गुस्से के चलते थी न कि फिल्मों के चमकने की संभावना के चलते। उनका कहना है कि 'चमकेंगी' शब्द स्वत: आनेवाले समय की ओर संकेत कर रहा है फिर 'अब' देने की क्या तुक है? यह शब्द फिल्मों को भूतकाल में तो चमका नहीं देगा, भले ही वे भारत की बेमिसाल फिल्में ही क्यों न हों।

एक अध्यापिका ने एक फिल्मी संवाद का सहारा लेते हुए मुझे उलाहना दिया कि एक छुटकी बिंदी की कीमत तुम क्या जानो अखबारी बाबू। किसी शब्द या मात्रा पर लगने वाली बिंदी अर्थ का अनर्थ करने में सक्षम होती है। कहां हैं को कहां है लिखते ही खोजकर्ता की दौड़भाग सीमित हो जाती है। जो बेचारा अनेक को खोजने के लिए पसीना बहा रहा हो, वह किसी एक को खोजने में जुटा है, यह संकेत देने लगता है। कौन हैं को कौन है और कौन है को कौन हैं किसी के प्रति सम्मान की भावना को कमतर कर देता है और किसी के प्रति अतिरिक्त सम्मान के प्रदर्शन का दोषी ठहरा देता है।

कई जगहों, कई वारदातों, कई वजहों जैसे प्रयोगों के संदर्भ में एक अध्यापक ने मुझे एक चुटकुला भी सुनाया। वे बोले, हुआ यह कि एक बार संता को यूरोप जाने का मौका मिला। इस दौरान वह समुद्र तटों पर भी गया। हर जगह समुद्र के किनारे की रेत पर लेटे-बैठे, खेलते-नहाते तरह तरह के लोग दिखाई दिए। यात्रा से लौटने के बाद संता ने बंता तक एक अंग्रेजी शब्द प्यूपल के जरिए यह सूचना पहुंचाने के लिए कि उसने वहां समुद्री किनारों पर असंख्य, अनगिनत, बेशुमार लोग देखे हैं, प्यूपल का भी बहुबचन करते हुए कहा, मैं जहां भी गया मुझे सीवीच पर प्यूपलां ही प्यूपलां लेटे-बैठे-नहाते-रोला पाते दिखाई दिए।

हमारे अखबार में आए दिन छपनेवाली अशुद्धियों का परिणाम इस रूप में भी सामने आने लगा है कि कई स्कूलों में हमारे मस्ट हेड के सिर पर सवार अंग्रेजी अक्षर एनबीटी की फुलफार्म नवभारत टाइम्स की जगह नो बडी ट्रस्ट की जाने लगी है। अध्यापकों का कहना है कि वे नवभारत में छपनेवाले जोक्स भी ध्यान से पढ़ते हैं। अलबत्ता उनका यह भी कहना है कि वे छापे भले ही 'हैपी मार्निंग' स्लग के तहत जाते हों मगर वास्तव में वे कई बार उनकी मार्निंग को कर देते हैं स्वाहा। जहां तक मेरी अपनी जानकारी है, नभाटा में छपनेवाले जोक्स को कई जिम्मेदार संपादनकर्मी चेक करते हैं। बल्कि कहना चाहिए हमारे अखबार की आधी से अधिक मेधा और प्रतिभा चुटकुले खोजने और उन्हें दुरुस्त करने में खर्च होती है।

फिर भी एक अध्यापक महोदय ने नभाटा में छपा जो जोक मेरे सामने रखा उसे पढ़कर उनके और मेरे मन में जो प्रतिक्रिया जागी उसे उजागर करने से पहले मैं आपको भी वह जोक पढ़वाए देता हूं।

नभाटा के 6 अगस्त के अंक में पेज 9 पर जो जोक छपा है, वह है -

'एक बच्चे को उसकी मां पीट देती है। पापा आकर पूछते हैं- क्या हुआ मेरे बच्चे?

बच्चा - मैं अब आपकी पत्नी के साथ एडजस्ट नहीं कर सकता। मुझे अपने लिए अलग चाहिए।'

इस तथाकथित जोक को पढ़कर नभाटा के संपादनकर्मियों की मार्निंग हैपी होती हो तो हो, उन अध्यापक महोदय की तो मार्निंग ही नहीं, जब तक जोक उनके जहन में रहा, उनका खून ही खौलाता रहा। उनका कहना है कि क्या नभाटा के लोग इतना भी नहीं जानते कि स्त्री के कई रूप होते हैं और उनमें से एक रूप है पत्नी का तो दूसरा रूप है मां का। पिता जहां उसके पत्नी रूप से जुड़ा है वहीं बेटा मां रूप से। जबकि यह चुटकुला यह दावा करता है कि पिता और पुत्र दोनों ही उसके पत्नी रूप से सरोकार रखते हैं। क्या यह नैतिक है? बेटे को उसके मां रूप से एडजस्ट करना होता है न कि पत्नी रूप से। ऐसे में पिता को दिया गया उसका उलाहना अनैतिकता की श्रेणी में आता है न कि हास्य की।

उस पर तुर्रा यह कि नभाटा केवल यही कहलवा कर संतुष्ट नहीं होता, वह बेटे से यह कहलवाकर कि उसे अपने लिए अलग पत्नी चाहिए, इस अनैतिक संभावना को दोहराता भी है और यही सच है का ठप्पा लगाता है। क्या वाकई इसे पढ़ने के बाद कोई हैपी मार्निंग की फीलिंग से ओतप्रोत हो सकता है? उन अध्यापक महोदय का कहना था कि इसे पढ़ने के बाद उनके मन में सबसे पहले एक गाली उभरी थी मगर जोक के शब्द, उसमें बच्चे के पिटने का जिक्र और जोक के साथ छपे कैरीकेचर से आभास देती उसकी अल्पायु उस गाली को उस बच्चे पर चस्पां करने से रोक रही थी, सो अंतत: उन्होंने वह गाली उस जोक को छापने वाले हम लोगों के खाते में जमा कर दी। कुछ-कुछ यही प्रतिक्रिया मेरी भी रही। वह गाली नितांत असंसदीय भाषा में है इसलिए मैं इस पन्ने पर उसे लिख नहीं पा रहा हूं, यदि आपके जहन में अब तक वह न आई हो तो आप कभी समय निकाल कर मुझसे पूछ सकते हैं,  में ससंकोच ही सही, बहुत संभव है बता ही दूं।

स्कूलों में जाने से मुझे यह जानकारी हाथ लगी कि स्कूलों मे स्वयं नवभारत टाइम्स को संता-बंता की तरह जोक्स का एक स्थायी चरित्र बना लिया गया है। मैं अब ऐसे ही दो जोक्स यहां लिखने जा रहा हूं। हमारा अखबार तो ह्यूमर को प्रीफर करता है न? कहते हैं सबसे बेहतर ह्यूमर का सुबूत होता है खुद पर हंसना, सो लगे हाथ इनमें से कोई एक या दोनों ही अपने अखबार में छापकर अपने को सच्चा और खरा ह्यूमर खां अखबार साबित किया जा सकता है।

आपकी सुविधा के लिए पहला जोक यथासंभव हिंग्रेजी में है, व्याकरण या वाक्य विन्यास के संदर्भ में कुल उतनी ही सावधानी बरती गई है जितनी एनबीटी बरतता है ताकि इन्हें पढ़ते हुए नभाटा ही पढ़ने का एहसास होता रहे। चुटकुला है -

एक टीचर ने क्लास में लेट आए स्टूडेंट को आर्डर दिया कि वह उनकी टेबल के पास आकर कुछ न्यूजपेपर पिक करे और उनमें से कोई आठ न्यूजें पढ़कर सुनाए।

स्टूडेंट वहां तक गया। न्यूजपेपर कलेक्ट किए और अपनी डेस्क पर वापस लौट आया।

फिर उनमें से न्यूज पढ़कर सुनाने लगा। टीचर भी अपनी दोनों आंखें बंद किए सुनने लगे।

अभी स्टूडेंट ने कुल दो न्यूज पढ़ी थीं कि टीचर ने उसे बैठने का आदेश देते हुए हिदायत दी कि यदि फिर देर से आया तो दर्जनभर न्यूज पढ़कर सुनानी होंगी।

उस स्टूडेंट के बैठते ही एक अन्य स्टूडेंट ने अपने करीबी स्टूडेंट से पूछा, टीचर ने आठ न्यूज पढ़ने को कहा था, फिर इसे दो न्यूज पढऩे के बाद ही सजा से मुक्ति क्यों दे दी?

साथी स्टूडेंट ने बताया, उसने दोनों न्यूज नवभारत टाइम्स से पढ़कर सुनाई थी जिसमें हर खबर में हर बात थोड़े बहुत फेरबदल के साथ चार-चार बार लिखी होती है। हैडिंग में, इंट्रो में, हाइलाइटर में और मूल खबर में भी। सो टीचर को लगा होगा कि इसने दोनों न्यूजें अलग-अलग चार पेपर्स में से पढ़ी है, सो इस तरह हो गईं पूरी आठ न्यूजें।

इसे पढ़कर हंसी नहीं आई? चलिए कोई बात नहीं। अब मैं जो दूसरा जोक सुनाने जा रहा हूं, यदि आप जरा भी संवेदनशील हुए तो इसे पढ़कर अपकी रुलाई फूटना तय है। इस जोक का हिंग्रेजीकरण नहीं किया जा रहा है ताकि आप यह जान सकें कि केवल हिंदी में लिखे जाने पर भी कोई जोक पुरअसर बना रह पाता है या नहीं।

तो दूसरा जोक जो है वह यों है कि -

एक अध्यापक ने एक उद्दंडी शिक्षार्थी को नवभारत टाइम्स की प्रति पकड़ाते हुए कहा कि इसमें से कोई दो खबरें पढ़कर सुनाओ। यदि तुमने धीमी गति से पढ़ा तो कठोर दंड दिया जाएगा और यदि अशुद्ध पढ़ा तो भी तुम कठोर दंड के भागी बनोगे।

इस पर उस शिक्षार्थी ने बिना खबरें पढ़े ही अखबार अध्यापक को लौटाते हुए कहा कि फिर आप मुझे कठोर दंड दे ही दीजिए, चूंकि कम से कम इस अखबार को पढ़कर तो मैं दंड पाने से नहीं बच सकूंगा।

अध्यापक ने पूछा ऐसा क्यों? शिक्षार्थी बोला, यदि मैं इसमें छपी खबरों को त्वरित गति से पढ़ूंगा तो मुझे उन्हें उसी अशुद्ध रूप में पढ़ना होगा जिस अशुद्ध रूप में वे छपी हुई हैं। तब आप मुझे अशुद्ध पठन का दोषी ठहराकर दंडित करेंगे। यदि मैं उन्हें सुधारते हुए पढ़ूंगा तो जाहिर है मेरी पढ़ने की गति धीमी होगी, तब आप मुझे धीमी गति से पढ़ने का दोषी मानते हुए दंडित करेंगे। सो क्यों न बिना पढ़ने का कष्ट उठाए और अपने पर एक और दोष मढ़वाए, आपसे दंडित हो लिया जाए।

भाषा के सरलतम प्रयोग में और भ्रष्टतम प्रयोग में बुनियादी अंतर होता है। महात्मा गांधी ने भाषा का एक सरलतम रूप चलाने का प्रयास किया था। उन्होंने स्वरों की संख्या कम करनी चाही थी। उसे नाम दिया गया था गांधी हिंदुस्तानी। गांधी जी चाहते थे कि हिंदी को और भी सरल बनाने के लिए बारह स्वरों का नहीं केवल दो स्वर अ और आ का ही प्रयोग किया जाए। शेष स्वर शब्दों के स्थान पर उनके मात्रा रूप से काम चलाया जाए। मसलन उसने लिखने के लिए उ स्वर का प्रयोग न करके अु यानी अ स्वर में ही उ के मात्रा रूप का सामंजस्य कर दिया जाए। इसी प्रकार इसने को अिसने, उसको को अुसको, इतवार को अितवार, ईश्वर को अीश्वर आदि लिखा जाए। उस भाषा रूप के अंतिम प्रयोगकर्ता काका कालेलकर हुए हैं। आज उस भाषा रूप का कोई अता-पता नहीं है, बचा है केवल 21 सन्निधि, राजघाट में गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा का दफ्तर और साइन बोर्ड। जब गांधी जी का वह सरल रूप नहीं चला, तब देखना यह है कि नभाटा का यह भ्रष्ट रूप कब तक चलायमान रहता है।

हम जाने क्यों अपनी भाषा की शब्द संपदा के प्रयोग के मामले में मधुमेह के रोगियों जैसा व्यवहार करने लगे हैं। जैसे वे थाल में छप्पन भोग परोसे जाने के बाद भी मिष्ठान्न की ओर हाथ बढ़ाने में संकोच करते हैं, हम भी कुछ शब्दों के प्रयोग में संकोच दिखाते हैं यहां तक कि उच्चारण में मृदु ऋ को विस्मृत कर, अनदेखा कर ऋतु, ऋचा, ऋषभ को भी रितू, रिचा, रिषभ लिखते जरा भी संकोच नहीं करते। दूसरी ओर अंग्रेजी उच्चारण के फेर में स्वयं में संपूर्ण शुक्ल और मिश्र के पिछवाड़े एक डंडा (ा) लगाने से नहीं चूकते और अच्छे-भले सर्वश्री अक्षय शुक्ल और राजेश मिश्र को अक्षय शुक्ला और राजेश मिश्रा बनाकर ही दम लेते हैं।

मैं कभी उतना आहत या शर्मिंदा नहीं होता जितना उस दौरान होता हूं जब अध्यापकगण मुझपर इसलिए ताने कसते हैं चूंकि जिस अखबार के पन्नों पर आए दिन यह शर्मनाक मंजर नुमायां हो रहा है, मैं भी उसका एक हिस्सा हूं। जब भी वे क्षण सामने आते हैं, मैं खुद को इस अपराधबोध से उबार नहीं पाता कि हां, इसमें मेरा भी वास है, इस घिन में मेरा भी उच्छिष्ट है।

मैंने अपने अखबार के पाठकों की इन शिकायतों की ओर आपके भी वरिष्ठ का ध्यान दिलाया था कि हमारी निर्मिति के वस्त्र जिन स्थान विशेषों से उघड़े हुए हैं वहां से उसकी शर्म बेपर्दा हो रही है और लोग जो हैं उसे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह सुनकर वे अप्रसन्न या लज्जित नहीं हुए, बल्कि इसलिए अतिप्रसन्न हुए कि लोग हमारी निर्मिति को आंखें फाड़कर देख तो रहे हैं।

मैं जानता और मानता हूं कि अध्यापकगण जो आरोप मढ़ते हैं वे सब के सब उचित नहीं ठहराए जा सकते। इसके साथ ही जो अध्यापकगण नहीं जानते, मैं वह सच्चाई भी भी जानता हूं कि त्रुटियां रह जाने का कारण संपादनकर्मियों का अज्ञान या असावधानी नहीं, काम का दोहरा दबाव भी है। संपादन और पेजमेकिंग दो पृथक अनुशासनों के काम हैं। किसी एक काम के लिए निर्धारित समय में ही दोनों को अंजाम देने का नतीजा यह होता है कि संपादित किए का पुनर्लेखन या पुनर्विचार और सज्जित किए की पुनर्सज्जा का अवकाश ही नहीं होता। प्रसंगवश यह तर्क मैंने कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मुख भी रखा था कि यदि संपादनकर्मियों को पर्याप्त समय मिले तो इनमें से कई शिकायतों को जन्म लेने का अवसर ही न मिलेगा और अखबार पाठकों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरने लगेगा।

बहरहाल, स्वयं को इस दोषारोपण से मुक्त रखने का एक सरलतम उपाय यह है कि मैं नभाटा टीम से ही पृथक हो लूं। बहुत संभव है निकट भविष्य में मैं इस पर अमल भी कर गुजरूं, मगर इसके बाद भी अध्यापकों की ओर से मुझे दोषारोपण से मुक्त कर ही दिया जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। तब वे 'जहां आप हैं' की जगह 'जहां आप थे' कहकर उलाहने दे सकते हैं।

इन हालात में मेरी रही-सही उम्मीद आप पर आ टिकी है। मैं आशा करता हूं कि खबरों के संपादन में आपकी ओर से थोड़ी और सावधानी बरती गई तो मेरे हिस्से में आपके हिस्से के उलाहने और गालियां पाने के अवसर कुछ कम अवश्य आएंगे।

स्वतंत्रता दिवस की विलंबित और जन्माष्टमी की अग्रिम अनंत शुभकामनाएं साथ ही इस धृष्टता के लिए क्षमायाचना।

आपका

वीरेंद्र जैन

नवभारत टाइम्स

इसके पहले का भाग एक पढ़ने के लिए क्लिक करें- नभाटा संपादकीय स्टाफ को वीरेंद्र जैन का पत्र (भाग एक)


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