बिना प्रसार संख्‍या जांचे बिहार में अखबारों को दिया गया विज्ञापन

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: वित्‍त आयुक्‍त ने की थी मंत्रिमंडल निगरानी विभाग से जांच कराने की संतुष्टि : मुंगेर। पटना स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में विगत एक दशक से दैनिक अखबारों को विज्ञापन आबंटित करने में किस प्रकार की लूट मची है, इसका खुलासा बिहार सरकार के वित्त (अंकेक्षण) विभाग के अंकेक्षकों के दल ने किया है। वित्‍तीय जांच दल ने उजागर किया है कि किस प्रकार सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय अखबरों की प्रसार-संख्या की जांच कराए बिना ही अखबारों को सरकारी विज्ञापन जारी कर रहा है।

उन्होंने यह भी उजागर किया है कि तात्कालीन सूचना एवं जनसम्पर्क मंत्री और सूचना सचिव ने विभागीय नियमों और कानूनों की अवहेलना कर कई पत्र।-पत्रिकाओं को व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी सजावटी विज्ञापन प्रकाशित कराया है। सभी वित्‍तीय रिपोर्ट वर्ष 2002-03 और 2003-04 से संबंधित हैं।

जिस वित्‍तीय जांच दल ने सरकारी विज्ञापन के फर्जीवाड़ा को उजागर किया, उस टीम के मुखिया थे वरीय अंकेक्षक दिनेश्वर गोस्वामी। अन्य वरीय अंकेक्षक थे कृष्णा और बब्‍बन सिंह। इसके साथ सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के तत्कालीन निदेशक राजेन्द्र चौधरी, सहायक निदेशक (विज्ञापन), मो0 शमीम अख्तर, बिनय कुमार शर्मा, वी. कुमार, एके सिंह, वीरेन्द्र प्रसाद, शिवनाथ राय और सत्येन्द्र कुमार भी शामिल थे।

जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशलय से सरकारी विज्ञापन पानेवाले अखबारों की प्रसार संख्या की जांच और सत्यापन नहीं किया गया है। प्रसार-संख्या में घोटाला के संबंध में जांच टीम की रिपोर्ट पर सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के उप-निदेशक (विज्ञापन-लेखा) लीला कांत झा ने 16 जून 2006 को विभागीय संचिका पर अपनी टिप्पणी कुछ इस प्रकार दी है -‘‘जहां तक प्रसार संख्या की जांच का प्रश्न है, इस संबंध में विभाग द्वारा कार्रवाई की जा रही है। दर-निर्धारण कमिटी की बैठक बुलाकर स्वीकृत सूचीवाले समाचार-पत्रों, जो वास्तविक प्रसार संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर डीएवीपी से दर निर्धारित करा लेते हैं, के विज्ञापन-दर को कम किया जाना राज्य हित में आवश्यक है।’’

अपर वित्त आयुक्त ने अखबारों की प्रसार-संख्या की जांच मंत्रिमंडल निगरानी विभाग से कराने की जरूरत : सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग की विभागीय संचिका संख्या-44।97/ विज्ञापन/लेखा में तात्कालीन अपर वित्त आयुक्त (व्यय) ने तो इस प्रकरण को काफी गंभीरता से लिया और अपन मंतव्य कुछ यूं दिया -‘‘ ऐसे समाचार-पत्र हैं जो प्रायः कहीं देखने को नहीं मिलते हैं, परन्तु सरकार से उन्हें विज्ञापन मिल रहा है। मेरी राय में बिहार सरकार ऐसे समाचार-पत्रों की प्रसार-संख्या की जांच मंत्रिमंडल निगरानी विभाग से कराए और जांच-रिपोर्ट आने पर उन अखबारों को विज्ञापन-मद का भुगतान किया जाए।’’ उन्होंने आगे मंतव्य दिया है कि- ‘‘प्रसार संख्या की जांच के बिना समाचार-पत्रों को सरकारी विज्ञापन-मद में जो भुगतान किया जा रहा है, यह ‘गबन’ के सामान है। इस विधि से सरकार की मोटी राशि व्यय हो रही है।’’

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.


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