हिंदुस्‍तान के विज्ञापन फर्जीवाड़ा की जांच रिपोर्ट सूचना निदेशालय के लिए गले की हड्डी बनी

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मुंगेर। बिना रजिस्‍ट्रेशन के स्वतंत्र प्रकाशन घोषित कर नाजायज और अनियमित ढंग से वित्तीय वर्ष 2002-03 और 2003-04 में एक करोड़ 32 हजार 272 रुपए और 16 पैसे के दैनिक हिन्दुस्तान को भगुतान करने के मामले में वित्त (अंकेक्षण) दल ने ज्यों ही रिपोर्ट सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को सुपुर्द की, पटना स्थित सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में मानो ‘‘तूफान’’ आ गया।

जांच रिपोर्ट निदेशालय के वरीय अधिकारियों के लिए गले की हड्डी बन गई। वित्‍तीय जांच दल, जिसका नेतृत्व दिनेश्वर गोस्वामी कर रहे थे, अपनी रिपोर्ट में सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय को दैनिक हिन्दुस्तान या संबंधित व्यक्तियों से अनियमित और अवैध भुगतान की राशि एक करोड़ 32 हजार 272 रुपए 16 पैसा वसूलने की कार्रवाई की स्पष्ट सिफारिश की। परन्तु ,निदेशालय की संचिकाओं पर विभाग के कार्यरत वरीय पदाधिकारियों की दी गई टिप्पणियां प्रमाणित करती हैं कि निदेशालय ने देश के इस बड़े और सनसनीखेज सरकारी विज्ञापन घोटाले में अखबार के प्रबंधन को कानूनी शिकंजा से बचाने के लिए हर तरह का हथकंडा अपनाया। निदेशालय के वरीय अधिकारी स्वयं भी इस भ्रष्टाचार की आग की लपटों से बचना चाहते थे। हां, कुछ अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट का समर्थन किया, परन्तु राशि वसूलने की कार्रवाई लंबे अर्से तक लटकी रही।

निदेशालय के वरीय अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट के आलोक में इस फर्जीवाड़ा को संचिका में किस प्रकार उलझाने या सुलझाने (?) का काम किया, मैं उन वरीय अधिकारियों की इससे संबंधित संचिकाओं पर की गई टिप्पणियां हू-ब-हू यहां प्रकाशित कर रहा हूं। सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, पटना के वरीय निदेशक रामनरेश पांडेय ने 30 जनवरी, 2006 को संचिका में पृष्ठ 18 पर इस विज्ञापन घोटाले में टिप्पणी की- ‘‘अंकेक्षण प्रतिवेदन की कंडिका-30 में हिन्दुस्तान के संयुक्त विज्ञापन -दर और उसके अनुसार हुए भुगतान और पृष्ठ-79/40 द्वारा हिन्दुस्तान दैनिक को किए गए भुगतान को इस आधर पर अमान्य किया गया है कि जो दर उनके लिए स्वीकृत की गई है, वह सही नहीं है और इसके लिए उनसे (अखबार) से 01 करोड़ 32 हजार 272 रुपया 16 पैसा की वसूली का परामर्श दिया गया है।’’

श्री पांडेय आगे टिप्पणी करते हैं -‘‘अंकेक्षण प्रतिवेदन द्वारा जिन मूल विषय को उठाया गया है उसके अनुसार हिन्दुस्तान, पटना के मुजफफरपुर और भागलपुर के पत्र को स्वतंत्र प्रकाशन नहीं माना गया है। अपितु, हिन्दुतान दैनिक, पटना से ही ग्यारह संस्करणों में रखा गया है। अंकेक्षण आपत्ति का मूल बिन्दु यह है कि एक ही पंजीयन संख्या पर मुजफफरपुर और भागलपुर के लिए मुद्रण होता है और इसके लिए अलग से कोई प्रिंट लाइन नहीं है। आपत्ति में कहा गया है कि जब तक किसी मुद्रण केन्द्र का अलग पंजीयन और प्रिंट-लाइन नहीं होता है, तब तक उसे स्वतंत्र प्रकाशन नहीं समझा जाएगा।’’

श्री पांडेय आगे टिप्पणी करते हैं कि -‘‘विभाग द्वारा हिन्दुतान दैनिक को उसके मुजफफरपुर, भागलपुर और पटना के लिए भारत सरकार के विज्ञापन और दृष्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) द्वारा निर्धारित दरों के अनुरूप ही भुगतान होता है और इसके लिए वर्ष 2002 से ही पत्र को 304 रुपया 73 पैसा प्रति कालम सेंटीमीटर की दर से भुगतान किया जाता रहा है।’’

श्री पांडेय ने आगे टिप्पणी लिखी है -‘‘समाचार पत्रों के दर निर्धारण के लिए अपर वित्त आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है और इस समिति में गृह विभाग और सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग भी सदस्य है, और उस समिति की अनुशंसा के आलोक में 30 सितम्बर 2007 तक के विज्ञापनों के लिए हिन्दुस्तान का विज्ञापन-दर निर्धारण किया है, जो पूर्व निर्धारित दर 304 रुपया 73 पैसा के समकक्ष ही है।’’

श्री पांडेय अपनी टिप्पणी की समाप्ति कुछ इस प्रकार करते हैं --‘‘उपर्युक्त बिन्दुओं के आलोक में स्थिति से सरकार को अवगत कराया जाए और तदनान्तर अंकेक्षण आपत्तियों का उत्तर भेजा जा सकता है।’’

इस प्रकार, श्री पांडेय ने डीएवीपी द्वारा हिन्दुस्तान के पटना, मुजफफरपुर और भागलपुर के लिए अलग-अलग निर्धारित विज्ञापन दर की आड़ में वित्त अंकेक्षण रिपोर्ट को झुठलाने का प्रयास किया है और उनके मंतव्य से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि बिहार का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग ने हिन्दुस्तान को वर्णित वित्तीय वर्ष में सरकारी विज्ञापन मद में जो भुगतान किया, वह सही था।

वर्तमान में राम निवास पांडेय मुंगेर प्रमंडलीय मुख्यालय में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में उप-निदेशक के पद पर पदस्थापित हैं। अब इस सनसनीखेज विज्ञापन घोटाले से संबंधित वित्त जांच विभाग की रिपोर्ट को हू-ब-हू प्रस्तुत कर रहा हूं। जांच रिपोर्ट कुछ इस प्रकार कहती है --‘‘दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन -भुगतान संबंधी संचिका विज्ञापन/ लेखा/ 42-7/2003 एवं संचिका से विज्ञापन के भुगतान की जांच से अंकेक्षक को स्पष्ट हुआ है कि हिन्दुस्तान दैनिक को पटना संस्करण के अतिरिक्त मुजफ्फरपुर और भागलपुर मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन दिखाकर अनके विज्ञापन के लिए अलग दर पर वर्ष 2002-03 एवं 2003-04 में कुल 01 करोड़ 15 हजार 955 रुपया 96 पैसा का अवैध भुगतान किया गया था इसका विवरण परिशिष्‍ठ ग पर अंकित है।

अंकेक्षण रिपोर्ट आगे कहती है --‘‘संचिका से स्पष्ट है कि मुजफ्फरपुर एवं भागलपुर में कोई स्वतंत्र प्रकाशन या संस्करण नहीं है, वरन पटना संस्करण का केवल मुद्रण केन्द्र है। इसके लिए अलग से कोई पंजीयन आरएनआई से नहीं प्राप्त था। हिन्दुस्तान, पटना संस्करण की पंजीयन संख्या- 4438/86 है। संचिका से यह भी स्पष्ट होता है कि इन दोनों केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन होने का कोई प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं है। कारण कि इनके लिए अलग से कोई प्रिंट लाइन नहीं था और न ही अलग पंजीयन था। मुजफ्फरपुर और भागलपुर डेट लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि दैनिक हिन्दुस्तान के प्रतिनिधियों द्वारा भी की गई है कि मुजफ्फरपुर और भागलपुर के लिए पंजीयन एवं मास्ट हेड वही है जो पटना के लिए है। इस आधार पर केवल मुजफ्फरपुर या भागलपुर में विज्ञापन छापने के लिए हिन्दुस्तान दैनिक तैयार नहीं था एवं संयुक्त रूप से पटना, मुजफ्फरपुर तथा भागलपुर तीनों में छापने के लिए सरकार को बाध्य किया।

जांच-रिपोर्ट अखबारों के विज्ञापन घोटालों की परतों को आगे यूं इस प्रकार उजागर करती है --‘‘अंकेक्षकों को दी गई सूचना के अनुसार मुजफ्फरपुर में दिनांक 28-03-2001 से एवं भागलपुर में दिनांक 03-08-2001 से मुद्रण केन्द्र प्रारंभ किया गया। प्रेस पुस्तक रजिसस्‍ट्रीकरण अधिनियम, 1867 के तहत प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषणा करना, कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना तथा भारत सरकार के समाचार पत्र पंजीयक (आरएनआई) से पंजीयन कराना अनिवार्य था, जो नहीं किया गया। संचिका से स्पष्ट है कि मुजफ्फरपुर प्रकाशन की घोषणा दिनांक 29-11-2003 को एवं भागलपुर के लिए घोषणा पत्र दिनांक 11-12-2002 को समर्पित एवं स्वीकृत की गयी। अर्थात मुद्रण कार्य प्रारंभ होने के दो वर्षों के बाद घोषणा-पत्र समर्पित किया गया। राज्य सरकार हिन्दुस्तान दैनिक द्वारा यह बताना भी गलत पाया गया है कि इन दोनों (मुजफफरपुर और भागलपुर) का पंजीयन संख्या भी- 4438/86 है चूंकि संचिका के पृष्ठ संख्या-133 पर पंजीयन की छायाप्रति दिनांक 09-03-2004 (नवीनीकरण) संलग्न पाई गई है। उसमें पटना के अतिरिक्त इन दो प्रकाशनों का उल्लेख भी नहीं था।

उल्लेखनीय है कि यदि इन दोनों को पंजयन वहीं प्राप्त होता जो पटना का है, तब नवीनीकरण तिथि 09-03-2004 (घोषणा के बाद) को मुजफफरपुर एवं भागलपुर का अवश्य उल्‍लेख रहता। इस बात का उल्लेख जिलाधिकारी,पटना के पत्रांक -30, दिनांक 07-10-2004 में भी किया गया है। गौरतलब है कि डीएवीपी द्वारा इन दोनों केन्द्रों (मुजफ्फरपुर और भागलपुर) को 01-10-2002 से पटना से अलग दर स्वीकृत किया है एवं पत्रों में प्रकाशकों को संबोधित है, यानि इन दोनों को अलग-अलग प्रकाशन माना गया है। डीएवीपी द्वारा इन दोनों केन्द्रों को किस प्रकार अलग प्रकाशन माना गया है, इसकी छानबीन आजतक विभाग द्वारा नहीं की गई है और अवैध रूप से प्रकाशन के लिये भुगतान पर अंकुश भी नहीं लगाया गया है। इससे स्पष्ट है कि गलत तरीके से अवैध प्रकाशन के लिए अलग से विज्ञापन-दर प्राप्तकर उसके लिए विज्ञापन का भुगतान प्राप्त किया गया है।’’

परन्तु, वित्त जांच रिपोर्ट के आलोक में बिहार सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय ने ईमानदारी से हिन्दुस्तान को सरकरी विज्ञापन मद में किए गए अवैध भुगतान की राशि एक करोड़ 32 हजार 272 रुपये और 16 पैसे की वूसली की कार्रवाई 30 जनवरी, 2006 तक नहीं की। एकमात्र कारण देश का शक्तिशाली मीडिया हाउस मेसर्स एचटी मीडिया लिमिटेड की संलिप्तता जो इस विज्ञापन घोटाले में शामिल थी।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.


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