राजीव वर्मा और शशि शेखर को टका-सा मुंह लेकर लौटना पड़ा खंडूरी के यहां से!

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आजकल जिन मीडिया घरानों के पास कथित रूप से पत्रकारिता का ठेका है, वे पत्रकारों को पत्रकार नहीं बल्कि दलाल बनाने में लगे हुए हैं. वे अपने संपादकों को संपादक कम, लायजनिंग अधिकारी ज्यादा बनाकर रखते हैं. ताजा मामला हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े मीडिया हाउस का है. बिड़ला जी के इस मीडिया घराने की मालकिन शोभना भरतिया हैं. उनके हिंदी अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर हैं.

पिछले दिनों शशि के कंधे पर शोभना भरतिया ने एक बड़ा टास्क रख दिया. जब मालकिन ने कोई काम कह दिया तो भला संपादक कैसे ना-नुकूर करे. शोभना का आदेश मिलते ही हवा की वेग से शशि शेखर देहरादून पहुंच गए. अब जान लें कि मालकिन ने काम क्या सौंपा. दरअसल निशंक जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने मौखिक रूप से यह ऐलान कर दिया था कि राज्य में एचटी ग्रुप को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने का मौका प्रदान किया जाएगा. संभवतः निशंक की कैबिनेट ने इसे पारित भी कर दिया था और अब इसे विधानसभा में पास होना था. निशंक से हिंदुस्तान, देहरादून के स्थानीय संपादक दिनेश पाठक का गहरा याराना था. दिनेश पाठक को उन दिनों सीएम निशंक के दाएं-बाएं मंडराते हुए अक्सर देखा जा सकता था. निशंक से प्रेम का फायदा दिनेश पाठक ने हिंदुस्तान अखबार को नाना रूपों में दिलवाया जिसमें एक रूप विवि खोलने की अनुमति देना भी था. और, निशंकप्रेम से अत्यधिक प्रेम के चक्कर में दिनेश पाठक ने खंडूरी से भी पंगा ले लिया था, उन दिनों खंडूरी के खिलाफ खूब खबरें छापीं.

खंडूरी ने सीएम की कुर्सी संभालते ही निशंक के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की पहल करते हुए उनके फैसलों की समीक्षा का ऐलान कर दिया. एचटी वालों को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने की अनुमति देने के कैबिनेट के प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में कमेटी बना दी. बात दिल्ली तक, शोभना भरतिया तक पहुंच गई कि उत्तराखंड में एचटी के प्रस्तावित विश्वविद्यालय पर खंडूरी सरकार पानी फेर सकती है. इसके बाद शोभना भरतिया ने अपने सीईओ राजीव वर्मा और संपादक शशि शेखर को ''आपरेशन खंडूरी'' में लगा दिया. कई दिनों तक राजीव वर्मा और शशि शेखर देहरादून में पड़े रहे. इनकी दो बार मीटिंग भी खंडूरी के साथ हुई पर खंडूरी टस से मस नहीं हुए. उन्होंने कहा कि वे वही करेंगे जो राज्य के हित में होगा और नीतियों के अनुरूप होगा. उन्होंने अलग से कोई छूट या अनुशंसा करने से मना कर दिया. इसके बाद राजीव वर्मा और शशि शेखर टका सा मुंह लेकर लौट गए.

सूत्रों का कहना है कि जिस कमेटी को विवि के प्रस्ताव पर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया, उसने इतनी कमियां प्रस्ताव में पाई हैं कि इसका नीति के तहत पास होना संभव ही नहीं है. पर शशि शेखर जुटे रहे कि वह किसी तरह से खंडूरी को मना कर काम करा लेंगे पर ऐसा हो न सका. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दिनेश पाठक बिलकुल हाशिए पर चले गए. सूत्रों का कहना है कि शशि शेखर की मीटिंग तक दिनेश पाठक नहीं रखवा पाए क्योंकि उनका खंडूरी व उनके लोगों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. इस कारण निशंक के कार्यकाल के दौरान हिंदुस्तान, देहरादून में हाशिए पर रखे गए अविकल थपलियाल को सामने लाया गया. अविकल ने अपने स्तर पर पहल कर खंडूरी से शशि शेखर की मीटिंग फिक्स कराई. इससे दिनेश पाठक की लायजनिंग के मामले में नंबर कम हो गए. वैसे दिनेश पाठक सीएम बदलने के बाद से खंडूरी की जय जय करने में भी खूब लगे हैं और सरकार परस्त खबरों को छाप छाप कर ज्यादा से ज्यादा तेल-मक्खन लगाकर खूब नंबर बटोरने की फिराक में लगे हैं पर उनकी दाल गल नहीं पा रही.

अविकल के आगे आने और ''आपरेशन खंडूरी'' के कई स्टेप्स संभालने से दिनेश पाठक की कुर्सी पर खतरा मंडरा गया है. एचटी प्रबंधन को समझ में आ गया है कि जब तक दिनेश पाठक देहरादून में हिंदुस्तान की कुर्सी पर आसीन रहेंगे, खंडूरी का गुस्सा शांत नहीं होने वाला. इस तरह नए संपादक की तलाश शुरू हो गई है पर कोई 'सूटेबल ब्वाय' अभी नहीं मिला है. शशि शेखर और राजीव वर्मा की खंडूरी से मीटिंग और टका सा मुंह लेकर वापस लौटने की घटना की देहरादून के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच खूब चर्चा है. जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं. बीसी खंडूरी के कुछ करीबी लोगों से जब भड़ास4मीडिया ने बात की तो उन्होंने शशि शेखर और राजीव वर्मा के देहरादून आने व खंडूरी से मिलने की पुष्टि की और साथ ही यह भी जानकारी दी कि ये लोग विश्वविद्यालय के मसले पर ही मिलने आए थे.

उधर, एक चर्चा और भी है. लोग कह रहे हैं कि उमाकांत लखेड़ा ने शशि शेखर से अच्छा बदला लिया. उमाकांत लखेड़ा दिल्ली में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ थे और शशि शेखर के कारण उन्हें हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा था. अब लखेड़ा सीएम खंडूरी के मीडिया एडवाइजर हैं. उन्होंने अपने लेवल पर भी भरसक यह कोशिश की होगी कि शशि शेखर के काम किसी भी हालत में सीएम के लेवल से पास न हो जाएं ताकि शशि शेखर को एहसास हो सके कि मीडिया की दुनिया वाकई छोटी है और कोई छोटे पद वाला जर्नलिस्ट भी उनके सामने शेर जैसी ताकत वाला बन सकता है. शह-मात के इस खेल में फिलहाल बुरी स्थिति शशि शेखर की है. कई लोग यह भी कह रहे हैं कि खंडूरी को न पटा पाना शशि शेखर के करियर के लिए भारी पड़ सकता है. शोभना भरतिया कई मसलों के कारण शशि शेखर से नाराज चल रही हैं और अब वे नए दौर के लिहाज से नए संपादक की तलाश में हैं जिसके तहत उनकी कई लोगों से मुलाकात व बातचीत भी शुरू हो गई है. तो लोग यह मानने लगे हैं कि छह महीने या साल भर में शशि शेखर के राज का खात्मा संभव है. फिलहाल शशि शेखर के लिए देहरादून की हार एक बड़ी हार है जिसका घाव भरते भरते वक्त लगेगा.

पर ऐसे वक्त में शशि शेखर को कौन समझाए कि उन्होंने जिस तरह की अवसरवादी पत्रकारिता अबतक के अपने करियर में की है, उसका अंजाम कुछ इसी तरह का होना था. प्रधान संपादक की कुर्सी पर बैठ जाने और पीएम के साथ कई देश घूम आने से लोग महान बन जाते या बड़े पत्रकार कहलाते तो इस देश में ऐसे कृत्य करने वाले हजारों पत्रकार हो चुके हैं पर उनका कोई नामलेवा नहीं है. हां, ये जरूर है कि उन्होंने इतना पैसा कमा लिया और दिल्ली में घर-दुकान बना लिया कि उनकी कई पीढ़ियां आराम से उनके जाने के बाद भी जी-खा सकती हैं. पर यह काम तो लाला लोग भी करते हैं, किराना वाला भी करता है, फिर उनमें और पत्रकार में फर्क क्या. दरअसल दिक्कत ये है कि आजकल के बाजारू दौर में पत्रकारिता के असली मतलब को पत्रकार लोग भूल गए हैं. कोई संपादक भी नहीं जानना चाहता कि संपादक होने के असली मतलब क्या होता है. वह तो मालिक और मालकिनों का मुंह देखता रहता है कि वे क्या कहें और हम तुरंत उसके अनुपालन में लग जाएं. एक जमाने में जो काम टाइपिस्टों, पीए, चाकरों आदि का होता था, वह अब प्रधान संपादकों का हो गया है.

इसी कारण आजकल के संपादक दोहरे व्यक्तित्व को लेकर जी रहे हैं. आफिस में दलाली और समझौते की बातें करते हैं और मंचों पर, पन्नों पर नैतिकता व सरोकार की. इसी के चलते संपादकों के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं. इस बात को जानते तो सब हैं और इसके प्रामाणिक उदाहरण भी आए दिन मिल जाते हैं. इस खाने-दिखाने वाले दांतों के अलग-अलग होने को नए जमाने के संपादक लोग गर्व से मल्टीटास्किंग वाला प्रोफेशनल एट्टीट्यूड कहकर स्वीकारते-बताते हैं और यह सब कहते हुए उन्हें लाज-शरम भी नहीं आती.

पर इन्हें कौन फिर से पढ़ाए कि संपादक और पत्रकार होने का मतलब आधा बागी होना होता है, होलटाइमर सरीखे जीवन को जीना होता है, मिशनरी एप्रोज से जनहित में लिखना-लड़ना होता है. जो सत्ता और सिस्टम के द्वारा हाशिए पर फेंके गए लोग हैं, जिनका कोई सुनने वाला नहीं है, जिनकी आवाज को दमदारी से उठाने वाला कोई नहीं, वैसे वंचितों-दलितों-दरिद्रों का नेता बनने, अगुवा होने, आवाज उठाने, लड़ने का काम होता है पत्रकारों का. शासन और सत्ता के करप्शन, कारोबार, जनहित विरोधी कार्यों का खुलासा करते हुए दो-दो हाथ करना होता है पत्रकारों का काम.

इस प्रक्रिया में जितने संकट आए, मुश्किल आए, उससे निपटना होता है पत्रकार का काम क्योंकि ईमानदारी व सरोकार को जीने वाले संघर्षों और मुश्किलों के संग-संग ही जीवन को जी पाते हैं और इसी में संतुष्टि पाते हैं. तो यह काम वही कर सकता है जो आत्मा और दिल से बागी हो. जिनके अंदर बिकने और झुकने की लेशमात्र भी लालसा, इच्छा न हो. जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं न लुभाती हों. जो पत्रकारिता को धंधा और बिजनेस न मानते हों. तो ऐसे होते हैं असली पत्रकार लेकिन दुर्भाग्य यह कि जो पत्रकार कहे जाते हैं आजकल, वही सबसे बड़े सुविधाभोगी बनने की ओर उन्मुख हैं. जो संपादक कहे जाते हैं आजकल वही सबसे बड़े पीआर एजेंट बनने की ओर उन्मुख हैं. इसी कारण हमारे दौर में राडियाओं का काम आसान हो जाता है कि क्योंकि उसके एक फोन पर बड़े बड़े संपादक लायजनिंग और पीआर के अनमोल बोल बोलने बकने लगते हैं.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट. तथ्यों से असहमति और प्रतिवाद की इच्छा की स्थिति में नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it का इस्तेमाल कर सकते हैं.


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