वीकएण्‍ड टाइम्‍स को किसी सरकार ने पसंद नहीं किया

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संजय यह शीशे के सामने बैठकर खुद को निहारने जैसा था। एक वर्ष और बीत गया। वीकएण्ड टाइम्स ने अपना छह वर्ष का सफर पूरा कर लिया। जन्मदिन पर परेशानियों की याद ज्यादा नहीं आती। खुशी का एहसास होता है। उससे भी ज्यादा अपने बड़े और गंभीर होने का एहसास। लगता है लोग ज्यादा भरोसा करने लगे हैं आप पर। उस पर खरा उतरना भी एक जिम्मेदारी भरा काम होता है। किसी भी अन्य एहसास से ज्यादा महत्वपूर्ण। लगता है कि आप अब प्रतिदिन एक बड़े समाज का हिस्सा होते जा रहे हैं।

यहां लोग लगातार आपको और भी विश्वास भरी नजरों से देख रहे हैं।  सब कुछ लगता है मानो कल की ही बात हो। 29 जनवरी, 2005 की सुबह को तैयारी थी। मैं और अर्चना जी एक अजीब सी खुशी में भरे हुए थे। मन में एक डर भी था। एक नया प्रयोग करने जा रहे थे। अपने सोलह वर्ष के पत्रकारिता के कैरियर में हमेशा मैंने बड़े संस्थानों के लिए काम किया था। मगर वे किसी दूसरे के थे। अब बात अपने खुद के संस्थान की शुरुआत की थी। लग रहा था कि पता नहीं कैसा रहेगा यह प्रयोग। तेजी से भागती हुई जिंदगी में हर पल बदलते मूल्यों के बीच एक सप्ताह पुरानी बात कहना..।

सुबह-सुबह अंक छप कर आया। सबसे पहले हम सबने वनस्पति उद्यान के गेट पर अपने घर के सामने खड़े होकर अपने कर्मचारियों से वहां टहलने आने वाले प्रत्येक सदस्य को नि:शुल्क प्रति भेंट करना शुरू की। यहां टहलने आने वालों में बड़ी संख्या नौकरशाहों और व्यापारियों की होती है। लोगों को लगा कि एक नया अखबार और...। हम सब उनकी प्रतिक्रिया जानने से पूर्व उन सभी लोगों को अखबार भेजने के लिए पैकेट बनाने में जुटे थे, जो लखनऊ शहर में किसी भी काम से महत्वपूर्ण थे। इनमें नौकरशाह थे तो पत्रकार भी, राजनेता थे तो व्यापारी और समाजसेवी भी। हमने लिफाफे में अखबार बंद करके उनको कोरियर के माध्यम नि:शुल्क भेजना शुरू किया। लगभग आठ हजार लोगों को इसी तरह अखबार भेजना लगातार जारी रहा। बाद में कुछ अखबार डाक टिकट लगाकर भेजना शुरू हुए।

अखबार के दूसरे अंक ने ही लखनऊ में हलचल मचा दी थी। अखबार के बीच के पन्ने पर छपी हैडिंग ''अपहरण करवाना हो या बलात्कार, हत्या करवानी हो या डकैती... हाजिर हैं हमारे नेता जी'' ने सनसनी फैला दी थी। तत्कालीन सरकार के मंत्रियों के फोटो समेत उनके कारनामे हमने इस खबर में छापे थे। एक सम्बन्धित मंत्री ने लगभग धमकाने वाली शैली में हमें फोन किया। हमने कहा कि वीकएण्ड टाइम्स में ''मैनेज'' और ''डर'' जैसे शब्द नहीं हैं। हम लोगों ने अखबार शुरू ही इसलिए किया है कि इसमें वो सबकुछ छपे जो किसी भी कारणवश अन्य अखबारों में न छप पाता हो।

हमारे साथ जुड़े हुए सभी लोगों ने तय किया कि वीकएण्ड टाइम्स को एक अखबार नहीं बल्कि एक विचारधारा की तरह चलाया जाए। इसमें धर्म और जाति के संकीर्ण बंधनों को हर हालात में तोड़ा जाएगा। उन लोगों के कुत्सित इरादों से आपको अवगत कराया जाएगा, जो धर्म और जाति का घिनौना खेल खेलते हैं। हमको इस काम की कठिनाइयां मालूम थीं। हमको यह भी पता था कि सरकार अपने खिलाफ छपा हुआ कुछ भी नहीं देखना चाहती। इसके लिए व्यक्ति को प्रत्येक तरीके की परेशानी उठानी पड़ती है। हम मानसिक रूप से इसके लिए पूरी तरह से तैयार थे। परेशानी आयी भी, अलग-अलग तरीके से, अलग-अलग रूप से। मगर शायद हमारे हौसले ज्यादा भारी पड़े उन पर।

इस दौर में हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथियों ने दिल खोलकर हमारा साथ दिया। वह त्रस्त थे। सबकी अपनी-अपनी पीड़ा थी। किसी के संस्थान को प्लाट चाहिए था, किसी के संस्थान को मिलें चलानी थीं, किसी के और गड़बड़झाला टाइप के कारोबार थे। लिहाजा उन अखबारों के हेडिंग तक पंचम तल से तय होते थे। मुख्यमंत्री के सचिव संपादकों को बताते थे कि पहले पेज पर क्या जाना है और क्या नहीं। स्वाभाविक था ऐसे में वो पत्रकार सबसे ज्यादी दुखी होते जो निर्भीकता से अपनी बात कहना और लिखना चाहते थे। मगर उनके संपादक और संस्थान इसकी इजाजत नहीं देते थे। ऐसे सभी लोग मुझे फोन करते। अलग-अलग नामों से लिखते। मुझसे कहते थे कि वीकएण्ड टाइम्स ही इकलौता अखबार है, जिसे चाहे पिछली सरकार हो या यह सरकार किसी ने पसंद नहीं किया। साथ ही यह कहना नहीं भूलते कि इसने ब्लिट्ज की यादें ताजा करवा दीं। सब मानते हैं कि जो नौकरशाह इससे नाराज रहते हैं, वह भी सबसे पहले इसे पढ़ते हैं कि कहीं उनकी तो कोई कहानी नहीं छप गई।

जब हमने पंचम तल के दो महारथी अफसरों के बीच चल रही जंग की खबर छापी तो सूबे के कई बड़े नौकरशाहों ने इसकी फोटो स्टेट करवाकर अन्य अफसरों को भेजी। यूपी कैडर के एक अफसर जो दिल्ली के एक केन्द्रीय मंत्री के साथ तैनात हैं, उन्होंने स्वंय मुझसे फोन करके कहा कि मैं अखबार की कुछ प्रतियां उन्हें भेज दूं। यह सब हमारे लिए सबसे बड़ी पूंजी है। लोगों का यही भरोसा हमारी हिम्मत को बढ़ा रहा है। हमें खुशी इस बात की है कि जितना विज्ञापन हमें सरकार देती, उससे ज्यादा विज्ञापन निजी संस्थानों से हमें मिलने लगा। छह वर्ष के भीतर ही वीकएण्ड टाइम्स ने दिल्ली, महाराष्‍ट्र और उत्तराखण्ड में अपने कार्यालय स्थापित कर लिये। हमारी प्रसार संख्या पांच गुना बढ़ गई। अखबार अब श्वेत-श्याम से रंगीन हो गया था। दिल्ली के नामचीन पत्रकार इस अखबार को पसंद करके इसमें लिखने लगे थे।

मुझे तब बहुत अच्छा लगा जब महाराणा प्रताप संस्थान में पत्रकारिता का अध्ययन कर रहे छात्रों को संबोधित करने के लिए मुझे बुलाया गया और संस्थान के हेड तथा वर्षों तक पीटीआई में काम कर चुके संजय राय ने कहा कि संपादकों से मुलाकत के क्रम में वीकएण्ड टाइम्स के संपादक को इसलिए बुलाया गया क्योंकि बाकी संपादक एक ब्रांड के संपादक थे और मैंने वीकएण्ड टाइम्स को एक ब्रांड बना दिया। यह कहना उन जैसे वरिष्ठ पत्रकार के लिए बडप्पन की बात थी और मेरे जैसे व्यक्ति के लिए खुशी के साथ इस बात की चिंता करना कि वीकएण्ड टाइम्स के ये तेवर बने रहे। अगले अंक में बदलाव की और शुरुआत... कुछ पन्ने रंगीन और बढ़ेंगे क्योंकि हमारे पब्लिकेशन हाउस में फोरकलर प्रिंटिंग मशीन आ गई है। आप सभी का मैं और मेरी टीम बेहद शुक्रगुजार है। जिसे आपने इतना प्यार दिया। आपका यह प्यार हमारे साथ आगे भी ऐसा बना रहेगा, ऐसा मेरा भरोसा है...।

लेखक संजय शर्मा वीकएण्‍ड टाइम्‍स के संपादक हैं. उनका यह लेख वीकएण्‍ड टाइम्‍स के छह साल पूरे होने पर अखबार में प्रकाशित किया गया है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. इस लेख पर अपनी राय 9452095094 पर एसएमएस कर सकते हैं.


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