खून चूस लेते हैं अमर उजाला वाले

E-mail Print PDF

अजय कृष्ण त्रिपाठी: कोल्हू के बैल से भी बदतर अमर उजाला कर्मी : कहते हैं कि कोल्हू का बैल दिनभर कोल्हू के चक्कर लगाता रहता है थककर चूर होने के बावजूद उफ् तक करने की गुंजाइश कोल्हू के बैलों में नहीं देखी गयी लेकिन उनके परिश्रम को संवेदनशील प्राणी महसूस कर लेता है। लगभग यही स्थिति अमर उजाला कर्मियों की भी है हालांकि इसी से मिलती जुलती स्थितियां बाकी सभी अखबारों में काम करने वालों की भी है। लेकिन अमर उजाला पसीना बहवाने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

बतौर उदाहरण हम अमर उजाला के डेस्क पर काम करने वालों की ही बात करते हैं। भुक्तभोगियों ने अपना नाम न छापने की शर्त रखते हुए अपनी मजबूरी का जो बयान किया उससे उनपर तरस ही आता है। अमर उजाला वाराणसी में डेस्क पर काम करने वालों की संख्या कम नहीं है। यहां कोई नौ डेस्क हैं। मतलब दो दर्जन से भी ज्यादा लोग डेस्क से जुड़े हैं जिनकी ड्यूटी अपराह्न तीन बजे शुरु होती है तो इनकी पहली जिम्मेदारी सेंटर चार्ट भरने की होती है जिनमें चार-पांच अखबार पढ़कर यह देखना होता है कि अपने यहां किस सेंटर से कौन सी खबर छूटी है और फिर चार्ट बनाकर संपादक के चेंबर में पहुंचाना होता है।

यह क्रम रोज चलता है और सप्ताह भर की रिपोर्ट पर सोमवार की मीटिंग में चर्चा होती है। चर्चा का विषय खबर छूटने या खबर देने की न होकर प्रायः लेआउट पर ही सीमित हो जाती है। खैर रोजाना अखबारों के मिलान और चार्ट भरने में ही दो घंटे का समय गुजर जाता है। फिर साढ़े पांच से छह के बीच डेस्क वाले रुटीन ड्यूटी संभालते हैं जो साढ़े बारह बजे रात के पहले खत्म नहीं हो पाती। इसके बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता और उन्हें नाइट रिपोर्ट भी तैयार करनी होती है। इस क्रम में डाक के लोगों को सिटी पर भी घंटे आध घंटे काम करने का निर्देश मिलता है और अगले दिन की स्पेशल रिपोर्ट के बारे में जानकारी देनी होती है और उसके बाद भी पोर्टल के लिए भी उन्हें खबरें और फोटो मैनेज करना होता है। यह सब करते हुए डेढ़ से दो बज जाते हैं। नौ घंटे की घोषित ड्यूटी ग्यारह से बारह घंटे की हो जाती है।

साप्ताहिक छुट्टी के बाबत लोगों को यह भी निर्देश है कि वे वीकली आफ के दिन स्टेशन न छोड़ें और यदि स्टेशन छोड़ना जरुरी हो तो बगैर सूचित किए ऐसा न करें। इस तरह की विषम परिस्थिति में काम करने वाला पत्रकार रात्रि में जब दो से तीन के बीच घर पहुंचेगा तो बीवी बच्चों की क्या खिदमत कर सकेगा उन्हें कितना संतुष्ट कर पाएगा इसका सहज अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। घर पहुंचने के बाद तो उसकी वही दशा होती है जो कोल्हू के बैल की होती है जिसे कोल्हू से खोलकर नाद पर बांध दिया जाता है पेट भरने को। इसी तरह अमर उजाला कर्मी भी पेट भरते हैं और अगले दिन की तैयारी के बारे में सोचते हुए कटे पेड़ की तरह बिस्तर पर पड़ जाते हैं।

बनारस से अजय कृष्ण त्रिपाठी की रिपोर्ट


AddThis
Comments (5)Add Comment
...
written by Vinod Sheel, May 18, 2011
This is not the case with Amar Ujala only but applicable to other publications also. Like we are also being humiliated by Dainik Jagran Management specially Sandeep Gupta. But We are helpless...
...
written by Bhardwaj, March 15, 2011
अमर उजाला वाले खून जरूर चूसते है, लेकिन उनका जो काम चोर होते है। जो काम करने वाले होते है उन्हें सुविधाएं देकर उनका खून बढ़ाते भी है।
अपना अपना नजरिया है श्रीमान।
...
written by Bhardwaj, March 15, 2011
अमर उजाला वाले खून जरूर चूसते है, लेकिन उनका जो काम चोर होते है। जो काम करने वाले होते है उन्हें सुविधाएं देकर उनका खून बढ़ाते भी है।
अपना अपना नजरिया है श्रीमान।
...
written by Bhardwaj, March 15, 2011
अमर उजाला वाले खून जरूर चूसते है, लेकिन उनका जो काम चोर होते है। जो काम करने वाले होते है उन्हें सुविधाएं देकर उनका खून बढ़ाते भी है।
अपना अपना नजरिया है श्रीमान।
...
written by sanjay, February 27, 2011
khunchusawa hi nahi lutera bhi hai amar ujala. gorakhpur se nikalne wale amar ujala ke sath ek < purwai> nikalti thi. esme lekhako ko paisa diya jata tha. akhilesh singh mayank eske prabhari the. lekhako ka paisa lut gaya.purwai band ho gayo.
sanjay. gkp

Write comment

busy