गुलाब कोठारी और उनके अखबार ने सरकारी सुविधाएं न ली हों तब बोलें

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: पत्रिका में छपे संपादकीय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का ऐलान : भोपाल। राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र समूह के भोपाल से प्रकाशित दैनिक पत्रिका के दो मार्च के अंक में विशेष संपादकीय में पत्रकारों के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर प्रदेश के पत्रकारों में भारी आक्रोश व्याप्त है और इसके खिलाफ श्रमजीवी पत्रकार संघ के बैनर तले पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने शीघ्र ही एक रैली निकालकर अखबार के दफ्तर के सामने प्रदर्शन करने की घोषणा की है.

संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया ने प्रेस को जारी बयान में कहा है कि पत्रिका का विशेष संपादकीय घोर निंदनीय है. मध्य प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ दो मार्च के दैनिक समाचार पत्र ‘पत्रिका‘ के प्रथम पृष्ठ पर गुलाब कोठारी के नाम से प्रकाशित विशेष संपादकीय 'भ्रष्ट भी, धृष्ट भी' की कड़े शब्दों में निंदा करता है. जो खुद सभी प्रकार से आसानी से उपलब्ध सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते आए हैं, ऐसे लोगों के मुंह से दूसरों की आलोचना शोभा नहीं देता है. एक ऐसा समाचार पत्र संस्थान जो अब तक पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए घोषित वेतन आयोगों की सिफारिश सबसे पहले और बढ़-चढ़ कर लागू करता आया है, यह समझ के परे है कि वह आज पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेतनबोर्ड के अचानक विरोध में क्यों खड़ा हुआ है, वह भी शब्दों के इतने गिरे हुए स्तर के साथ.

उन्होंने कहा कि कोठारीजी का यह संपादकीय इन मायने में भी हास्यास्पद नजर आता है मानों पत्रिका ने अब तक इतिहास में कोई सरकारी मदद हासिल नहीं की हो और अब वह पानी पी-पी कर पत्रकारों को कोस रहे हैं. जिन पत्रकारों के बल पर उनका समाचार पत्र आज इस बुलंदी पर पहुंचा है, उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर वह अपने संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों के समर्पण भाव पर भी एक तरह से उंगली उठा रहे हैं.

संपादकीय में यह तथ्य भी बेमानी है कि आयोग मूलतः पत्रकार संगठनों के जरिए सरकारी भाषा बोलता है. यह सभी जानते और मानते हैं कि वेतन आयोग ने पूरे देश में घूम-घूमकर और अखबार मालिकों, संपादकों, पत्रकारों तथा पत्रकार संगठनों से वेतनमान को लेकर विचार संकलित किए हैं. लेकिन सरकार ने कभी भी घोषित अथवा अघोषित तौर पर आयोग को इसके लिए कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं. इसमें आयोग के अध्यक्ष, जो सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं, की सापेक्षता और निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास किया गया है, जो हमारी न्यायपालिका पर कीचड़ उछालने के समान है.

यह भी सर्वविदित तथ्य है कि वेतन आयोग द्वारा अपनी अंतिम सिफारिशें सरकार को सौपने से पहले जब इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी (आईएनएस) के जरिए अखबार मालिकों को आपत्ति अथवा विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया, तो एक भी अखबार मालिक उस बैठक में उपस्थित नहीं हुआ. पत्रिका समाचार पत्र, जो राजस्थान में ‘राजस्थान पत्रिका‘ के नाम से जाना जाता है, उसने राजस्थान और अब मध्य प्रदेश में सरकार से किन सुविधाओं का लाभ उठाया है, वह किसी से छिपा नहीं है. फिर वह पत्रकारों पर सुविधा भोगी होने का सार्वजनिक लांछन भला कैसे लगा सकता है. क्या पत्रिका ने आज तक सरकार से कभी कोई विज्ञापन नहीं मांगा, यदि उनका उत्तर हां में है, तो यह घोर हास्यास्पद है. एक दिन पहले ही पत्रिका में राज्य सरकार के विज्ञापन उसी प्रमुखता से प्रकाशित हुए थे, जैसे अन्य दैनिक समाचार पत्रों में छपे थे.

संपादकीय में 'पत्रकारों को सरकारों द्वारा चेतना शून्य' बनाने का आरोप भी निराधार है, क्योंकि पिछले कुछ दिनों में मीडिया ने जिस तत्परता से सरकार के घोटाले, भ्रष्टाचार और स्कैम जनता के सामने उजागर किए हैं, वह इस देश के मीडिया की जागरूकता का ही परिचायक है. मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ, दैनिक समाचार पत्र ‘पत्रिका‘ द्वारा बुधवार दो मार्च के अंक में प्रकाशित इस विषेष संपादकीय की घोर निंदा करता है तथा इसके खिलाफ शीघ्र ही पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों की एक रैली निकालकर अखबार के दफ्तर के सामने विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा करता है.  प्रेस विज्ञप्ति


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